सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 11-17 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=29
निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें मानव जीवन की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक स्थितियों और बदलते सामाजिक संबंधों का गहन चित्रण मिलता है। इस कहानी का मुख्य प्रतिपाद्य मानव के भीतर व्याप्त अकेलापन, संबंधों की जटिलता, भावनात्मक दूरी और अस्तित्वगत संकट है। कहानी के पात्र बाहरी रूप से सामान्य जीवन जीते हुए दिखाई देते हैं, किन्तु उनके भीतर गहरा खालीपन और असंतोष व्याप्त है। वे एक-दूसरे के करीब होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर हैं। इस प्रकार, लेखक यह संकेत करता है कि आधुनिक जीवन की आपाधापी और बदलती जीवनशैली ने मानवीय संबंधों की आत्मीयता को कमजोर कर दिया है। परिंदे में ‘परिंदे’ का प्रतीक अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह स्वतंत्रता, उड़ान और मुक्ति की आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं दूसरी ओर मनुष्य के भीतर के बंधनों, असुरक्षाओं और सीमाओं को भी उजागर करता है। इस प्रतीक के माध्यम से लेखक यह दर्शाता है कि मनुष्य अपने ही बनाए हुए संबंधों और परिस्थितियों में बँधकर रह जाता है, जबकि उसका मन स्वतंत्रता की ओर आकृष्ट रहता है।
कहानी में प्रेम का भाव भी उपस्थित है, किन्तु वह पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता। प्रेम के साथ दूरी, संकोच और अनकही भावनाएँ जुड़ी हुई हैं, जो संबंधों को और अधिक जटिल बना देती हैं। लेखक ने अत्यंत सरल, संवेदनशील और प्रभावशाली भाषा में इन भावनाओं को व्यक्त किया है, जिससे पाठक पात्रों के मनोभावों से सहज रूप से जुड़ जाता है। अतः कहा जा सकता है कि परिंदे केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के अंतर्मन की गहरी व्यथा और उसकी अस्तित्वगत स्थिति का सजीव चित्रण है। यह रचना हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि भौतिक प्रगति के बावजूद मनुष्य भावनात्मक स्तर पर कितना अकेला और असुरक्षित होता जा रहा है।
अकेलापन, संबंधों की जटिलता, आंतरिक संघर्ष, आधुनिक जीवन, प्रतीकात्मकता, अस्तित्वगत संकट, संवेदनशीलता
परिंदे निर्मल वर्मा की सबसे चर्चित कहानी है | अपने प्रकाशन काल से ही इस कहानी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है | यह कहानी नई कहानी आन्दोलन के दौर में इसलिए भी सर्वाधिक चर्चित हुई क्योंकि नई कहानी जिन-जिन तत्वों और बिन्दुओं पर पुरानी कहानी से अपने आप को अलग कर रही थी वे सारे के सारे गुण इस कहानी में पूरी तरह विद्यमान हैं | परिंदे नई कहानी की पूरी विशेषताओं को अपने आप में समेटे हुए अतीत और वतर्मान के बीच जूझते हुए मानव द्वन्द की कहानी है | इस कहानी में नयापन क्या है ? इससे पूर्व पुरानी और नई कहानी में मुख्य पार्थक्य क्या था इस इस बिंदु को स्पष्ट कर लिया जाए तो परिंदे कहानी को समझने में हमें ज्यादा आसानी होगी | 1947 में जब हम आजाद हुए तो हमारी प्राथमिक समस्या थी देश को बेहतर से बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था प्रदान करना | लेकिन आजादी के बाद एक प्रकार