सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 24-28 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=31
डॉ. मामोनी रायसम गोस्वामी का साहित्यिक जीवन का प्रथम उपन्यास ‘चेनाबर स्त्रोत’ कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित है और वहाँ अस्थायी रूप से रहकर काम करने वाले मजदूरों के जीवन संघर्ष को केंद्र में रखता है। यह उपन्यास लेखिका के प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित होने के कारण मजदूरों की असुरक्षा और शोषण का अत्यंत यथार्थपूर्ण रूप में उभरता है। उपन्यास में पूंजीवादी व्यवस्था की अमानवीय नीतियों और श्रमिकों की उपेक्षित स्थिति का गहरा विश्लेषण मिलता है। कथा में विकसित होती सामूहिक चेतना श्रमिक वर्ग के भीतर प्रतिरोध और अधिकार-बोध को रेखांकित करती है। इन बातों को केंद्र में रखते हुए प्रस्तुत अध्ययन उपन्यास के सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना की गहराई को समझने का प्रयास करता है। समग्र रूप से यह कृति श्रम जीवन की गरिमा और संघर्ष का महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज सिद्ध होती है।
मजदूर, जीवन संघर्ष, पूंजीवादी व्यवस्था, सामूहिक चेतना, मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, श्रम जीवन, प्रत्यक्ष अनुभव, सामाजिक दस्तावेज
डॉ. मामोनी रायसम गोस्वामी उर्फ इंदिरा गोस्वामी असमिया साहित्य जगत की प्रतिष्ठित एवं प्रख्यात साहित्यकार हैं। आधुनिक असमिया साहित्य की समृद्ध परंपरा की वे उद्भावक मानी जाती हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसे सर्वोच्च सम्मान प्राप्त कर उन्होंने आधुनिक भारतीय साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में भी उनका व्यक्तित्व अत्यंत सम्मानित माना जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में वह एक अध्यापिका के रूप में दीर्घकाल तक सक्रिय रहीं और साहित्यिक साधना के साथ-साथ अकादमिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘चेनाबर स्त्रोत’ आधुनिक औद्योगिक समाज के अंतर्विरोधों का मर्मस्पर्शी दस्तावेज है। इसमें पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर श्रम की गरिमा, मजदूर जीवन की कठिनाइयाँ तथा औद्योगिक सभ्यता के कारण प्रकृति और मानवीय संवेदना के विनाश को अत्यंत गहराई से व्यक्त किया गया है। चेनाब नदी की गर्जन तथा लहरों में बहते मजदूरों के जीवन-संघर्ष और अदम्य जिजीविषा का सजीव वर्णन इस उपन्यास का केंद्रीय विषय है। स्वयं लेखिका ने उपन्यास के प्रारंभ में यह स्पष्ट किया है कि, “चेनाबर स्त्रोत मेरा पहला उपन्यास है। हालांकि यह उपन्यास पुस्तक के रूप में 1972 में प्रकाशित हुआ, परंतु मैंने इसे 1964 में लिखना प्रारंभ किया था। यह उपन्यास असम के लोकप्रिय समाचार पत्र ‘दैनिक असम’ के विशेष अंक में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में उस समय के प्राइवेट कंपनियों में काम करने वाले श्रमिकों के जीवन और परिस्थितियों का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास मैंने बहुत कम उम्र में लिखा था। लेकिन कश्मीर की चंद्रभागा नदी (चेनाबर) पर बने पुल-निर्माण में कार्यरत श्रमिकों की उस समय की वास्तविक स्थिति का चित्रण इसमें हुबहू किया गया है। मैं स्वयं अपने पति माधवेन रायसोम के साथ उस समय श्रमिकों के कैंप में लगभग एक साल तक रही। यहीं एक दुर्घटना में मेरे पति माधवेन रायसम की मृत्यु हो गई।”