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ISSN : 3048-9040 (Online)

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कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ जुलाई - दिसंबर,2024/खण्ड-1/अंक-1

शोधालेख
मिज़ो उपन्यास का विकास और रमबुआई साहित्य

Page No : 1 | URL : 1


जुदिथ ज़ोपारी
शोधार्थी
हिन्दी विभाग मिज़ोरम विश्वविद्यालय, आइज़ोल

डॉ. अमीश वर्मा
असोसिएट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग, मिज़ोरम विश्वविद्यालय, आइज़ोल
शोध-सार

समाज के साथ साहित्य का गहरा संबंध होता है। विश्व के विभिन्न समाजों के साहित्य में पद्य और गद्य विधाओं में लेखन की परंपरा रही है, जिसमें गद्य विधा में उपन्यास को प्रमुख माना जाता है। मिज़ो साहित्य की गद्य विधा के अंतर्गत उपन्यास लेखन की शुरुआत 20वीं सदी में हुई। अन्य समाजों और भाषाओं के साहित्य के विपरीत, मिज़ो साहित्य के शुरुआती दौर में कहानी और उपन्यास में अधिक अंतर नहीं किया गया था, परंतु मिज़ो साहित्य के इतिहासकार डॉ. के.सी.वानङ्हाका ने अपनी पुस्तक Literature Zungzam’ के तीसरे अध्याय ‘Mizo Novel Tobul leh Hmasawn Dan (मिज़ो उपन्यास का उद्भव और विकास)में उपन्यास को कहानी से अलग करते हुए थोंथू फुअःथर[i] की संज्ञा दी और बी. ललथङलिआना ने अपनी पुस्तक जिसे मिज़ो साहित्य के इतिहास की पहली पुस्तक माना जाता है Ka Lungkham: Introduction to Mizo Literature’ के Mizo Novel’ अध्याय में उपन्यास को थोंथू सेई[ii] की संज्ञा दी है। हिन्दी और दुनिया की कई दूसरी भाषाओं में उपन्यास का उद्भव 18वीं-19वीं शताब्दी से माना जाता है, परंतु 1893 में मिज़ोरम में ईसाई मिशनरियों के आने और फिर उनके द्वारा मिज़ो भाषा के लिए लिपि तैयार करने के बाद ही मिज़ो साहित्य का लिखित रूप सामने आना शुरू हुआ। ऐसे में मिज़ो साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा उपन्यासका जन्म 20वीं सदी में जाकर हुआ। आगे चलकर मिज़ो उपन्यास के महत्त्व को पहचाना गया और इसे मिज़ो साहित्य के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया


मूल विषय:

समाज के साथ साहित्य का गहरा संबंध होता है। विश्व के विभिन्न समाजों के साहित्य में पद्य और गद्य विधाओं में लेखन की परंपरा रही है, जिसमें गद्य विधा में उपन्यास को प्रमुख माना जाता है। मिज़ो साहित्य की गद्य विधा के अंतर्गत उपन्यास लेखन की शुरुआत 20वीं सदी में हुई। अन्य समाजों और भाषाओं के साहित्य के विपरीत, मिज़ो साहित्य के शुरुआती दौर में कहानी और उपन्यास में अधिक अंतर नहीं किया गया था, परंतु मिज़ो साहित्य के इतिहासकार डॉ. के.सी.वानङ्हाका ने अपनी पुस्तक Literature Zungzam’ के तीसरे अध्याय ‘Mizo Novel Tobul leh Hmasawn Dan (मिज़ो उपन्यास का उद्भव और विकास)में उपन्यास को कहानी से अलग करते हुए थोंथू फुअःथर[1] की संज्ञा दी और बी. ललथङलिआना ने अपनी पुस्तक जिसे मिज़ो साहित्य के इतिहास की पहली पुस्तक माना जाता है Ka Lungkham: Introduction to Mizo Literature’ के Mizo Novel’ अध्याय में उपन्यास को थोंथू सेई[2] की संज्ञा दी है। हिन्दी और दुनिया की कई दूसरी भाषाओं में उपन्यास का उद्भव 18वीं-19वीं शताब्दी से माना जाता है, परंतु 1893 में मिज़ोरम में ईसाई मिशनरियों के आने और फिर उनके द्वारा मिज़ो भाषा के लिए लिपि तैयार करने के बाद ही मिज़ो साहित्य का लिखित रूप सामने आना शुरू हुआ। ऐसे में मिज़ो साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा उपन्यासका जन्म 20वीं सदी में जाकर हुआ। आगे चलकर मिज़ो उपन्यास के महत्त्व को पहचाना गया और इसे मिज़ो साहित्य के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया।




            मिज़ो साहित्य का आरंभिक रूप मौखिक परंपरा में मिलता है, जिसमें लोककथाएँ और गीत शामिल हैं। लेकिन 1893 के बाद ईसाई मिशनरियों द्वारा मिज़ो भाषा के लिए लिपि उपलब्ध कराए जाने के बाद लिखित रूप में भी मिज़ो साहित्य सामने आने लगा। मिज़ो भाषा का पहला उपन्यास ‘होइलोउपारी’ (एक प्रकार के फूल का मिज़ो नाम) को माना जाता है जिसे एल. बिआकलिआना ने 1936 में कॉटन कॉलेज, गुवाहाटी से आई.ए. की पढ़ाई करते हुए लिखा था। अतः एल. बिआकलिआना को प्रथम मिज़ो उपन्यासकार माना जाता है। डॉ. के. सी. वानङाका ने इस उपन्यास के बारे में लिखा है-‘ ‘होइलोउपारी’ उपन्यास में उपन्यासकार ने मिज़ो संस्कृति के महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘त्लोमङइह्ना’ अर्थात दूसरों की निस्वार्थ सेवा करने के भाव को बहुत ही अच्छे ढंग से चित्रित किया है। इसके साथ ही उपन्यासकार ने माता-पिता की सख्त पाबंदियों से महिलाओं की मुक्ति को भी स्पष्ट रूप से चित्रित किया है और महिलाओं को अपनी पसंद से शादी करने की स्वतंत्रता देने का भी प्रस्ताव रखा है।[3] एल. बिआकलिआना ने ही 1937 में ‘लली (ललओमपुई)’ नामक कहानी की भी रचना की। ‘लली’ को लेकर मिज़ो साहित्य के इतिहासकार स्पष्ट नहीं हैं कि इसे कहानी माना जाए या उपन्यास। कहानी होते हुए भी इसे मिज़ो साहित्य में द्वितीय उपन्यास का स्थान दिया जाता है। ‘लली’ उपन्यास (यदि इसे उपन्यास माना जाए तो) ईसाई प्रेम कहानी है। यह उपन्यास 1939-40 में मिज़ो छात्र संघ द्वारा ‘समाज में मिज़ो महिलाओं की स्थिति और भाग्य’ विषय पर आयोजित कहानी लेखन प्रतियोगिता के लिए लिखा गया था और इसने प्रथम पुरस्कार जीता था। इस कहानी में शुरुआती मिज़ो युवक-युवतियों के एक-दूसरे के प्रति सच्चे और पवित्र प्रेम, पुराने समय में महिलाओं की निम्न स्थिति, मिज़ो समाज में पितृसत्ता के गहरे प्रभाव आदि को चित्रित किया गया है। लेकिन इसके साथ ही, यह उपन्यास इस बात को भी दर्शाता है कि जो मुश्किल समय और दुःख में भी परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, परमेश्वर उनकी हमेशा मदद करता है।[4] इस प्रकार, मिज़ो साहित्य के प्रारंभिक दो उपन्यास एल. बिआकलिआना द्वारा लिखे गए हैं।



