सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 19-23 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=30
भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है यहां पर कपास,जूट,अनाज, चाय ,मसाले , फल-सब्जियों आदि की पैदावार आसानी से होती है। चाय उत्पादन में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर है और विश्व के चाय निर्यातक देशों में भारत दूसरा ही स्थान रखता है। चाय बागानों से देश को करोड़ों का मुनाफा हो रहा है। आज चाय बागान सफलता के जिस मुकाम पर है,वहाँ तक पहुँचने में चाय बागान के मजदूरों की अहम् भूमिका है, मजदूरों में भी स्त्री मजदूरों का योगदान चाय बागान को इस मुकाम पर पहुँचाने में अधिक है। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि , चाय बागान में स्त्रियाँ चाय बागान की प्रमुख स्तंभ हैं क्योंकि स्त्रियाँ ही अपने कोमल हाथों को खुरदुरा बनाकर कोमल-कोमल चाय की कलियां और पत्तियां तोड़कर उन्हें फैक्ट्री तक पहुँचाती हैं।इस कार्य में वे पुरूषों से अधिक कुशल होती है। फिर भी उन्हें समानता, अत्याचार और अनगिनत तक़लीफें झेलनी पड़ती हैं। उनके वर्षों की खून-पसीने की मेहनत के कारण ही देश को चाय बागानों से लाभ हो रहा है पर दूसरी ओर जी-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर वर्ग आज भी शोषित हैं, अभावों में ही किसी तरह जीवन काट रहे हैं। समाज और साहित्य एक दूसरे से जुड़े होते हैं। चाय बागान समाज की अभिव्यक्ति भी वहां के साहित्य के हरेक विधाओं में कमोबेश हुई ही है। नाटक, निबंध, उपन्यास, कहानी,और कविता लगभग हर विधा में रचनाकारों ने बेबाकी से चाय बागान समाज पर अपनी कलम चलाई है । उनकी पीड़ा का स्वर कविताओं में भी साफ़ झलकता है ।इस शोध पत्र में चाय बागान की ही स्त्रियों की कलम से निकली चाय बागान की स्री केन्द्रित कविताओं के जरिए यथार्थ के धरातल पर आधारित उनकी समस्याओं को जानने व समझने की कोशिश की जाएगी।
चाय बागान, स्त्री,स्री समस्याएं, क्रेच घर, जीवन संघर्ष
समाज और साहित्य का अत्यंत गहरा और जीवंत संबंध है , साहित्यकार समाज से ही साहित्य की विषयवस्तु ग्रहण करता है और वही साहित्य समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। साहित्य एक प्रकार से समाज के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है जो समाज को वास्तविकता दिखाकर उसके उत्थान के लिए नई राह तलाशता है। समाज में व्याप्त कुरितियाँ जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, जाति प्रथा, छूआछूत आदि सामाजिक विसंगतियों के विविध मुद्दों को साहित्य ने मुखर रूप दिया जिससे समाज में सुधार की चेतना पैदा हुई, नैतिक और मानवीय मूल्यों का विकास हुआ साथ ही अस्मिता से जुड़े प्रश्न उभरकर सामने आने लगे । अतः साहित्य व्यक्ति को सोचने, समझने और प्रश्न करने की क्षमता देता है। साहित्य की प्रबलता के कारण ही आज निम्न से निम्न तबके के लोग भी बेबाकी के साथ अपनी आवाज़ बुलंद कर पा रहे हैं। उनकी पीड़ा शब्दों में पिरोकर लाखों लोगों तक पहुँच पा रही है। साहित्य समाज के बीच के अंतर्संबंधों को विजयदान देथा की पुस्तक ‘समाज और साहित्य’ से समझा जा सकता है जिसमें वे लिखते हैं - “साहित्य का उद्देश्य ही समाज का कल्याण होना चाहिए अर्थात् साहित्य में समाज का मंगलभाव और समाज को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए। वह समाज की भावनाओं के साथ चलता है साहित्य समाज में घटित विकृत व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का काम करता है और समाज के हर पहलू को प्रभावित करता है।”(1)
साहित्य की हर विधा में हमारे समाज की छवि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित होती है।साहित्य के विविध विधाओं के मध्य कविता सहज और सर्वप्रिय है। कविता के विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने निबंध ‘कविता क्या है’में लिखते हैं -”कविता के द्वारा हम संसार के सुख,दु:ख, आनंद और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव कर सकते हैं।”(2)आधुनिक काल से अबतक कविता ने कई सारे अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है। भ्रष्टाचार, अत्याचार और शोषण के दौर में कविता जन जागृति का सशक्त माध्यम जान पड़ती है।
जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है कि समाज और साहित्य का संबंध गहरा है। हर समाज की अपनी एक अलग पहचान होती है वैसे ही चाय बागान समाज की भी अपनी एक अलग जीवन शैली है और भारत के हर क्षेत्र के चाय बागान समाज की जीवन शैली लगभग एक सी है। चाय बागान में काम करने वाली स्त्रियाँ ही चाय बागान की प्रमुख स्तंभ होती है उनके अथाह परिश्रम के बगैर भारत के चाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिलना असम्भव रहता। साल के बारहों महीने आठ घंटे खड़े होकर स्त्रियाँ बागान में पत्तियाँ तोड़ती है। चाय बागान की प्रमुख स्तंभ होने के बावजूद भी चाय बागान की स्त्रियाँ बहुत सारी समस्याओं से घिरी होती है किंतु यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि इन तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद अन्य क्षेत्रों की स्त्रियों की तुलना में चाय बागान समाज की स्त्रियाँ अधिक स्वतंत्र और कर्मठ दिखाई देती हैं। जहाँ कई समाजों में स्त्रियाँ परंपरागत बंधनों में जकड़ी रहती हैं, वहीं चाय बागान की स्त्रियाँ श्रम और अनुभव के माध्यम से अपनी पहचान स्वयं गढ़ती हैं।उनका जीवन हर दिन घड़ी की सुई के मुताबिक चलता हैं सुबह से लेकर रात तक उनका एक निश्चित रूटीन रहता है जिसमें शायद ही कोई बदलाव होता होगा। चाय बागान में स्त्रियाँ सुबह चार बजे ही उठकर घर साफ करके, चूल्हा चौका निपटाकर सात बजे की सीटी(बागान का समयसूचक सायरन) लगते लगते बागान के लिए चींटीयों की तरह कतार में निकल पड़ती हैं । कभी - कभी तो उन्हें खाने तक का समय नहीं मिलता क्योंकि चाय बागान में बहुत कठोर अनुशासन है समय से दो मिनट भी देरी से बागान पहुँचने पर उन्हें घर वापस भेज दिया जाता है और उनको उस दिन के रोजगार से हाथ धोना पड़ता है। समय के चक्रव्यूह में चाय बागान की स्त्रियाँ किस तरह बंधी रहती है उसे चाय बागान की युवा कवियत्री एमलेन बोदरा ने अपनी कविता ‘मेरी माँ’ में दर्शाया है -” बड़े सवेरे चार बजे /रोज उठती मेरी माँ/बर्तन माँझती,खाना बनाती/और झाड़-बुहारती घर -आँगन/सात बजे निकलती घर से/ढोकर पोटली संग अपने और/बांधकर मुझे भी पीठ पीछे अपने/सुखी रोटी चबाते चबाते/कुछ चलकर, कुछ दूर दौड़ कर/और कभी गिरते पड़ते,पहुँचती है दस नम्बर सेक्शन/चाय बागान में,मेरी माँ/घास-फूस के बीच बनी/तिरपाल तम्बू में मुझे छोड़कर/पहनती प्लास्टिक/जैसे पहनते स्कूल यूनिफॉर्म।”(3)
कविता की पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि,चाय बागान की स्त्रियाँ केवल गृहस्थी तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी परिवार का मजबूत आधार होती हैं। वे पुरुषों के समान बागानों में श्रम करती हैं, चाय पत्तियाँ तोड़ती हैं और परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। भारत सरकार ने मजदूरों के हित में 1951 में कुछ नियम पारित किए थे जिसमें कामकाजी मजदूर महिलाओं के बच्चों की देखभाल के लिए ‘द प्लांटेशन एक्ट 1951’ में क्रेच घर का प्रावधान है जिसमें मुख्य चार बिंदुओं को केन्द्रित किया गया है -
“(a) provide adequate accommodation;
(b) be adequately lighted and ventilated;
(c) be maintained in a clean and sanitary condition; and
(d) be under the charge of a woman trained in the care of children and infants.”(4)
प्लांटेशन एक्ट के पारित होने के इतने वर्ष बाद भी चाय बागानों की हालात काफ़ी खस्ता है। आज भी कई सारे बागानों में क्रेच घर की सुविधा नहीं है इसलिए महिलाएं बेबस होकर अपनी पीठ पर नन्हें शिशु को बांधकर ही चाय बागान जाती हैं। उनकी इस दयनीय स्थिति को बिमला भोक्ता अपनी कविता ‘मेरी माँ का बेतरा’ (बेतरा- बच्चें को पीठ में बांधने वाला कपड़ा)में बयां करती है -”
“तीन महीने की थी मैं नन्हीं जान/,जिसकी काया थी बिल्कुल नर्म/उस नन्हीं जान को बेतरा में बांधे चलाती थी/बेतरा में बांधे डेगती थी नाला/सर पे ढोती थी चालीस-पचास किलो पत्ती/…..