1 इस प्रकार उपन्यास की रचना केवल रचनाकार की कल्पना नहीं, बल्कि श्रमिक जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव और व्यक्तिगत त्रासदी से उपजा हुआ यथार्थ है। लेखिका जब कश्मीर के चेनाब नदी पर पुल-निर्माण स्थल पर रहीं, उसी क्षण श्रमिकों के सुख-दुःख एवं संघर्ष से भरा उनका कठोर दैनिक जीवन उनके हृदय में गहराई से अंकित हो गया। उन्होंने स्वयं उल्लेख किया है कि यह उपन्यास उसी निर्माण-स्थल की पृष्ठभूमि में आकार लिया। अपने पति की नौकरी के दौरान जब लेखिका कश्मीर में रहने लगे थे, तभी उस कश्मीर के चेनाब नदी पर काम करने वाले मजदूरों तथा श्रमिकों के जीवन को जिस निकटता से उन्होंने देखा और अनुभव किया, वही इस उपन्यास की मूल कथा बन गया।
उपन्यास में मजदूर जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनके संगठनहीन और बिखरे हुए जीवन का चित्रण है। कथानक में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि मजदूरों के बीच सामूहिकता का अभाव, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी, निजी कंपनियों की कठोर नीतियाँ और शासन सत्ता का निरंतर दबाव ये सभी कारण मिलकर उन्हें अत्यधिक शोषण की स्थिति में धकेल देते हैं। संगठित शक्ति के अभाव में वे अपनी कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए भी आवाज उठाने में असमर्थ रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनेक बार उन्हें अपने प्राणों तक की आहुति देनी पड़ती है। यहाँ पुल-निर्माण की पृष्ठभूमि में चेनाब नदी का भयावह और खतरनाक स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरा है। लेखिका ने इसे अत्यंत यथार्थपूर्ण शब्दों में इस प्रकार चित्रित किया है, “कभी-कभी रात में चेनाब की मंद कलकल ध्वनि भी भयावह रूप धारण कर लेती है। उसके दोनों किनारों के पत्थरों का कोई निशान दिखाई देता। चारों ओर बस पानी ही पानी!! नदी के किनारे पर कंपनी द्वारा रखे गए बालू के बोरे, लोहे की राडें और शटरिंग प्लेटें सब की सब प्रचंड लहरें बहा ले जाती हैं। ठीक ऐसे ही समय में इस भयावह पानी के ऊपर काम करने वाले मजदूरों के प्रति सोनी को दया आती है।”2 यह कथन लेखिका ने स्त्री पात्र सोनी के मन में उभरने वाले करुण भावों के माध्यम से प्रस्तुत किया है, जिससे मजदूरों की भयावह परिस्थितियों और उनकी असुरक्षित जीवन स्थितियों का मार्मिक चित्र उभरता है। यह उन खतरनाक परिस्थितियों को दर्शाता है, जिनमें मजदूर दिन-रात कार्य करते हैं। उनकी सुरक्षा, जीवन मूल्य और अस्तित्व सब कुछ कंपनी की इच्छा पर निर्भर है।