का मोहभंग होता दिखाई देता है जो हम धूमिल, नागार्जुन, रघुवीर सहाय जैसे कवि एवं भीष्म साहनी, मार्कंडे, अमरकांत, यशपाल जैसे कथाकार के यहाँ बखूबी देख सकते हैं | ऐसे में जो पुरानी कहानी अब तक आदर्श की बात कर रही थी अचानक से उसका सामना यथार्थ से होता है और यहां से कहानी एक प्रकार से नया रूप धारण कर लेती है | यानि नई कहानी एक प्रकार से आजादी के बाद विकसित होते नए मध्यवर्ग और उसकी बनती परिवर्तित होती नई आकांक्षाओं से युक्त कहानी है | यह आकांक्षा एक जगह पर स्थित नहीं रहने वाली थी | नई कहानी यथार्थ और सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं को अब पुराने चश्मे से नहीं देखती है बल्कि इन्हें नए सन्दर्भों में देखना चाहती है | यहीं पिछली कहानी से नई कहानी अपने आप को पूरी तरह अलगा लेती है | नई कहानी का परिवेश पुरानी कहानी से भिन्न है | नई कहानी के परिवेश में कहानी के परंपरागत और रूढ़ तत्वों का पूरी तरह से निषेध है | अब कहानी में किसी भी व्यक्ति का केवल अच्छे गुणों के आधार पर मूल्यांकन नहीं किया जाएगा बल्कि उसके गुण, अवगुण के आधार पर उस व्यक्ति का समग्रता में मूल्यांकन किया जाएगा | नई कहानी अतीत की कहानियों को पूरी तरह नकार देता है और यह पूरी तरह वर्तमान पर केन्द्रित होने वाली कहानी है | यानि नई कहानी में बेरोजगारी, स्त्री-पुरुष के बीच बनता बिगड़ता सम्बन्ध, तनाव, घुटन, भय, संत्राश, अकेलापन, पारिवारिक सबंध जैसे पदों पर ज्यादा जोर दिया गया |
अब बात निर्मल वर्मा और उनकी कहानी परिंदे पर किया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा | ऊपर नई कहानी की जिन विशेषताओं की बात की गई है वह यूँ ही नहीं की गई है बल्कि ये सभी विशेशताएँ परिंदे कहानी में हमें आसानी से हर जगह देखने को मिल जाएंगी | निर्मल वर्मा कि अधिकांश कहानियां उस वर्ग की होती हैं जो पूरी तरह आधुनिकताबोध और नागरीय जीवन जीने का आदि हो चुका है | आज के नागरीय जीवन में सभी व्यस्त हैं | इस जीवन में मनुष्य यह चाहता है कि उसे मेहनत कम करना पड़े और सबकुछ उसे जल्दी से जल्दी मिल जाए | इस जल्दी से जल्दी पाने के चक्कर में वह अपने घर परिवार से धीरे-धीरे अलग होता चला जाता है और एक नई जगह पहुँच जाता है जहाँ वह एक प्रकार से अजनबी होता है, वह अकेला होता चला जाता है | अकेले होने के बावजूद वह अपने मन की बात को किसी दूसरे से नहीं बताता है | किसी दूसरे के साथ संवाद स्थापित नहीं करना चाहता है | परिंदे भी कुछ इसी तरह की कहानी है | परिंदे कहानी के सभी पात्र इसी कारण आत्मकेंद्रित हैं | जिन मूल्यों के साथ ये पात्र अपना बचपन जिए हैं कालांतर में वे मूल्य बदल गए हैं और उनके स्थान पर नए मूल्य आ गए हैं | ये सभी पात्र इन नए मूल्यों के अनुरूप खुद को नहीं बदल पाते हैं और पुराने मूल्यों के साथ समझौता नहीं कर पाते हैं | यह इस कहानी का नयापन है | “अभी तक जो कहानी सिर्फ कथा कहती थी या कोई चरित्र पेश करती थी अथवा एक विचार को झटका देती थी, वही निर्मल वर्मा के हाथों जीवन के प्रति एक नया भावबोध जगाती है, साथ ही ऐसे दुर्लभ अनुभूति चित्र प्रदान करती है जिन्हें हम कम से कम हिंदी में कहानी के माध्यम से प्राप्त करने के अभ्यस्त नहीं थे |”[1] कहीं