एल. बिआकलिआना के बाद तछीप गाँव के कापह्लेइआ आते हैं, जिन्होंने 1939 में पूर्व और पश्चिम के मिज़ो प्रमुखों के बीच हुए युद्ध में तछीप गाँव के एक युवक द्वारा मार डाली गई रुआनज़ोल गाँव की एक खूबसूरत युवती छीङपुई पर आधारित ‘छीङपुई’ नामक उपन्यास लिखा। ‘छीङपुई’ उपन्यास को तीसरा मिज़ो उपन्यास माना जाता है। यह एक ऐतिहासिक उपन्यास होने के साथ-साथ एक रोमांटिक त्रासदी है। उन्होंने 1939 के अंत में अपना दूसरा उपन्यास ‘खोङलुङरून’ लिखा।[5] ‘खोङलुङरून’ उपन्यास एक ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें खोङलुङ गाँव में 1750 में घटित एक ट्रैजिक युद्ध को चित्रित किया गया है। अतः उक्त तीन उपन्यास ही 1940 से पहले लिखे गए उपन्यास थे और इसलिए मिज़ो साहित्य में इन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। एल. बिआकलिआना और कापह्लेइआ, प्रथम दोनों मिज़ो उपन्यास लेखक खतरनाक बिमारी टी.बी. का शिकार हो गये। कापह्लेइआ की मृत्यु 1940 में और एल. बिआकलिआना की मृत्यु 1941 में हो गई। उनकी असमय मृत्यु और उस समय मिज़ोरम में प्रिंटिंग प्रेस के अभाव के कारण उक्त तीनों उपन्यासों को उनके मरणोपरांत प्रकाशित किया जा सका। शुरुआत में प्रथम तीनों मिज़ो उपन्यास केवल पांडुलिपि के रूप में उपलब्ध थे। 1963 में जे. मलसोमा द्वारा संकलित पुस्तक ‘ज़ोउनुन’  में ‘लली’ और ‘छीङपुई’ उपन्यास को प्रकाशित किया गया और यहीं से लोगों की पहचान इन उपन्यासों से हुई। 1983 में ‘होइलोउपारी’ उपन्यास को प्रकाशित किया गया।[6]



तीसरे मिज़ो उपन्यासकार के रूप में 1940-41 के आसपास ललजुईथङा आते हैं जिन्होंने अपने पूर्व लेखकों से अलग फैंटेसीपरक और जासूसी उपन्यास लिखने शुरू किए। 1940-41 में उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘थ्लशाङ' (भूत) को चौथा मिज़ो उपन्यास माना जा सकता है। इस उपन्यास को ‘घोस्टली फिक्शन’[7] या ‘जासूसी उपन्यास’[8] कहा जा सकता है। उनके अन्य उपन्यास हैं – ‘फिरा लेह ङूरथनपारी’, ‘चरहुआई इ ह्लाउ लोम नी’(1941)। अतः इन तीन प्रथम उपन्यासकारों एल. बिआकलिआना, कापह्लेइआ और ललजुईथङा ने प्रारंभिक मिज़ो उपन्यास लेखन की शुरुआत की।



            मिज़ो साहित्य के इतिहासकार बी. ललथङलिआना ने अपनी पुस्तक Ka Lungkham: Introduction to Mizo Literature’ (जिसे प्रथम मिज़ो इतिहास पुस्तक माना जाता है) में लिखा है कि “जिस तरह अंग्रेजी साहित्य में रिचर्डसन, हेनरी फील्डिंग, लॉरेंस स्टर्न और तोबीयस जी. स्मॉलेट को अंग्रेजी उपन्यास के चार पहिए माना गया है, उसी प्रकार मिज़ो साहित्य में इन तीन उपन्यासकारों एल. बिआकलिआना, कापह्लेइआ और ललजुईथङा को मिज़ो उपन्यास के तीन पहिए माना जा सकता है।”[9]



            1945 में सी. ठुआमलुआइआ ने ‘एङतिन ओम त ज़ेल अङ’ उपन्यास लिखा। इसके साथ ही उन्होंने ‘स्यालतोन ऑफिशियल’ और ‘पु हाङा लेईलेत वेङ’ जैसी काल्पनिक लघुकथाएँ भी लिखीं जो पश्चिमी काल्पनिक कथाओं से मिलती जुलती हैं। बर्मा में सेवारत सैन्य अधिकारी कैप्टन चललिआनखूमा (1914-1990) ने 1946 में मिज़ो सैनिक युवक और बर्मा की युवती के बीच के प्रेम पर आधारित उपन्यास ‘मेयम्यो सनापुई’ लिखा जिसे 1950 में बर्मा लुशाई एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित किया गया था। इसे संभवतः सर्वप्रथम प्रकाशित मिज़ो उपन्यास माना जाता है। उन्होंने ‘छीङखुआल लुङदी’(1950) और ‘इन इन चु क इन अ नी’(1963) जैसे उपन्यास भी लिखे। स्वतंत्रता के बाद के युग के अग्रणी मिज़ो कथाकार होने के कारण मिज़ो कथाकारों में कैप्टन चललिआनखूमा का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके प्रथम उपन्यास के प्रेस में छपे पहले मिज़ो उपन्यास होने के कारण मिज़ो उपन्यासकारों में उनका स्थान ऊँचा माना जाता है।[10] चूँकि सबसे पहले प्रकाशित मिज़ो उपन्यास ‘मेयम्यो सनापुई’ का प्रकाशन बर्मा में हुआ था, अतः मिज़ोरम में पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने वाला पहला मिज़ो उपन्यास दारह्लीरा द्वारा लिखे गये उपन्यास ‘खोलकिल बूङह्नुआई’ को माना जाता है। इसे 1971 में लिखा गया था लेकिन इसका प्रकाशन 1975 में किया गया।[11]