उपन्यास में प्रकृति के विनाश और औद्योगिक विकास के बीच उत्पन्न द्वंद को लेखिका अत्यंत संवेदनशीलता से उभारती हैं। कथा की शुरुआत स्त्री पात्र सोनी के अपने बचपन के खेतों की हरियाली स्मृति से होती है, जहाँ कभी हरियाली, शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का विस्तृत संसार था। अब वही स्थान मशीनों, कंक्रीट और औद्योगिक उपकरणों के शोर से भर चुका है। लेखिका ने पात्र सोनी के माध्यम से इस बदलाव की मार्मिकता को तीखे रूप में अभिव्यक्त किया है, “खेत के पास आकर सोनी ने देखा कि खेत की वह साफ-सुथरी, कोमल घास अब गायब हो चुकी है। उस घास की जगह अब क्रेन का बकेट, ऑक्सीजन सिलिंडर, ग्रेब, पाइप, कंक्रीट की प्लेट, क्रेशर के औजार आदि इस्तेमाल किए हुए सामान पड़े हैं। ये सब वस्तुएँ सोनी के लिए बचपन से ही परिचित थीं। इन्हीं के बीच खेल-कूद करते हुए ही सोनी बड़ी हुई थी। आज अचानक उसी कोमल, हरी-भरी घास को अदृश्य कर देने वाली कीचड़ से ढकी पीतल रंगी मशीनें और उपकरण सोनी को किसी कुरूप दाग जैसी लगीं।”3 इस वर्णन के जरिए यह स्पष्ट होता है कि विकास के नाम पर प्राकृतिक जीवन और ग्रामीण सौन्दर्य किस प्रकार निर्मम रूप से नष्ट हो रहा है, और यही परिवर्तन सोनी के भीतर गहरा मानसिक आघात उत्पन्न करता है।
कथा में राघामा, एक स्त्री पात्र, अपने पति सदाशिव की सुरक्षा को लेकर लगातार भय और चिंता में रहती है, क्योंकि पति सदाशिव को कंपनी के इंजीनियर के क्वार्टर में रातभर पहरा देना पड़ता है। श्रमिकों के बीच व्याप्त असुरक्षा की भावना इतनी गहरी है कि राघामा को हमेशा डर सताता है कि कहीं उसका पति सदाशिव भी सोनी के पति गौरीशंकर की तरह दुर्घटना का शिकार न हो जाए। यह प्रसंग श्रमिकों के जीवन में व्याप्त जोखिम, भय और अस्तिरता का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है। साथ ही लेखिका ने राघामा के अनुभवों के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया है कि कंपनी और उसके मालिकों की क्रूर, अमानवीय मानसिकता रोजमर्श की वास्तविकता है।
उपन्यास में सामाजिक असमानता और वर्ग-संघर्ष एक प्रमुख पहलू है। कंपनी के अधिकारी और मजदूर वर्ग के बीच व्याप्त विभाजन सत्ता और पूँजी के असमान विभाजन को उजागर करता है। इंजीनयर, बाई साहेबा जैसे पात्र पूँजी और सत्ता का प्रतीक हैं, जबकि सदाशिव, रामबीर, शिवान्ना, राघामा, सोनी आदि शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें श्रम के बावजूद सम्मान नहीं बल्कि घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। यहाँ मजदूरों के सहज और सरल जीवन- सघर्ष, पीड़ा और अस्तित्व के प्रश्नों को विस्तार से दिखाया गया है। ऊँची इमारतें और भव्य परियोजनाएँ बनाने वाले मजदूर अपनी मेहनत और श्रम के बावजूद दबे हुए हैं, समाज उन्हें नजरअंदाज करता है और उन्हें सम्मान नहीं देता।