न कहीं परिंदे कहानी के सभी पात्र अपने आप से छद्म करते नजर आते हैं | वे अपनी निजी जिंदगी को नियति मानकर जीते चले जाने में विश्वास करते हैं | यही कारण है कि उन सभी पात्रों के भीतर कोई आवेग उत्पन्न नहीं होता है जो उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने कि प्रेरणा दे सके | जब हम परिंदे कहानी पढ़ते हैं तो कभी-कभी हमें परिंदे कहानी के पात्रों पर गुस्सा भी आता है क्योंकि वे ठान लिए हैं कि अपनी जिन्दगी को एक ही दृष्टि से देखेंगे | बड़ी बात यह है कि जब किसी व्यक्ति में कोई दुर्बलता होती है और उसे जब अपनी दुर्बलता का पता चलता है तो वह व्यक्ति उस दुर्बलता को दूर करने का प्रयास करता है लेकिन परिंदे कहानी के पात्रों के साथ ऐसा नहीं होता नजर आता है | ये अपनी कमजोरी को या अपनी दुर्बलता को लगातार अपनी निजी जिद्द या हठ के कारण छिपाते चले जाते हैं और अपने अतीत से वापस नहीं आना चाहते हैं | ऐसी बात नहीं है कि किसी व्यक्ति के साथ अतीत में कोई अप्रिय घटना घटी हो तो वह उससे वापस नहीं आ सकता है | हाँ यह ठीक है कि कभी-कभी कुछ घटनाएँ व्यक्ति को भीतर से परेशान जरुर करती हैं और उस व्यक्ति को अपने अतीत से वापस आने में कभी-कभी थोड़ा समय भी लग जाता है | लेकिन क्या अपने अतीत से चिपके रहने मात्र से वह अपने वर्तमान के साथ न्याय करता है ? नहीं | परिंदे के सभी पात्रों की दुर्बलता कभी-कभी उनकी व्यक्तिगत दुर्बलता नहीं लगती है बल्कि वह उनके हठपन की दुर्बलता लगती है | उदाहरण के लतिका को देखिए | ऐसी बात नहीं है कि लतिका पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की नहीं है | वह एक कान्वेंट स्कूल की महिला छात्रावास की अधीक्षक है | वहीं उसी स्कूल में पढ़ाती भी है | अपना अच्छा बुरा भली-भांति समझती भी है, लेकिन इन सभी बातों का उससे क्या मतलब | अतीत में कभी उसका गिरीश नेगी से प्रेम सम्बन्ध था और गिरीश नेगी की कश्मीर में मृत्यु हो जाती है | लतिका को यह अच्छी तरह पता है कि उसका प्रेमी अब वापस लौटकर नहीं आने वाला है | वह अब इस दुनिया में नहीं है | वह मिस्टर ह्यूबर्ट के प्रेम को ठुकरा भी देती है और गिरीश नेगी के प्रेम के साथ जी रही है | क्या लतिका अपने वर्तमान के साथ न्याय कर रही है ? नहीं | क्या अब वह किसी दूसरे के साथ प्रेम नहीं कर सकती है ? बिल्कुल कर सकती है लेकिन वह ऐसा नहीं करना चाहती है | लतिका मन ही मन सोचती भी है “वह क्या किसी को चाह भी सकेगी, उस अनुभूति के संग जो अब नहीं रही, जो छाया सी उसपर मंडराती रहती है, न स्वयं मिटती है न उसे मुक्ति दे पाती है |”
परिंदे कहानी को अधिकांश विद्वान प्रेम की कहानी स्वीकार करते हैं, और परिंदे बहुत हद तक एक प्रेम कहानी है भी | लेकिन कैसा प्रेम ? वह प्रचलित प्रेम जैसा है या प्रेम कि कोई नई परिभाषा गढ़ती है | यहीं निर्मल वर्मा नई कहानी आन्दोलन के साथ परिंदे कहानी को जोड़ने का प्रयास करते हैं | इस कहानी में प्रेम को एक नयी दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं | लतिका के भीतर गजब का द्वन्द देखने को मिलता है | वह कभी-कभी क्या चाहती है उसे खुद नहीं मालूम है | एक ओर तो वह अतीत से यानि अपने प्रेम से मुक्त होना चाहती है तो दूसरी