            1958 में के.सी.ललवुङा  उर्फ ज़ीकपुई पा द्वारा लिखित उनका पहला उपन्यास ‘सिल्वरथङी’ प्रकाशित हुआ। मिज़ो उपन्यास के विकास में उनका बड़ा योगदान रहा है। वे निबंधकार, कथाकार, आलोचक और कवि थे। उनका साहित्यिक जीवन छियालीस वर्षों से अधिक समय तक चला। मिज़ो साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए मिज़ो अकादमी ऑफ लेटर्स ने 1995 में उन्हें अकादमी पुरस्कार (मरणोपरांत) से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें वर्ष 2000 में मिज़ोरम राज्य सरकार द्वारा शताब्दी के लेखक (राइटर ऑफ द सेंचुरी) से सम्मानित भी किया गया। उनके द्वारा लिखे गये उपन्यास हैं -‘क्रॉस बुला चुआन’(1959), ‘हॉस्टल ओमतू’(1959), ‘सी. सी. कॉइ नं. 27’ (1963), ‘ललरमलिआना’(1950-1993) और ‘नुन्ना कोङ ठ्रूआमपुईआ’(1989)। ‘हॉस्टल ओमतू’ उपन्यास 1959 में गुवाहाटी में लिखा गया था। इस उपन्यास में हॉरर उपन्यास के कुछ तत्व निहित हैं। नासिक, महाराष्ट्र में रहते हुए ज़ीकपुई पा ने 1963 में ‘सी. सी कॉइ नं. 27’ उपन्यास लिखा। यह उनकी एक महत्त्वपूर्ण रचना है। ‘ललरमलिआना’ उपन्यास ज़ीकपुई पा का पहला उपन्यास प्रतीत होता है, लेकिन उनकी पत्नी के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि इसे पूरा करने में उन्हें पैंतालीस साल से ज्यादा का समय लगा। ‘नुन्ना कोङ ठ्रूआमपुईआ’ उपन्यास उनका अंतिम और उनके श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है तथा यह उनकी एक शक्तिशाली कृति है।[12] एक प्रेम कहानी होने के साथ-साथ इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में मिज़ो विद्रोह भी है। मिज़ो कथाकारों में ज़ीकपुई पा श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली लेखकों में से एक माने जाते हैं।



            1965 में वानललरौपुईआ का ‘चोङपुई अ ति वोल वोल ठ्रीन’ उपन्यास प्रकाशित हुआ जो एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह उपन्यास केवल 38 पृष्ठों का था।      1977 और 1978 के बीच जेम्स दोउखूमा  का ‘थ्ला ह्लेईङा ज़ान’ उपन्यास प्रकाशित हुआ जो 1968 में लिखा गया था जब वे राजनीतिक कारणों से नगाँव जेल और गुवाहाटी डिस्ट्रिक्ट जेल में थे। जेम्स दोउखूमा के प्रमुख उपन्यास हैं– ‘खोहर इन’(1970), ‘रिनओमीन’(1970), ‘तुमपाङ चल ङे साईथङपुई’(1981), ह्माङाई:ना थूचः’(1982), ‘इरावदी लूइ कम:’(1982), ‘सिलाईमू ङाई:ओम’(1992) और ‘खम कार सेनशी’(1995)। साहित्य के क्षेत्र में जेम्स दोउखूमा  को लगभग आधा दर्जन पुरस्कार मिले हैं। वे एक निबंधकार, कवि, नाटककार, इतिहासकार, कोशकार एवं कथाकार थे। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को न केवल भारत बल्कि विदेशों ने भी मान्यता दी है।[13]



1970 से 1980 के बीच अधिकतर अंग्रेजी उपन्यासों का मिज़ो अनुवाद साइक्लोस्टाइल में प्रकाशित किया जाता था। 1990 में सी. लाईज़ोना द्वारा लिखित उपन्यास ‘ह्माङाइ:ज़ुआली’ प्रकाशित हुआ जिसे उसी वर्ष मिज़ो अकादमी ऑफ लेटर्स ने ‘बुक ऑफ द ईयर’ से सम्मानित किया। 1991 से 2000 के बीच उपन्यासों का लेखन एवं प्रकाशन अधिक संख्या में हुआ। 2001-2010 के बीच लगभग नब्बे (90) उपन्यासों का प्रकाशन हुआ।[14]



मिज़ो साहित्य के इतिहास में मिज़ो कथा साहित्य का कोई व्यवस्थित एवं कालानुक्रमिक अध्ययन नहीं किया गया है, लेकिन डॉ. ज़ोरमदिनथरा ने अपनी पुस्तक Mizo Fiction: Emergence and Development’ में मिज़ो साहित्य के इतिहास के अंतर्गत मिज़ो कथा के विकास को अध्ययन की सुविधा के लिए तीन खंडों में विभाजित करने का निम्न प्रकार से प्रयास किया है-              



1. स्वतंत्रता पूर्व मिज़ो कथा साहित्य: 1936 – 1946



2. स्वातंत्र्योत्तर मिज़ो कथा साहित्य: 1947– 1986



3. आधुनिक मिज़ो कथा साहित्य: 1986 – 2000



 



1. स्वतंत्रता पूर्व मिज़ो कथा साहित्य: 1936 – 1946



            डॉ. ज़ोरमदिनथरा लिखते हैं कि “1936 से 1946 के बीच की अवधि मिज़ो कथा साहित्य के इतिहास में पहली महत्त्वपूर्ण अवधि है। यह ‘मिज़ो कथा’ नामक एक नयी रचना पद्धति की शुरुआत का प्रतीक है[15] डॉ. ज़ोरमदिनथरा ने स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “मिज़ोरम में वेल्श मिशनरी के आने के बाद ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कविता और नाटक को एक महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। यही कारण है कि मिज़ो साहित्य में कथा साहित्य के उद्भव से पहले नाटक और कविता का उद्भव और विकास हुआ।”[16] कुछ आगे वे पुनः लिखते हैं- “साहित्यिक दृष्टि से मिज़ो कथा साहित्य की स्थापना इस काल के साहित्यिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। इस काल के बीच की अवधि ने मिज़ो कथा साहित्य के लिए एक नए युग की शुरुआत की है।”[17] मिज़ो साहित्य के प्रसिद्ध कवि, नाटककार और लेखक ललत्लुआङलिआना खिअङते ने भी इस युग को ‘साहित्य में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए मिज़ो साहित्य का स्वर्णिम काल’ कहा है। एल. बिआकलिआना, कापह्लेइआ और ललजुईथङा जैसे प्रथम तीन मिज़ो उपन्यासकारों को डॉ. ज़ोरमदिनथरा ने इसी काल के अंतर्गत रखा है, जिन्होंने मिज़ो साहित्य की इस नयी विधा को सामने लाने का काम किया।