मैंने भी सपने देखे पर मखमली शय्या पर नहीं/देखा मैंने भी सपना चाहबुदा तले/चाहबुदा तले ही मैंने जाना/मुझे नसीब नहीं जानसन की पाउडर और क्रीम!/मुझे नसीब नहीं लाल -लाल और गुलाबी गाल!/मुझे तो नसीब है चिलचिलाती धूप में/मेरी मा के बेतरा में दुबककर धूप सेंकना!/मुझे नसीब है माँ के बेतरे में/माँ की पीठ का पसीना!”(5) इस तरह हम देख सकते है कि तीन महीने की नन्हीं जान अपनी माँ की पीठ से सटकर व्यवस्था की मार सहती है, कठोर जीवनशैली की साक्षी बनती है।
चाय बागानों का भौगोलिक परिवेश दुर्गम होता है। घने जंगल, पहाड़ियाँ, जंगली जानवर और सीमित संसाधनों के बीच जीवन यापन करना आसान नहीं होता। ऐसे वातावरण में रहने वाले लोग भय से नहीं, बल्कि परिस्थितियों से समझौता कर आगे बढ़ना सीखते हैं जैसे मानो समझौता उनके जीवन का अभिन्न अंग हो। चाय से देश को तो करोड़ों रूपयों का मुनाफा हो रहा है लेकिन चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों को आठ घंटे खड़े होकर खटने पर भी मात्र 232 रू० दैनिक मजदूरी मिलती है। इतने कम पैसों में उन्हें गुजारा करना पड़ता है इसलिए वे एक-एक रू० सोच समझकर खर्च करती हैं। चाय बागान की स्त्रियों के संघर्ष को युवा कवियत्री ज्योत्सना मिंज अपनी कविता ‘चाय बागान की सशक्त स्त्री’ में लिखती हैं -”धूप,सर्दी या हो वर्षा,हर मौसम में कमाती हैं/साल के बारहों महीने अपना बदन जलाती है/बस कुछ ही रूपयों के लिए वो हर दिन/पसीना बहाती हैं/गर दी जाय कभी बस पाँच रूपया डबली/तो खुद के लिए वह इतवार भी न बचाती है। “(6)
कविता की पंक्तियों में दिया गया शब्द ‘डबली’ का अर्थ है अतिरिक्त आमदनी अर्थात् चाय बागान में मजदूरों को एक दिन में पच्चीस के. जी. चाय पत्ती तोड़ने पर ही दिनभर की दैनिक मजदूरी मिलती है और पत्ती का वजन कम होने पर उनके मजदूरी में भी कटौती कर दी जाती है वहीं पच्चीस के. जी. से ज्यादा पत्ती तोड़ने पर उनकी मजदूरी में भी बढ़ोतरी होती है उसे ही डबली कहते हैं लेकिन महँगाई के इस दौर में भी एक के. जी. डबली का मूल्य सिर्फ ‘डेढ़ रूपया’ है जिसे पाने के लिए महिलाएं छुट्टी के दिन भी काम जाती है ताकि ज्यादा पत्ती तोड़ कर वेतन में वृद्धि हो सके। पत्तियाँ तोड़ते समय उनके हाथ कई बार छिल जाते हैं वे उन्हीं छीलें हाथों से लगातार काम करती है। जेरेलडिना मुचवार ने अपनी कविता ‘माँ के हाथ’ में इस दर्द को बयां किया है -” मैंने देखा/गायब हो गई है/माँ के हाथों की कोमलता/खुरदुरे और फटे हुए/अंदर के लाल मांस बाहर झांकते हुए/फिर भी माँ /उसी फटे-छिले हाथों से/लगातार /तोड़ती रहती है पत्तियां“(7)