ओर उसी खोए हुए प्रेम कि तड़प है जिसकी यादें लगातार लतिका को परेशान करती रहती है और लतिका उन्हीं सुनहरी यादों के सहारे जीवन को जीना चाहती है और उसे ही नियति मानकर उससे चिपके रहना चाहती है | उसके सामने प्रश्न है कि वह कौन सा रास्ता चुने ? आगे बढे या अपने अतीत से चिपके रहे | वह निर्णय नहीं ले पाती है | लतिका गिरीश नेगी के प्रेम धरोहर को संजोकर रखना चाहती है जो कुम्हला गया था | इसी कारण वह ह्यूबर्ट के प्रेम को स्वीकार नहीं कर पाती है बल्कि वह उससे आँखें चुराती है | डॉ. मुखर्जी लतिका को समझाते हैं “लेट द डेड डाई | मरने वाले के संग खुद थोड़े ही मरा जाता है | किसी चीज को न जानना यदि गलत है, तो किसी चीज को न भूलना, जोंक की तरह उससे चिपके रहना, यह भी गलत है |”
परिंदे कहानी कभी-कभी हम पाठकों को भी मानसिक द्वन्द में डाल देती है | मन ही मन यह हमें बहुत कुछ सोचने विचारने पर मजबूर कर देती है | हम यह कहते तो हैं कि लतिका अपने अतीत से चिपके रहना चाहती है लेकिन जब वह परिंदों को एक जगह से दूसरे जगह जाते देखती है तो वह अपने अतीत से निकलना भी चाहती है | वह परिंदों कि तरह उन्मुक्त होना चाहती है | आकाश में उड़ते परिंदों को देखकर वह सोचती है “हर साल गर्मियों की छुट्टी से पहले ये परिंदे मैदान की ओर उड़ते हैं, कुछ दिनों के लिए बीच के इस पहाड़ी स्टेशन पर बसेरा करते है, प्रतीक्षा करते हैं बर्फ के दिनों का, जब वे नीचे अजनबी, अनजाने देशों में उड़ जाएँगे |” यहीं पर हमें परिंदे कहानी के प्रतिकार्य को समझने का भी मौका मिलता है | आखिर ये परिंदे क्या हैं ? यहाँ परिंदे लतिका के उस स्नेहिल हृदय का प्रतीक है | इन परिंदों की खासियत होती है कि ये कभी भी एक स्थान पर नहीं ठहरते हैं | जैसे ही मौसम बदलता है ये भी एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर प्रस्थान करते रहते हैं | इन्हें अपने से प्रेम होता है, लगाव होता है | ये अपनी खुशी के लिए एक मुल्क छोड़कर दूसरे मुल्क कि ओर उड़ जाते हैं | एक निश्चित समय पर, एक स्थान पर रहने के बाद ये अपने गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान कर देते हैं | लेकिन लतिका का ह्रदय ऐसा नहीं कर पाता है | परिंदे के पात्रों और इन परिंदों में यही अंतर है कि ये पात्र एक ही जगह पर ठहर कर रह गए हैं, ये आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं | क्या लतिका अपनी ख़ुशी के लिए अपने अतीत से आगे उड़ नहीं सकती है ? ये पात्र उन पक्षियों कि तरह उन्मुक्त नहीं हैं, बल्कि ये अंतर्मुख होते जाते हैं और संत्राश से ग्रस्त होते चले जाते हैं | सभी के मन में एक ही प्रश्न है कि हम कहाँ जाएं ? मोहन राकेश मुख्य रूप से इन पात्रों की इसी समस्या को इस कहानी में उजागर करना चाहते हैं | धीरे-धीरे लतिका भी इस कैद से मुक्त होना चाहती है | लेकिन प्रश्न यह है की मुक्ति किससे ? तो मुक्ति अपनी स्मृतियों से, पुरानी यादों से | धीरे-धीरे मुक्ति का यह प्रश्न नियति का प्रश्न बन जाता है | नामवर सिंह परिंदे कहानी को इसी मुक्ति से जोड़कर देखते हैं “स्वतंत्रता या मुक्ति का प्रश्न जो समकालीन विश्व साहित्य का प्रमुख प्रश्न बन चला है, निर्मल वर्मा कि कहानियों में प्रायः अलग-अलग दृष्टिकोण से उठाया गया है | एक तरफ से देखा जाए तो परिंदे कहानी के लतिका की समस्या स्वतंत्रता या मुक्ति कि समस्या है | अतीत से मुक्ति, स्मृति से मुक्ति, उस चीज से मुक्ति जो हमें चलाए चलती है और अपने रेले में घसीट ले जाती है | इस कहानी में प्रायः सभी व्यक्ति चरित्र अपने अतीत से मुक्ति के लिए प्रयत्नशील है |”[2]