उपन्यास का सबसे मार्मिक पक्ष है मजदूर सदाशिव के साथ घटित घटना, जो शोषण और अमानवीयता की परकाष्ठा को उजागर करती है। कंपनी के सत्ता की तथा अधिकारियों द्वारा उसे जबरन शराब पिलाना और झूला पुल पर दौड़ने के लिए मजबूर करना केवल एक प्रसंग नहीं बल्कि सत्ता और पूंजीवादी के गठजोड़ की क्रूर मानसिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सदाशिव तथा उड़िया बूढ़े मजदूर के साथ किया गया अपमानजनक व्यवहार सत्ता- संरचना की नृशंसता को रेखांकित करता है। कंपनी अधिकारी वर्ग मजदूरों को मनोरंजन की वस्तु मानते हैं। यह दृश्य श्रम जीवन की त्रासदी को हृदय विदारक रूप से उभारता है। एक सैन्य ड्राइवर का कथन, “बेईमान! सब बेईमान! बाई साहेबा बेईमान, साहब बेईमान, सरकार बेईमान। हड्डी की पानी कर दे- चालीस साल खून देकर उनके पैर धोए और पेंशन में मिलेगा इतना-सा पैसा!”4 सदाशिव के मन में पहली बार गहरी वितृष्णा और विद्रोह की चिंगारी उत्पन्न करता है। परंतु कंपनी अधिकारियों द्वारा किए गए अपमान और अमानवीय व्यवहार के परिणामस्वरूप सदाशिव की मृत्यु हो जाती है। उनकी यह करुण परिणति प्रस्तुत उपन्यास में विद्रोह की चेतना को और तीव्रता से जाग्रत करती है। पात्र शिबान्ना के नेतृत्व में मजदूरों के बीच धीरे-धीरे संगठन की भावना जन्म लेती है। सदाशिव की मृत्यु के बाद श्रमिकों में आक्रोश बढ़ता है और वे यूनियन गठन का निश्चय करते हैं। लेकिन कंपनी-अधिकारी दिखावती सहानुभूति दिखाकर विरोध को दबाने की कोशिश करते हैं।
उपन्यास के पात्र रामबीर के कथनों के जरिए सदाशिव के मौत का मार्मिक चित्रण इस प्रकार अभिव्यक्त किया है, “सदाशिव का पेट थोड़ा सा उभरा हुआ था। इसके अलावे उसके शरीर पर कही भी किसी चोट का कोई निशान नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे सदाशिव गहरी शांति से सो रहा हो। मृत्यु के आघात से मानव शरीर की भयावह रूप में टूटे बिखरे हुए रामबीर बुजुर्ग ने कई बार देखा था, लेकिन सदाशिव के शरीर पर उस भयावहता का जरा भी चिह्न नहीं था मानो मृत्यु उसके जीवन में एक शांत छाया बनकर आई हो।”5 इस अंश में रामबीर का कथन मजदूर जीवन की करुण सच्चाई को अत्यंत मार्मिक रूप से उजागर करता है। सदाशिव का शांत मृत्यु का दृश्य रामबीर को भीतर तक झकझोर देता है, क्योंकि उसने अपने जीवन में मजदूरों की अनेक भयावह मौतें देखी हैं। दुर्घटनाएं, अव्यवस्थित श्रम स्थितियों, भूख, थकान और अभाव से उपजी मौतें। लेकिन सदाशिव का शरीर बिना किसी घाव या विकृति के है, मानों वर्षों का थकान और अथक संघर्ष के बाद उसे पहली बार वास्तविक विश्राम प्राप्त हुआ हो। यह दृश्य उन मजदूरों के जीवन का गहरा प्रतीक बन जाता है, जिन्हें जीवित रहते हुए कभी शांति, सुरक्षा और सम्मान नसीब नहीं होता। उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि पहले भी कई मजदूर
दुर्घटनाओं में मारे गए, पर कंपनी न सुरक्षा देती है, न उचित इलाज। नाम मात्र का अस्पताल भी बाढ़ में बह जाता है। दवाइयाँ देर से पहुँचती हैं और आयोडिन में पानी मिलाया जाता है। कई घायल मजदूर अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। उपन्यास का कथानक बताता है कि, “साइट पर काम करते समय अचानक होने वाली दुर्घटनाओं में रोजाना न जाने कितने मजदूर घायल हो जाते हैं... कंपनी नाम मात्र के लिए एक छोटा सा अस्पताल खोल रखा है। कभी-कभी दवाइयाँ ट्रक में लादकर वहां लाई जाती हैं। नाम के एक कम्पाउण्डर को छोटे-छोटे शाखाओं में रखा जाता है...