हमारे देश भारत में जहाँ देश को ही माता कहा जाता है और लड़कियों को देवी का रूप माना जाता है वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में लड़कियों की सुरक्षा आज भी गंम्भीर चिंता का विषय है। “नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2021 के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन औसतन 86 से अधिक रेप (बलात्कार) मामले दर्ज किए जाते हैं।”(8) ये आंकड़े तो दर्ज की गई रिपोर्ट के हैं न जाने कितने मामले तो दर्ज ही नहीं किए जाते और दिन-ब-दिन ऐसी घटनाओं की संख्याओं में बढ़ोतरी हो रही है।चाय बागान की स्त्रियां भी हैवानियत की इस दृष्टि से नहीं बच पाई हैं।
मरीना एक्का लिखती है - “पीठ में उरमाल लादे नवजवान स्त्रियों को/तिरछी नजरों से देख-देख कर/मन ही मन मुस्काए जा रहे हैं/बातों - बातों में ललचाए जा रहे हैं/बुदाओं के बीच पगडंडी में/बाबू साहब इतराये जा रहे हैं।” (9)
चाय बागान में होने वाले यौन उत्पीड़न और बलात्कार के 95 प्रतिशत मामले दर्ज नहीं हो पाते उनके पास न तो इतने पैसे होते हैं कि वे कोर्ट-कचहरी, पुलिस थाने के चक्कर लगा सके और न ही इतने जागरूक हैं कि निःशुल्क कार्यवाही के लिए सरकारी सहयोग ले सके।चाय बागान की स्रियों का जीवन निरंतर संघर्ष और साहस की माँग करता है। प्राकृतिक आपदाएँ, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी , शिक्षा का अभाव और आर्थिक तंगी के बावजूद वे हार नहीं मानतीं। बच्चों का पालन-पोषण, परिवार की देखभाल और श्रमिक जीवन की कठिनाईयों को वे साहसपूर्वक निभाती हैं। भारत में चाय उत्पादन की शुरुआत सन 1839-1840 में असम से हुई थी और कुछ वर्षों के अंतराल में ही चाय उत्पादन क्षेत्र का विस्तार बंगाल,केरल ,तमिलनाडु आदि जगहों में भी हो गया और लगभग एस सौ छियासी वर्ष चाय बागानों में खटने के बाद भी जहां वे रह रहे हैं उस जमीन पर उनका कोई मालिकाना अधिकार नहीं है, आज भी वे भूमिहीन हैं। उनके पूर्वज झारखंड,उड़ीसा, नेपाल आदि जिस भी क्षेत्रों से चाय बागान में रोजी - रोटी की तलाश में आए थे वे यहीं बस गए और वहाँ से भी उनका अस्तित्व मिट चुका है इस तरह वे अपनी जड़ों से उखड़ गए और एक बंधुवा मजदूर के रूप में उनकी पहचान बन गई। बागान की व्यवस्था ने उन्हें इस तरह जकड़ा हुआ है कि वे अपनी अवस्था सुधारने में असमर्थ हैं।प्रफुल्ला मिंज इस बंधे जीवन पर लिखती हैं -”घिसे चप्पल,फटे झोले/सुखी रोटी, पुराने छाते/प्लास्टिक,तिरपाल, रस्सी बांधे/बीत गई हमारी सारी जिंदगी।“(10)
चाय बागान की स्त्रियाँ निरुद्देश्य ही जीवन काट रहीं हैं,इस उलझनों से भरी जीवन में समझ ही नहीं पाती कि वह खाने के लिए काम कर रही है या काम करने के लिए खा रही है ।उनके ज़हन में अक्सर यह सवाल उठता है कि,-”क्या मेरे हिस्से में सिर्फ/गोबर के उपले बनाना/लकड़ियों का गट्ठर ढोना/आधी नींद सोना/मीलों पैदल चलना/सुखी रोटी खाना और /पत्तियां तोड़ना ही होगा?”(11)