2. स्वातंत्र्योत्तर मिज़ो कथा साहित्य: 1947–1986



            डॉ. ज़ोरमदिनथरा इस काल की शुरुआत 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ और इस काल की समाप्ति 1986 में मिज़ोरम शांति समझौते के साथ मानते हैं। इस काल के अंतर्गत 1947 से लेकर 1986 के बीच के कथा साहित्य के विकसित रूप को रेखांकित किया गया है। डॉ. ज़ोरमदिनथरा के अनुसार इस काल के दौरान “द्वितीय विश्व युद्ध, 1966 से 1986 के बीच के मिज़ो विद्रोह और मिज़ो डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के लिए केंद्र शासित प्रदेश के प्रावधान जैसी ऐतिहासिक घटनाओं ने मिज़ो लोगों के सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप इस युग का साहित्यिक आंदोलन आगे बढ़ा। साहित्यिक दृष्टिकोण से इन घटनाओं ने मिज़ो कथा साहित्य के विषय में कुछ बदलाव लाए और इस काल के कथाकारों ने युद्ध, विद्रोह और राज्य के राजनीतिक उथल-पुथल के प्रभाव पर जोर दिया। इस युग के मिज़ो उपन्यासों में लेखकों ने युद्ध, विद्रोह और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण आने वाली अनेक कठिनाइयों का यथार्थ रूप प्रस्तुत किया है। अभिव्यक्ति का एक लोकप्रिय माध्यम होने के कारण उपन्यास ने इस काल में सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया। इस युग ने सी. ठुआमलुआइआ, कैप्टन सी. खूमा, के.सी.ललवुङा (ज़ीकपुई पा), रेव. ज़ोउकिमा, जेम्स दोउखूमा, ललएङमोइआ रालते आदि अनेक मिज़ो कथाकारों को जन्म दिया।”[18] इसके साथ ही इस युग में महिला कथाकारों जैसे खोलकूङी और के. ललदोङलिआनी ने भी मिज़ो कथा साहित्य में उल्लेखनीय योगदान दिया है।



3. आधुनिक मिज़ो कथा साहित्य: 1986 – 2000



            डॉ. ज़ोरमदिनथरा ने अपनी पुस्तक ‘Mizo Fiction: Emergence and Development’ में लिखा है कि “1987 से 2000 के बीच का काल मिज़ोरम के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय कालों में से एक है और यह मिज़ोरम के इतिहास का एक नया अध्याय है।”[19] यह सामाजिक परिवर्तन का युग रहा। इस युग के कथाकार सामाजिक यथार्थ के प्रति आकर्षित हुए। इस युग के कथाकारों ने समाज को सुधारने के उद्देश्य से समाज में व्याप्त बुराइयों को यथार्थवादी ढंग से चित्रित करने का प्रयास किया। इस काल के दौरान शिक्षा की प्रगति तेजी से होने लगी जिससे विशाल पाठक वर्ग तैयार हुआ जिसके फलस्वरूप मिज़ो कथा साहित्य का भी अधिक विकास हुआ और यह साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा बन गयी।[20] इस युग के प्रमुख कथाकार हैं - सी. लाइज़ोना, ललरुआली, ललह्मिङलिआना साइओई, डॉ. एच. लललुङमुआना, एच. ललङूरलिआनी, ज़ालोमा, ललजुईआ कोलनी, सी. हरमना, बी. पोलथङा आदि।



            पारंपरिक मिज़ो उपन्यास का उद्देश्य है सामाजिक मूल्यों की पहचान करना और उन्हें बनाए रखना। इस दौर के लेखकों ने अपने उपन्यासों में ‘त्लोमङइह्ना’ के दो अलग-अलग पक्षों को रेखांकित किया है - पहला मिज़ो त्लोमङइह्ना, जो एक महत्त्वपूर्ण मिज़ो सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य है और जिसका अर्थ है दूसरों की नि:स्वार्थ सेवा या परोपकार और दूसरी त्लोमङइह्ना या भाईचारे की ईसाई अवधारणा।[21]  समकालीन उपन्यास स्पष्ट रूप से इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि ईसाई धर्म के माध्यम से समाज में परिवर्तन और सुधार हुआ है। उपन्यासों में ईसाई धर्म के सकारात्मक परिणामों पर जोर दिया गया है जैसे बेहतर शिक्षा, चर्च द्वारा विवाह को मान्यता दिया जाना, महिलाओं के खिलाफ भेदभाव धीरे-धीरे समाप्त होना, स्त्रियों के लिए शिक्षा का द्वार खोल दिया जाना, आदि।[22] मिज़ो उपन्यास के शुरुआती दौर में उपन्यासकारों ने आमतौर पर अपने समय की मिज़ो जीवनशैली और संस्कृति का वर्णन किया है। सन् 1980 के बाद कई तरह के उपन्यास लिखे जाने लगे। आधुनिक मिज़ो उपन्यासकार जैसे के.सी.ललवुङा (ज़ीकपुई पा) पारंपरिक मिज़ो उपन्यासकारों की तरह केवल ऐतिहासिक उपन्यासकार न होकर मनोवैज्ञानिक उपन्यास लेखक के रूप में भी सामने आने लगे। इस प्रकार आधुनिक मिज़ो उपन्यासकारों के विषय में बदलाव दिखने लगा, उनके लेखन में समाज के साथ-साथ व्यक्ति भी महत्त्वपूर्ण होने लगा। आधुनिक मिज़ो उपन्यासकारों ने कथानक और पत्रों के माध्यम से मिज़ो समाज को प्रस्तुत करने का प्रयास किया। आधुनिक मिज़ो उपन्यास अधिक यथार्थवादी होने लगे। इन उपन्यासों में समकालीन जीवन के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को चित्रित करने का प्रयास किया गया। “मिज़ो उपन्यासकारों के अधिकांश लेखन को सामाजिक और नैतिक उत्थान का माध्यम माना जा सकता है, क्योंकि प्रारंभ से ही हमारे उपन्यासों की एक सामान्य विशेषता है कि यह समाज को दिशा दिखाने वाला एक माध्यम है, न कि स्वांतः सुखाय लिखी जाने वाली एक कलात्मक रचना मात्र।”[23]



रमबुआई साहित्य:



 



मिज़ो इतिहास में 1966 से 1986 तक के 20 वर्षों के समय को मिज़ो रमबुआई का कालया मिज़ोरम में अशांति का काल कहा जाता है। मिज़ो विद्रोहमिज़ो इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण एवं भयावह घटना है जिसने मिज़ो साहित्य के अंतर्गत रमबुआई साहित्य नामक एक नई साहित्यिक कोटि को जन्म दिया। रमबुआई साहित्य भारत से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए 1966 से 1986 के बीच घटित मिज़ो विद्रोह और उस अवधि के दौरान मिज़ोरम के अशांत माहौल को संबोधित करता है। मिज़ो साहित्य के अंतर्गत मिज़ो विद्रोह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। मिज़ो विद्रोह ने कविता, नाटक, कथा साहित्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं को काफी प्रभावित किया है। दो दशकों (1966-1986) तक चलने वाले विद्रोह का समय मिज़ो लोगों के लिए संकट और संघर्ष का समय था। मारगरेट चो. ज़ामा और सी. ललओमपुईआ वानचिआऊ द्वारा संपादित किताब आफ्टर डेकेड्स ऑफ साइलेन्स, वॉइसेस फ्रॉम मिज़ोरम: अ ब्रीफ़ रिव्यू ऑफ मिज़ो लिटरचरमें रमबुआई साहित्य को इस प्रकार परिभाषित किया गया है:



रमबुआई साहित्य का शाब्दिक अनुवाद है अशांत भूमि का साहित्य, अर्थात् मिज़ो नैशनल फ्रन्ट मूवमेंट के अशांत इतिहास से उत्पन्न कथा साहित्य, कथेतर साहित्य, गीत और कविताएँ। वे चाहे एम.एन.एफ. से जुड़े लोगों द्वारा लिखी गयी रचनाएँ हों या गैर-एम.एन.एफ. लेखकों की रचनाएँ हों, वे इस प्रकार की रचना में शामिल हैं, जो लगातार बढ़ रही हैं और आने वाले वर्षों में इसकी वृद्धि जारी रहने की संभावना है।[24]  



मिज़ो कथा साहित्य के अंतर्गत रचनात्मक लेखन के रूप में रमबुआई साहित्य मिज़ोरम के 20 काले और अंधेरे वर्षों को प्रस्तुत करता है, जिसमें एम.एन.एफ.  और गैर-एम.एन.एफ. दोनों दृष्टिकोणों से लिखी गयीं कथाएँ मौजूद हैं। रमबुआई के प्रभाव में रची गयीं प्रायः सभी साहित्यिक कृतियों में मिज़ो एकता की  भावनाएँ, एम.एन.एफ. की विचारधारा, एम.एन.एफ. वॉलन्टियर्स की शहादत, गाँव के लोगों की पीड़ा और विद्रोह से जुड़ी कठोर यादें, स्त्रियों का बलात्कार, गाँवों का जलाया जाना, भारतीय सेना की ग्राम समूहीकरण की नीति आदि विषय शामिल हैं। 



1966 से पूर्व पार्टी प्रचार से संबंधित पुस्तिकाओं और विद्रोह से पहले लिखी गई कुछ व्यक्तिगत कविताओं को ‘रमबुआई साहित्य’ का अग्रदूत माना जा सकता है। जैसे कि मिज़ो यूनियन का पैम्पलेट ‘पॉलिटिक्स कल सुआल लकह फीमखुर अङाई’ (गलत राजनीति से सावधान रहें) और ‘इंडिपेंडेंट थू आ मिज़ो यूनियन थुपुआन’ (मिज़ो यूनियन की स्वतंत्रता की घोषणा)[1963],एम.एन.एफ. अध्यक्ष ललदेङा  द्वारा लिखा गया ‘ज़लेन्ना थुचः नं. 1’(स्वतंत्रता संदेश-1) [1962] और ‘ज़लेन्ना थुचः नं. 2’(स्वतंत्रता संदेश-2) [1963]।[25]



1973 में ललदेङा द्वारा लिखी गई पुस्तिका ‘मिज़ोरम मार्चेस टूवर्ड्स फ्रीडम’ और त्लाङछुआका द्वारा लिखी गई पुस्तिका ‘मिज़ोरम पोलिटिकल चनचिन’ (मिज़ोरम की राजनीतिक के बारे में) प्रकाशित हुई। फरवरी, 1969 में दम्पा साप्ताहिक पत्रिका में ‘पीस मेकिंग इन मिज़ोरम’ को प्रकाशित किया गया। 2013 में डॉ. जे.वी.ह्लुना ने ललह्मिङथङा के राजनीतिक लेखों के संग्रह ‘प्रॉब्लेम ऑफ पीस मेकिंग इन मिज़ोरम’ (मिज़ोरम में शांति स्थापना में समस्या) को उसके मूल शीर्षक के साथ प्रकाशित करवाकर एक नया जीवन दिया, जिसे पहले  एम.एन.एफ. अध्यक्ष ललदेङा के गुस्से के कारण दफना दिया गया था। 1965 में ललह्मिङथङा ने एम.एन.एफ. विचारधारा की नींव ‘एक्सोडस पॉलिटिक्स’ प्रकाशित की। भूमिगत मिज़ो सरकार के रक्षा मंत्री रहे आर. ज़मोइआ द्वारा लिखी गया पुस्तक ‘ज़ौफाते ज़िनकोङः’ मिज़ो विद्रोह से संबंधित सुविख्यात पुस्तक है। पी.बी. रौसाङा ने ‘इनसर्जेंसी इन मिज़ोरम’, बिआकछूङा  ने ‘ह्नम कलसिआम’, आर.साङकोईआ ने ‘ज़ौफा ज़लेन्ना सुआलतूते लमत्लुआङ’ और चोङजुआला ने ‘क शिङनुन ज़िनकोङ’ नामक रमबुआई साहित्य लिखे। एम.एन.एफ. अध्यक्ष ललदेङा  के निजी सचिव, बाद में एम.एन.एफ. के उपाध्यक्ष ज़ौरमथङा ने 1980 में ‘ज़ोउरम ज़लेन्ना लुङफूम’ और बाद में ‘मिज़ो नैशनल मूवमेंट’ का प्रकाशन किया। 1981 में ‘मिज़ो ह्नम ह्लाबू’ (मिज़ो जाति गीत) पुस्तक को प्रचार मंत्रालय, मिज़ोरम सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया था।[26] इसके बाद भी मिज़ोरम विद्रोह से संबंधित कई किताबें प्रकाशित हुईं।  



एम.एन.एफ. के उपाध्यक्ष ललनुनमोइआ की डायरी के तीन खंडों– ‘ज़लेन्ना चाउः’, ‘ईस्ट पाकिस्तान’ और ‘1971’ को 2022 में प्रकाशित किया गया। वित्त मंत्री सी.ललखोलिआना ने भी अपनी डायरी के आधार पर ‘मिज़ो नैशनल मूवमेंट’ नामक पुस्तक प्रकाशित किया। सीनेटर बुआलशाङा ने ‘खुआरेइ सूलह्नू’ और ज़ौरमथङा ने ‘ज़ोरम ज़लेन्ना ह्मिङ क साइन’ नामक पुस्तक प्रकाशित किया।



रमबुआई से संबंधित कुछ पत्रिकाएँ भी निकाली गयी थीं। रमबुआई से पूर्व पॉल ज़खूमा द्वारा प्रकाशित ‘आइजल डेली न्यूज’ ने कुछ समय के लिए रमबुआई के संघर्ष पर प्रकाश डाला। 1964 में प्रकाशित किया गया ‘मिज़ो ओ’ पत्रिका बीच में रुककर 1972 में पुनः प्रकाशित हुई। नवम्बर 1968 से ‘तोरःबोम’ पत्रिका प्रकाशित की गयी।  