नई कहानी आन्दोलन पूर्णतः यथार्थ पर बल देने वाला कहानी आन्दोलन है | यह आन्दोलन बाहरी दिखावा, सहानुभूति, उपदेश, आदर्श से बचने वाली कहानी आन्दोलन है | परिंदे कहानी के सभी पात्र खुद तो अकेलेपन का शिकार हैं लेकिन अपने इस अकेलेपन को कभी भी वे किसी पर थोपना नहीं चाहते हैं | सबकी यहाँ अपनी-अपनी, अलग-अलग समस्या है, लेकिन कोई भी पात्र अपनी समस्या या दुःख को किसी दूसरे पात्र के सामने प्रदर्शित नहीं करता है | यह बहुत बड़ी बात है की सभी अपनी स्थिति को एक दूसरे से छिपाने का प्रयास करते हैं | क्योंकि इस कहानी के सभी पात्र यथार्थ को स्वीकार कर चुके हैं | इन पात्रों को अच्छी तरह से पता है कि मैं अपनी दुःख को दूसरों के सामने कितना भी सुनाऊं, कोई मेरा दुःख हर नहीं सकता है | मेरी परिस्थिति को कोई बदल नहीं सकता है | मिशाल के तौर पर डॉक्टर मुखर्जी को ही लीजिए जो हमेशा अपनी स्मृतियों में खोए रहते हैं लेकिन जब वे मिस वुड से बातें करते हैं तो ऐसा दिखावा करते हैं जैसे बहुत खुश हैं “मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी नहीं है मिस वुड मैं सुखी हूँ |”
लतिका का अंतर्मन उसे अपनी वास्तविकता से लगातार दूर लिए जाता है | अब कहानी के शुरुआती प्रसंग को ही लीजिए | कैसे लतिका अपने अकेलेपन, संत्राश, बेचैनी, और अतीत प्रेम को प्रकृति पर थोपना चाहती है, और प्रकृति की आड़ में तार्किक बातें करना शुरू कर देती है | अब जब हम थोड़ा ठहर कर यह विचारकरते हैं तो हमें यह विचार जरुर करना चाहिए कि क्या जिसका प्रेमी मृत्यु को प्राप्त हो चुका है, जो अपने प्रेमी के यादों से बाहर नहीं आना चाहती है और खुद को अकेले रखना पसंद करती है, उसे गिरीश नेगी के साथ बीताए गए पल याद आते हैं और वह उन्हीं यादों में खोए रहती है | वह अपने अतीत से चिपककर रहना चाहती है | जब लतिका का अंतर्मन ही प्रसन्न नहीं है तो क्या उसे बाहर कि प्रकृति पसंद आएगी ? क्या ऐसा संभव है ? लेकिन लतिका अपने अकेलेपन को छिपाने के लिए प्रकृति का सहारा लेती है “इस छोटे से हिल स्टेशन पर रहते उसे (लातिका को) खासा अर्सा हो गया, लेकिन कहाँ समय पतझड़ और गर्मियों का घेरा पाकर सर्दियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता है |” पाठक को यह पढ़ने पर यही लगेगा कि लतिका को प्रकृति से प्रेम है, लेकिन भीतरी सच्चाई यह नहीं है | लतिका को वह हिल स्टेशन नहीं छोड़ना पड़े, वह खुद में गिरीश नेगी कि स्मृतियों के साथ खोई रहे, इसके लिए वह बहाना भी करती है | वह भी घर जाना चाहती है, हिल स्टेशन को छोड़ना चाहती है लेकिन वह अपने मन के द्वन्द के कारण छात्रावास में ही रुकना पसंद करती है | जब छात्राएं उनसे पूछती हैं “मैडम छुट्टियों में क्या आप घर नहीं जा रही हैं |” तब लतिका जो जबाब देती है उसके उत्तर में कितना बनावटीपन है इसे भी देखा जाना चाहिए जब वह कहती है “अभी