ऐसे कई सारे प्रश्नों से चाय बागान समाज घिरा हुआ है जिसके निवारण का किसी को ध्यान नहीं। आज देश तरक्की की बुलंदियों को छू रहा है लेकिन यह तरक्की चाय बागान की ओर पहुँच ही नहीं पाई है इसके कई पहलू हो सकते हैं। एक पहलू की ओर इशारा करते हुए एमलेन बोदरा लिखती हैं -”जिन हाथों ने कभी/चाय की पत्तिया नहीं तोड़ी/आठ घंटे खड़े रहकर,और चलकर मीलों/जिनके कन्धों ने नहीं ढोया/कच्ची पत्तियों का वजन कभी/एक दिन की खुराक के लिए भी/नहीं किया हो संघर्ष कभी/उजड़ने का दर्द नहीं जाना कभी जिन्होंने/वे क्या लड़ेंगे हमारे लिए/ इसलिए साथी अब/तुम्हें ही लड़ने होंगे अपने लिए/उठाने होंगे जोखिम/अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए/लिखना होगा नया इतिहास तुम्हें।”(12) यहां कवियत्री कविता के माध्यम से चाय बागान के लोगों को समस्याओं से पार लगाने वाले किसी उद्धारकर्ता की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने हक के लिए एकजुट होकर आवाज़ उठाने को प्रेरित करती हैं।
अतः चाय बागान में स्त्रियाँ बागान की रीढ़ होती हैं जो साहस, कर्मठता , निडरता और आत्मनिर्भरता की जीवंत मिसाल हैं। भयंकर आर्थिक तंगी और कठोर परिश्रम से घिरे संघर्षमय जीवन में भी वे अपने परिवार को जोड़कर रखती है, मेहनत करके बच्चों को पढ़ाती हैं ताकि उन्हें बागान की क्रूरता,बंधुवा मजदूरी ,दमननीति न झेलनी पड़े। ये कविताएं इन सारे ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दों को बड़ी ईमानदारी और जीवंतता के साथ स्वर देती हैं।
संदर्भ सूची:-
1.देथा, विजयदान, साहित्य और समाज.जोधपुर राजस्थानी शोध संस्थान,1960. पृष्ठ संख्या 5.
2.शुक्ल, आचार्य रामचंद्र , कविता क्या है. देखा 2/1/2026.(सुबह 8:30 बजे) https://share.google/UMyWrxnrX5kYoJMWa.
3.बोदरा,एमलेन,मेरी माँ.चाय की सिसकियाँ.स.वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’.प्रथम संस्करण.राँची झारखण्ड एक्सप्रेस,2024.पृष्ठ संख्या 14.
4.द प्लांटेशन लेबर एक्ट ,1951.देखा 3/1/2026. (सुबह 6:30 बजे)Source: India Code https://share.google/IQn75NNmfijhqDlJK.
5.भोक्ता,बिमला,मेरी मांँ का बेतरा.बंगाल में हिंदी दलित और आदिवासी कविता.स.डॉ कार्तिक चौधरी और संदीप प्रसाद.प्रथम संस्करण.दिल्ली अधिकरण प्रकाशन,2021.पृ.सं 145.
6.मिंज, ज्योत्सना, चाय बागान की सशक्त स्री.चाय की सिसकियाँ.स.वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’.प्रथम संस्करण.राँची झारखण्ड एक्सप्रेस,2024.पृष्ठ संख्या 93.
7.वहीं , पृष्ठ संख्या 105.
8. रेप इन इंडिया- विकीपीडिया देखा.15/1/2026.(रात:10 बजे) https://share.google/ORHoX8fsFMey3vyBc.
9.एक्का मरीना, चाय बागान की सशक्त स्री.चाय की सिसकियाँ.स.वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’.प्रथम संस्करण.राँची झारखण्ड एक्सप्रेस,2024.पृष्ठ संख्या 52.
10.मिंज, प्रफुल्ला , बंधुवा मजदूर.बंगाल में हिंदी दलित और आदिवासी कविता.स.डॉ कार्तिक चौधरी और संदीप प्रसाद.प्रथम संस्करण.दिल्ली अधिकरण प्रकाशन,2021.पृ.सं 153.
11.वहीं, पृष्ठ संख्या 158.
12. बोदरा, एमलेन,झण्डे. प्रतिरोध में कविता.स.रंजीत वर्मा.वाराणसी अगोरा प्रकाशन,2021.पृष्ठ संख्या 107.
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