मिज़ो कथा साहित्य के क्षेत्र में मिज़ो विद्रोह का काफी प्रभाव पड़ा है। ललओमपुईआ वानचिआऊ ने अपनी पुस्तक रमबुआई लिटरेचरमें कहा है कि रमबुआई से संबंधित सभी मिज़ो कथा साहित्य को रमबुआई कथा साहित्य कहा जा सकता है।[27] इस रमबुआई ने मिज़ो कविता, नाटक, कथा साहित्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं को प्रभावित किया है। इस रमबुआई ने मिज़ो साहित्य, विशेष रूप से रमबुआई से संबंधित कथा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। मिज़ो साहित्य के क्षेत्र में कविता और नाटक की तुलना में कथा साहित्य में रमबुआई का प्रभाव बहुत अधिक है। जहाँ कविता और नाटक के क्षेत्र में रमबुआई का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता दिखता है, वहीं कथा साहित्य में इसका प्रभाव 1976 में प्रथम रमबुआई कथा के प्रकाशित होने के बाद से आज तक लगातार बढ़ रहा है और यह प्रभाव इतना अधिक है कि मिज़ो साहित्य में रमबुआई उपन्यास को एक उप-विधा भी माना जाने लगा है। मिज़ो साहित्य में रमबुआई से संबंधित उपन्यासों को दो आधारों पर विभाजित किया गया हैपहला रमबुआई के दौर में लिखे गए रमबुआई पर आधारित उपन्यास और दूसरा रमबुआई के बाद लिखे गए रमबुआई पर आधारित उपन्यास।[28]



प्रथम प्रकाशित मिज़ो विद्रोह आधारित कथा के संबंध में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। ललओमपुईआ वानचिअऊ ने अपने पुस्तक ‘रमबुआई लिटरेचर’ में यह उल्लेख किया है कि ‘1975 में मिज़ोरम विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष वानललङेना द्वारा लिखा गया ‘क दी वे खा’ (Ka Di Ve Kha) उपन्यास जो ‘साइक्लोस्टाइल’ में प्रकाशित हुआ था, रमबुआई से संबंधित सबसे पहला उपन्यास माना जाता है।’[29] परंतु गवर्नमेंट शाङबाना कॉलेज द्वारा आयोजित सेमिनार की प्रोसीडिंग्स- ‘रमबुआई लिटरेचर’ में लललिआनज़ुआला का कहना है कि “वर्ष 1976 से पहले कोई ऐसा मिज़ो उपन्यास जिसका आधार रमबुआई था, शायद प्रिन्ट में उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह सच है कि ऐसी रचना मौजूद थी। चूँकि तब मिज़ोरम एक अशांत क्षेत्र था, इसलिए रमबुआई के दौर की रचनाएँ कभी-कभार ही प्रकाशित हो पाती थीं। लेकिन जेम्स दोउखूमा  द्वारा लिखे गये ‘रिनओमइन’ उपन्यास को रमबुआई आधारित पहला प्रकाशित उपन्यास माना जा सकता है, जिसे डेविड मेमोरियल प्रेस, थकथीङ बाज़ार, आइज़ोल द्वारा दो खंडों में प्रकाशित किया गया था।”[30]



यद्यपि वानललङेना द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘क दी वे खा’ (Ka Di Ve Kha) जेम्स दोउखूमा के उपन्यास ‘रिनओमइन’(1970) से एक वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था, लेकिन अब इस उपन्यास की प्रति उपलब्ध नहीं होने के कारण मिज़ो विद्रोह पर आधारित उपन्यास के रूप में जेम्स दोउखूमा के ‘रिनओमइन’ उपन्यास को पहला प्रकाशित उपन्यास माना जा सकता है।



जेम्स दोउखूमा का उपन्यास ‘रिनओमइन’ 1970 में सिलचर जेल में लिखा गया था, जिसे 2015 में आर. ललरोना द्वारा प्रकाशित किया गया था। अपने उपन्यास की प्रस्तावना में, उपन्यासकार जेम्स दोउखूमा  ने उल्लेख किया है कि यह जेल में बिताए गए समय की याद में लिखा गया था। यह उपन्यास 1966 के मिज़ोरम विद्रोह पर आधारित है, जिसमें 1965 की एम.एन.एफ. विशेष असेम्बली से लेकर 1968 तक की मुख्य घटनाएँ प्रस्तुत की गई हैं। यह रमह्लुनी और रोउज़ुआला के प्रेम और मिज़ो विद्रोह के कारण उनके संघर्ष की कथा पर आधारित है। यह उपन्यास 1966 के मिज़ो विद्रोह का एक प्रतिबिंब है जिसमें यह दिखाया गया है कि विद्रोह के दौरान एक प्रेमी जोड़े के साथ क्या होता है और समाज एवं परिवारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। इस उपन्यास को मिज़ो विद्रोह पर लिखे गए उपन्यासों में से सबसे अच्छा उपन्यास भी माना जाता है। ‘रिनओमइन’ उपन्यास में मिज़ो यूनियन और एम.एन.एफ. के बीच के संबंधों की सच्ची तस्वीर को चित्रित किया गया है, गाँव के बीच कोकतू (मुखबिर) के कारण एम.एन.एफ. वॉलन्टियरों की पीड़ा और एम.एन.एफ. सेना की कार्रवाई का भी वर्णन है।[31]    



रिनओमइन’ उपन्यास के प्रकाशन के 12 साल बाद 1982 में प्रमोद भटनागर द्वारा लिखित ‘ज़ौरमथङी: डॉटर ऑफ द हिल्स’ को विक्रांत प्रेस, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया था। यह उपन्यास अंग्रेजी में लिखा गया पहला मिज़ो विद्रोह संबंधी उपन्यास है जिसे गैर-मिज़ो लेखक द्वारा लिखा गया था। इस उपन्यास के लेखक प्रमोद भटनागर मिज़ोरम के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद मिज़ोरम में काम कर रहे थे। रमबुआई के समय की पृष्ठभूमि पर आधारित इस उपन्यास की कहानी ज़ौरमथङी और अजय कपूर की है, जो पंजाब का एक पुलिस अधिकारी है, जिसकी कहानी के अंत में मृत्यु हो जाती है। ज़ौरमथङी का मामा एक भूमिगत सैनिक है, जिस पर 10,000/- रुपये का इनाम है, लेकिन लुङदाई गाँव में उनके घर को एम.एन.एफ. द्वारा जला दिया जाता है, और उनके पिता साङज़ुआला उनके हाथों मारे जाते हैं।



मिज़ोरम शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने से ठीक पहले 1985 में आधुनिक मिज़ो कथा साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले सी. लाईज़ोना  का ‘थुरुक’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। यह असल में एक लघु उपन्यास है जो मिज़ो विद्रोह के प्रारम्भिक काल से संबंधित है। इस प्रकार मिज़ो विद्रोह के इस पहले दशक के दौरान मिज़ो विद्रोह केन्द्रित एक अंग्रेज़ी उपन्यास  तथा उक्त तीन मिज़ो उपन्यास प्रकाशित हुए जिसे मिज़ो साहित्य की एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है।