लेकिन अक्सर ये तिरपाल से घिरे अस्पताल चेनाब नदी में बाढ़ आने पर दवाइयों समेट बह जाते हैं।”6 उपन्यास में स्त्री-श्रमिकों की पीड़ा भी सोनी, पार्वती, राघामा और धनमई जैसे स्त्री पात्रों के माध्यम से अत्यंत मार्मिक रूप से उभरती है। इन पात्रों के जीवन संघर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि श्रम संस्कृति में स्त्री-देह, मातृत्व और स्त्री-अस्मिता के प्रति समाज का उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण दिखाई देता है।
चेनाब की उग्र लहरें उस विकास यात्रा की साक्षी हैं, जो मजदूरों के पसीने, श्रम और बलिदान से निर्मित हुई है, किंतु विडम्बना यह है कि उनके दुःख, संघर्ष और अस्तित्वगत पीड़ाएं समाज की दृष्टि से अक्सर ओझल बनी रहती हैं। इन्ही अनुभवों के बीच सोनी के भीतर एक नव चेतना आती है, दुःख और अपमान की आग में तपकर वह अपने भीतर विद्रोह, साहस और गर्व का एक नया स्वर खोज लेती है। यह स्वर आगामी श्रमिक-आंदोलन और श्रमिक संगठन के संकेतों से भरा है, “सदाशिव की मृत्यु के दुःख के बीच उसके मन में गर्व की भावना उठी। सोनी समझ गई कि अब इस प्राइवेट कंपनी में यूनियन बनकर रहेगी। बातें आग की तरह फैल रही थीं और किसी भी क्षण सब कुछ भड़क सकता था।”7
निष्कर्ष
अत: यह कहा जा सकता है कि प्रस्तुत उपन्यास मजदूर जीवन और उनके संघर्ष, शोषण और औद्योगिक समाज के कठोर यथार्थ का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। व्यक्तिगत अनुभव और संवेदना के आधार पर लेखिका ने श्रमिकों की असुरक्षा और वर्ग विभाजन आदि को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है पात्र सदाशिव की मृत्यु और श्रमिकों में जन्म लेता विद्रोह यह संकेत देता है कि अन्याय के बीच भी प्रतिरोध और संगठित चेतना संभव है। यही स्वर आधुनिक समाज में श्रमिक अस्मिता, श्रम गरिमा और मानवीय अधिकारों की पुनर्स्थापना की दिशा में पहला कदम है। इस प्रकार ‘चेनाबर स्त्रोत’ न केवल एक सामाजिक उपन्यास है, बल्कि श्रम-संघर्ष, मानवीय करुणा, वर्ग विरोध और औद्योगिक समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करने वाला एक ऐतिहासिक साहित्यिक धरोहर है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
संदर्भ एवं सहायक ग्रंथ सूची :
1. गोस्वामी, मामोनी रयसम. चेनाबर स्त्रोत, गुवाहाटी: चन्द्र प्रकाश, 2011, पृष्ठ-6
2. गोस्वामी, मामोनी रयसम. चेनाबर स्त्रोत, गुवाहाटी: चन्द्र प्रकाश, 2011, पृष्ठ-17
3. गोस्वामी, मामोनी रयसम. चेनाबर स्त्रोत, गुवाहाटी: चन्द्र प्रकाश, 2011, पृष्ठ- 7
4. वही, पृष्ठ-62
5. वही, पृष्ठ-71
6. वही, पृष्ठ- 74
7. वही, पृष्ठ-72
8. ठाकुर, डॉ. नगेन, संपा. सौ वर्षोंर असमिया उपन्यास. गुवाहाटी: ज्योति प्रकाशन, आवृत्ति संस्करण, 2018.
9. गोस्वामी, मामोनी रयसम. आधालेखा दस्तावेज. गुवाहाटी: चन्द्र प्रकाश, 2011.
10. बरगोहाईं , होमेन. संपा. असमिया साहित्यर इतिहास, गुवाहाटी: संचालक, आनदंराम बरुआ भाषा कला-संस्कृति संस्था, 2017
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Dr. Dimpee Borgohain
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