कुछ पक्का नहीं है - आई लव द स्नो फोल |” यहाँ एक संकेतमात्र है | नामवर सिंह लिखते हैं “नई कहानी संकेत करती नहीं बल्कि स्वयं संकेत है |”[3] निर्मल वर्मा यहाँ पुरानी और नई कहानी को ध्यान से देखने के बाद ही नई कहानी कि विशेषताओं को इस कहानी में पिरोने का प्रयास करते हैं | नामवर सिंह के इस कथन पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो उन्होंने निर्मल वर्मा के लिए कहा है “उन्होंने प्रचलित कहानी कला के दायरे से भी बाहर निकलने कि कोशिश की है, यहाँ तक कि शब्द की अभेद दीवार को लांघकर शब्द के पहले के मौन जगत में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है और वहां जाकर प्रत्यक्ष इन्द्रियबोध के द्वारा वस्तुओं के मूलरूप को पकड़ने का साहस दिखाया है | इसीलिए उनकी कहानीकला में भी नवीनता है |”[4] लतिका में भीतरी द्वन्द कहानी में शुरू से अंत तक बना हुआ है | कहानी में एक प्रसंग आता है जहाँ लतिका को उसी छात्रावास कि छात्र जूली का प्रेम पत्र मिलता है | लतिका सबसे पहले उसके प्रेम पत्र को खुद छिपा लेती है न कि वह उसे समझाती है | वह ऐसा इसीलिए करती है क्योंकि जूली के प्रेम से उसे इर्ष्या होती है क्योंकि उसका खुद का प्रेम फलीभूत नहीं हुआ था लेकिन लतिका में जब धीरे-धीरे परिवर्तन आता है तो कहानी के अंत में वह उसके प्रेम पत्र को, उसको सजा देने के बजाय चुपचाप जूली के तकिये के नीचे रख देती है “शायद कौन जाने जूली का यह प्रथम परिचय हो, जिसे कोई भी लड़की बड़े चाव से संजोकर, संभालकर अपने में छिपाए रहती है, एक अनिर्वचनीय सुख जो पीड़ा लिए है, पीड़ा और सुख को डुबोती हुई, उमड़ते ज्वर कि खुमारी,............जो दोनों को अपने में समा लेती है |” लगभग जब नई कहानी चर्चा में आई थी तब निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे नामवर सिंह को इतनी पसंद आई थी की उन्होंने परिंदे कहानी को सबकी पहली कहानी कहा था “परिंदे निर्मल वर्मा की ही पहली कृति नहीं है बल्कि जिसे हम नयी कहानी कहना चाहते हैं उसकी भी पहली कृति है |”[5] नई कहानी पर बहुत प्रहार भी किया गया लेकिन नई कहानी और निर्मल वर्मा के बारे में नामवर सिंह ने कहा है “परिंदे से यह शिकायत दूर हो जाती है की हिंदी कथा साहित्य अभी पुराने सामाजिक संघर्ष के स्थूल धरातल ‘मार्कटाइप’ कर रहा है | समकालीनों में निर्मल वर्मा पहले कहानीकार हैं जिन्होंने इस दायरे को तोड़ा है बल्कि छोड़ा है, और समाज के मनुष्य की बाह्य आन्तरिक समस्या को उठाया है |”[6] रामदरश मिश्र भी निर्मल वर्मा कि कहानियों के बारे में लिखते हैं कि परिंदे प्रतीक हैं, उन टूटे हुए प्रेमियों की जो अपनी अपनी जगहों से टूटकर उस पहाड़ी स्थान पर एकत्र हो गए हैं | लतिका, डॉक्टर मुखर्जी, मिस्टर ह्यूबर्ट भी तो परिंदे ही हैं किन्तु परिंदे तो एक ठहराव के बाद मैदान की ओर उड़ जाएँगे किन्तु वे तीनों कहाँ जाएंगे ? वे तो उसी सुनसान पहाड़ी स्थान पर एक साथ होते हुए भी अलग-अलग रहने के लिए अभिशप्त हैं | परमानद श्रीवास्तव कहते हैं कि “निर्मल वर्मा की यथार्थ संवेदना आत्मचेतना पर आधारित होने के कारण अधिक गहन और तीव्र है |”[7] निर्मल वर्मा के कथा साहित्य पर अलग-अलग विद्वानों ने अपनी-अपनी राय दी है | इसी सन्दर्भ में आलोचक वीरभारत तलवार कि बातों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए “दूसरों से न जुड़ पाने, अकेले रह जाने अलगावबोध कि स्थिति को निर्मल वर्मा ने अपनी कहानियों का मुख्य विषय बनाया है |”[8] आगे वे लिखते हैं “लतिका का अकेलापन उसकी स्थिति भर है, ऐसी समस्या नहीं जिससे पीड़ित दिखाई देती हो |”[9] वीरभारत तलवार ने इसी में आगे निर्मल वर्मा की कहानियों के बारे में लिखा है कि “निर्मल की कहानी में ब्यौरे नहीं होते बल्कि ब्यौरे में कहानी होती है |”[10]
निष्कर्ष के रूप में आसानी से यह कहा जा ससकता है कि निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे के सभी पात्र अतीत और वर्तमान के बीच के रास्ते को नहीं समझ पा रहे हैं | वे अतीत के साथ जिएँ या उससे निकलकर वर्तमान के साथ आगे बढ़ें | सभी इसी द्वन्द में अपनी अपनी जिन्दगी को जिए जा रहे हैं | निर्मल वर्मा इस कहानी के माध्यम से यह संकेत जरुर करना चाह रहे हैं कि अतीत के साथ चिपके रहना बेवकूफी है | इन्सान को अपने अतीत से निकलकर एक नई जिन्दगी की शुरुआत फिर से करनी चाहिए | अतीत को बिल्कुल याद किया जाना चाहिए लेकिन उसी अतीत के साथ चिपके रहना और अपने को विवेक शून्य कर लेना इस बात में कतई समझदारी नहीं है |
सन्दर्भ सूची
1. सिंह, नामवर, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृष्ठ 54
2. सिंह, नामवर, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृष्ठ 53
3. सिंह, नामवर, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृष्ठ 32
4. सिंह, नामवर, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृष्ठ 64
5. सिंह, नामवर, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृष्ठ 52
6. सिंह, नामवर, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009,
7. श्रीवास्तव, परमानंद, संपादक, अवस्थी, देवीशंकर, आज की कहानी नई कहानी: सन्दर्भ और प्रकृति, राजकमल प्रकाशन, 2008, पृष्ठ 130
8. तलवार, वीरभारत, सामना, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2007, पृष्ठ 164
9. तलवार, वीरभारत, सामना, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2007, पृष्ठ 174
10. तलवार, वीरभारत, सामना, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2007, पृष्ठ 148
कामेंग ई-पत्रिका
www.kameng.in
ISSN : 3048-9040 (Online)
Hemant Kumar Gupta
Research Scholar
Department of Hindi
Tezpur University
Kumarguptah3@gmail.com
Volume 1 | Issue 2 | Edition 1 | Peer reviewed Journal | October, 2025- April, 2026 | kameng.in
शोधालेख
Copyright (c) 2025 कामेंगई-पत्रिका
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-Share Alike 4.0 International License.
Editorial Office
Kameng E-Journal
Napam, Tezpur(Sonitpur)-784028 , Assam
www.kameng.in
kameng.ejournal@gmail.com
डॉ. अंजु लता
कामेंग प्रकाशन समूह
Kameng.ejournal@gmail.com
Mobile : 8876083066
नपाम,तेजपुर,शोणितपुर,असम,-784028
Dr ANJU LATA
Kameng prakaashan Samuh
Kameng.ejournal@gmail.com
Mobile : 8876083066
Napam, Tezpur,Sonitpur, Assam-784028
8876083066/8135073278