के.सी. ललवुङा उर्फ ज़ीकपुई पा ने 1989 में रमबुआई पर आधारित‘नुन्ना कोङ ठ्रूआमपुईआ’ उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में सेना के अहंकार और मिज़ो महिलाओं पर उनके द्वारा किये गए अत्याचार को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। उपन्यासकार ने अपने इस उपन्यास के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे सेना ने विवाहित महिलाओं और युवतियों को चर्च और स्कूलों में कैद करके उनके साथ क्रूर सामूहिक बलात्कार किया था। उपन्यास की एक पात्र पी कूङलिआनी ने लगातार क्रूर सामूहिक बलात्कार के कारण खुद को फांसी लगा ली और उन तीन महिलाओं को मिज़ो सेना द्वारा गोली मार दी गई क्योंकि उन्होंने गलत तरीके से यह प्रचारित किया था कि सेना द्वारा किए गए बलात्कार में कुछ महिलाओं को मज़ा आ रहा था तथा उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा था।



डॉ. ललत्लुआङलिआना खिआङते द्वारा संपादित किताब ‘अ स्टडी ऑफ मिज़ो नॉवेल’ में वानङ्हाका ने अपने ‘अ क्रिटिकल स्टडी ऑफ द डेवलपमेंट ऑफ मिज़ो नोवेल्स’ लेख के अंतर्गत 1960 से 1970 के वर्षों के बारे में इस तरह लिखा है कि “तत्कालीन मिज़ो ज़िले में विद्रोह ने इस समय के दौरान पूर्ण उपन्यासों के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी, इसलिए इसे ‘मिज़ो साहित्य का अंधकार युग’ भी कहा जा सकता है।”[32] यह सच है कि मिज़ो विद्रोह (रमबुआई) का समय मिज़ो लोगों के लिए एक संकटपूर्ण और अराजक समय था, जिसने कई तरह से मिज़ो साहित्य के विकास में बाधा डाली, लेकिन इसने मिज़ो साहित्य के विकास को अलग ढंग से प्रभावित भी किया था। मिज़ो विद्रोह के समय मिज़ो कथाकार अपनी भावनाओं और दृष्टिकोणों को अपने लेखन में अपनी इच्छा के अनुसार व्यक्त नहीं कर सकते थे। एम.एन.एफ. के आंदोलन के प्रति उनका अपना दृष्टिकोण, खास तौर पर उनकी प्रगति या निंदा के बारे में लिखना उनके लिए खतरे से कम नहीं था। मिज़ो कथा लेखकों के साथ-साथ स्थानीय समाचार पत्रों के संपादकों के लिए भी खतरा कम नहीं था। पी. ललनिथङा, आईएएस (सेवानिवृत्त) ने अपनी किताब इमरजेंस ऑफ मिज़ोरम में उल्लेख किया है कि 1982 के मई में विधायक पु ज़ादिङा और छोरपिआल स्थानीय समाचार पत्र के संपादक पु ज़ेड.ए.कापमोइआ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।[33]  



कुछ उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में रमबुआई के माहौल और उससे जुड़े अन्य पहलुओं को दर्शाया है। ऐसे उपन्यासों में रमबुआई के कुछ मुद्दों को पात्रों के माध्यम से चित्रित किया जाता है, लेकिन उनमें रमबुआई का गहरा प्रभाव नहीं होता। कुछ लेखक उपन्यास को रोचक बनाने के लिए केवल रमबुआई के कुछ संदर्भों का प्रयोग करते हैं। ललह्मिङलिआना साईओई द्वारा लिखा गया ‘केईमा यूनियनलिआना’ और ललशिआता द्वारा लिखा गया ‘ह्माङाइहना ज़ूङज़ाम’ उपन्यास को इसी तरह के उपन्यासों के अंतर्गत रखा जा सकता है।



लेकिन कई उपन्यास ऐसे हैं जो सीधे-सीधे मिज़ो विद्रोह पर आधारित हैं। ऐसे उपन्यासों में उपन्यासकार, उपन्यास की कथावस्तु के रूप में मिज़ो विद्रोह (रमबुआई) और रमबुआई के सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रभावों को रखते हैं। ऐसे उपन्यासों में घटनाओं और पात्रों का चयन और चित्रण वास्तविक जीवन से किया जाता है और इसके साथ ही ऐतिहासिक तथ्यों को महत्त्व दिया जाता है। जेम्स दोउखूमा  का उपन्यास ‘रिनओमइन’(1976), ‘सिलाइमु ङाई:ओम’(1992), ‘खाम कार सेनह्री’(2005); के.सी.ललवुङा  उर्फ ज़ीकपुई पा का उपन्यास ‘नुन्ना कोङ ठ्रूआमपुईआ’(1989); ज़ौथनसाङी पा का उपन्यास ‘मित्तुई कारा ह्माङाइह्ना’(1995); ललरेममोइआ साइलोउ का उपन्यास ‘ह्माङइहतू तुआरना’(2001); के.होलला साइलोउ का उपन्यास ‘मिज़ो ङाई: दान देक चे थम’(2001) (आत्मकथानक उपन्यास);  माफेली का उपन्यास ‘ङ्हिल्ह हर कन तुआर’(2010); सैमसन थनरूमा का उपन्यास ‘बेइसेईना मिततुई’(2010); सी. छुआनवोरा का उपन्यास ‘रिनपुई लेह सेईज़ीका’(2011); ललएङज़ाउआ का उपन्यास ‘फलुङ’(2019) आदि को रमबुआई पर आधारित महत्त्वपूर्ण उपन्यासों के अंतर्गत रखा जा सकता है।



मिज़ो विद्रोह से संबंधित उपन्यासों का लेखन पुरुष उपन्यासकारों द्वारा अधिक हुआ है। लेकिन तीन मिज़ो महिला उपन्यासकार हैं जिन्होंने रमबुआई से संबंधित उपन्यास लिखे हैं। वे उपन्यास हैं– माफेली द्वारा लिखित ‘ङ्हिल्ह हर कन तुआर’(2010), मलसोमी द्वारा लिखित ‘ज़ौरमी’(2015) और हन्ना ललह्लनपुई द्वारा लिखित ‘व्हेन ब्लैक बर्ड फ्लाई’(2019)। इनमें से ‘ज़ौरमी’ और ‘व्हेन ब्लैक बर्ड फ्लाई’ अंग्रेज़ी में लिखे गए हैं। इस तरह माफेली एकमात्र लेखिका हैं जिन्होंने रमबुआई आधारित मिज़ो उपन्यास लिखा है।  



मिज़ो साहित्य के अलावा हिन्दी कथा साहित्य के क्षेत्र में मिज़ो विद्रोह के समय में मिज़ोरम में खुफिया बलों के प्रमुख के रूप में तैनात और भारत सरकार के साथ शांति के लिए बातचीत करने के लिए मिज़ो भूमिगत नेताओं को मनाने में शामिल श्रीप्रकाश मिश्र ने 1996 में हिन्दी में मिज़ो विद्रोह आधारित उपन्यास‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ लिखा। यह उनका पहला उपन्यास था। इस उपन्यास में श्रीप्रकाश मिश्र ने 1959 के ‘माउताम’ और उसके बाद भारतीय राज्य से अलग होने के लिए ललदेङा के नेतृत्व में चले सशस्त्र विद्रोह को पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत किया है।



यह कहा जा सकता है कि मिज़ो विद्रोह के दौरान मिज़ो लोगों द्वारा झेली गई निजी पीड़ा और सामाजिक कठिनाइयों ने ही मिज़ो साहित्य के अंतर्गत रमबुआई साहित्य जैसी कोटि को जन्म दिया है। अधिकांश रमबुआई आधारित उपन्यास आमतौर पर मिज़ो विद्रोह के दौरान भारतीय सेना, एम.एन.एफ. के भूमिगत वॉलन्टियरों के आपसी संघर्ष और इसके बीच पिसते मिज़ो लोगों की दर्दनाक पीड़ा और संकटपूर्ण स्थिति को प्रस्तुत करते हैं।



मिज़ो विद्रोह और संघर्ष के प्रभाव में लिखे गए रमबुआई आधारित उपन्यास किसी भी अन्य साहित्यिक कृति से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। रमबुआई कथा साहित्य निर्दोष मिज़ो नागरिकों के बीच की हिंसा, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष और उनकी परेशानियों का गवाह है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह विद्रोह के समय मिज़ो स्त्रियों की खामोश पीड़ा, उनके दोहरे संघर्ष और निर्दोष नागरिकों की दयनीय दशा को साहित्य में दर्ज करता है। रमबुआई उपन्यास मिज़ोरम के क्रूर राजनीतिक उथल-पुथल का यथार्थवादी और सजीव चित्र प्रस्तुत करता है।



            ललओमपुईआ वानचिआऊ अपनी पुस्तक रमबुआई लिटरेचरमें 1986 से 2022 के बीच प्रकाशित 66 रमबुआई कथाओं का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि ये वे कथाएँ हैं जो पुस्तक के रूप में उपलब्ध हैं। अगर हम और अधिक विस्तार से खोजें तो, यह संभव है कि कम-से-कम सत्तर (70) रमबुआई कथाएँ मिलें, जिनमें वे भी शामिल हैं जो अब पुस्तक के रूप में उपलब्ध नहीं हैं।[34] दो दशकों तक चलने वाले मिज़ो विद्रोह के संकटग्रस्त दौर में भी मिज़ो साहित्य के अंतर्गत मिज़ो कथा साहित्य का अधिक विकास हुआ, खास तौर पर रमबुआई आधारित उपन्यास के क्षेत्र में। उन दो दशकों के दौरान पीड़ा, वेदना, संकट आदि अनुभवों को रमबुआई आधारित उपन्यासों में मार्मिक रूप से चित्रित किया गया और दो दशकों तक चलने वाला मिज़ो विद्रोह मिज़ो साहित्य के लिए एक छिपे हुए वरदान की तरह बन गया। रमबुआई से संबंधित अनेक उपन्यासों का प्रकाशित होना निश्चित रूप से मिज़ो कथा साहित्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।     



संदर्भ:




 






[1] Dr. K.C. Vannghaka, Literature Zungzam, Lois Bet Print & Publication, Aizawl, 2014, पृष्ठ सं. 25 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[2] B. Lalthangliana, Ka Lungkham: Introduction to Mizo Literature, RTM Press, Aizawl, 1999, पृष्ठ सं. 181 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[3] Dr. K.C. Vannghaka, Mizo Novel Zirchianna (A critical Study of Mizo Novel), पृष्ठ सं. 91 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[4] Dr. K.C. Vannghaka, Literature Zungzam, पृष्ठ सं .25  (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[5]  Dr. Zoramdinthara, Mizo Fiction: Emergence and Development, पृष्ठ सं. 48 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[6]  Lal Rinawma, Mizo Novel lo chhuah leh than zel dan Thu leh Hla, A monthly Literary Journal of the Mizo Academy of Letters, January, 2012,  पृष्ठ सं. 21 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[7]  Dr. Laltluangliana Khiangte, A study of Mizo Novel, पृष्ठ सं. 4 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[8] R. Lalianzuala, Mizo Novel Golden Jubilee (1937-1987) Souvenier, पृष्ठ सं. 96 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[9] B. Lalthangliana, Ka Lungkham: Introduction to Mizo Literature, पृष्ठ सं. 207 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[10] Dr. Zoramdinthara, Mizo Fiction: Emergence and Development, पृष्ठ सं. 88 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[11] B. Lalthangliana, Mizo novel lo chhuah tan dan leh hmasawn zel thu (history of Mizo Novel 1937-87) R. Lalianzuala, Mizo Novel Golden Jubilee (1937-1987) Souvenier, पृष्ठ सं. 102 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[12] Dr. Zoramdinthara, Mizo Fiction: Emergence and Development, पृष्ठ सं. 20 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[13] वही, पृ. 123 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[14]  Dr. Laltluangliana Khiangte, Mizo thu leh hla chanchin, Department of Mizo, Mizoram University, 2022, पृष्ठ सं. 231-237 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[15] Dr. Zoramdinthara, Mizo Fiction: Emergence and Development, पृष्ठ सं. 20 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[16]  वही, पृ. 24 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[17]  वही, पृ. 24 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[18] वही, पृ.  75-76 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[19] वही, पृ. 184 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[20] वही, पृ. 185-186  (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[21] Mizo Studies, July – September 2012, Department of Mizo, Mizoram University, pp.41 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[22]  वही, पृ. 46 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[23]  वही, पृ. 51 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[24] Margaret Ch. Zama & C. Lalawmpuia Vanchiau, After Decades of Silence, Voices from Mizoram, A brief Review of Mizo Literature, 2016, Centre for North East Studies and Policy Research, New Delhi, पृष्ठ सं. 57 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)  





[25]  C. Lalawmpuia Vanchiau, Rambuai Literature, Lengchhawn Press,  पृष्ठ सं. 37-38 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[26]  वही, पृ. 41-43, (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[27] C. Lalawmpuia Vanchiau, Rambuai Literature, Lengchhawn Press,  Gilzom Offset, Electric Veng, 2014, पृष्ठ सं. 104 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[28] Mizo Studies, July – September 2020, Department of Mizo, Mizoram University, pp.354  (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[29]  वही, पृष्ठ सं. 109 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)





[30] Mizo Studies, July – September 2020, Department of Mizo, Mizoram University, पृष्ठ सं. 355 (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[31] K.C Lalthansanga, Women’s perspective of Mizo Insurgency in Rinawmin and Silaimu Ngaihawm by James Dokhuma, Published Ph.D Thesis submitted to MZU, Aizawl, 2018





[32] Dr. Laltluangliana Khiangte, A study of Mizo Novel, पृष्ठ सं. 19  (मूल उद्धरण अंग्रेजी में, अनुवाद हमारा)





[33] P. Lalnithanga, Emergence of Mizoram (Third Edition), पृष्ठ सं. 97





[34]  वही, पृष्ठ सं. 131 (मूल उद्धरण मिज़ो में, अनुवाद हमारा)




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