सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 29-34 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=32
आदिवासी समाज सदियों से अनेक समस्याओं के साथ जूझते हुए आए है। समय के साथ उनके जीवन में कई सारे बदलाव आए हैं। आधुनिक सामाजिक व्यवस्थाओं ने उनके जीवन को अधिक विसंगतिपूर्ण बना दिया है। जिसके कारण वे अब दोहरे जीवन शैली में जीने को मजबूर है। ऐसी परिस्थिति में उनके सामने आर्थिक अभाव तथा अस्तित्व का गंभीर रूप लेकर प्रकट होता है। ऐसी परिस्थिति उनको कई बार गलत रास्तों की ओर धकेल देते हैं। यही यथार्थ को संजीव अपने उपन्यास ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया है। इसमें किस प्रकार आदिवासी समुदाय दोहरे शोषण का शिकार होते है और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण किस प्रकार डाकू बनने को मजबूर होते है उसको दिखाया है। इसमें आदिवासी जीवन के त्रासदी के साथ सामाजिक व्यवस्थाओं के खोखले स्वरूप को दिखाया गया है।
आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन, विस्थापन, शोषण, संघर्ष, अस्तित्व-संकट, सांस्कृतिक पहचान, उपेक्षा, प्रतिरोध, प्रकृति, हाशियाकरण, दमन, गरीबी, अन्याय, संवेदना, जीवन-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ, आदिवासी विमर्श, मानवीय त्रासदी
संजीव हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार है। संजीव को आदिवासी साहित्य के प्रमुख कथाकार के रूप में भी जाना जाता है।‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ कथाकार संजीव के बहुचर्चित उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास में कथाकार ने थारू आदिवासी समुदाय के समस्याओं का गहराई चित्रण किया है। संजीव का यह उपन्यास कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। आदिवासी जीवन पर केन्द्रित यह उपन्यास मनुष्य की भावनाओं और पीड़ाओं का साक्षी है, क्योंकि संजीव मानवीय संवेदनाओं के लेखक हैं। “संजीव पर कार्ल मार्क्स के विचारों का गहरा प्रभाव है। इसी कारण उनके साहित्य में शोषकों के प्रति हमेशा ही घृणा की भावना तथा शोषितों के प्रति दया एवं सहानुभूति रही है और शोषकों के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देने वाली भावना दिखाई देत्ती है।”1
उन्होंने इस उपन्यास में आदिवासी जीवन के असंतोष एवं विद्रोह को उजागर करने का प्रयास किया है। साहित्यकार संजीव ने आदिवासी जीवन के सभी पहलुओं को अपनी रचनाओं में शामिल करने का प्रयास किया है। ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ उपन्यास के संदर्भ में प्रो. यशवंतकर लिखते हैं- “संजीव ने आदिवासियों की दशा और परिणामों का विवेचन मानवीय संवेदना के परिप्रेक्ष्य में किया हैं, अर्थात् उपन्यासकार ने उनकी त्रासदी और संघर्ष को वाणी देने का प्रमाणिक प्रयत्न किया है।”2
इस उपन्यास की पृष्ठभूमि है ‘मिनी चम्बल’ के नाम से प्रसिद्ध बिहार के पश्चिम चम्पारण इलाका। यह इलाका पूर्णतः डाकुओं के चंगुल में फँसा हुआ है। डाकू समस्या के साथ-साथ यहां आदिवासियों पर धार्मिक, राजनीतिक शोषण और अत्याचार का वास्तविक स्वरूप भी सामने आया है। इस उपन्यास को एक आंचलिक उपन्यास बनाम आदिवासी जीवन के मर्म के तौर पर भी देख सकते हैं। क्योंकि इसका पूरा कथानक ही अंचल विशेष और यहाँ के आदिवासी समुदाय के लोगों के जीवन- बोध पर आधारित है। इसमें मुख्य पात्र के रूप में ‘कुमार’ और ‘काली’ हैं। कुमार एक पुलिस अफसर है, जो ‘ऑपरेशन ब्लैक पाईथन’ के सिलसिले में उस अंचल में जाता है और काली एक आदिवासी लड़का है, जो इस घटनाक्रम में डाकू बन जाता है। इसके अलावा परशुराम, परेमा, मुरली पांडे, बिसराम, सुन्नर पांडे, मलारी, योगी, नरैना, दुबे आदि गौण पात्र हैं। ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ उपन्यास संजीव के गहन अध्ययन और शोध का परिणाम है। उन्होंने आदिवासी समाज को गहराई तक जाकर देखा और परखा है। कथाकार के गहन अन्वेषण के कारण ही यह उपन्यास अत्यंत वास्तविक होकर पाठक वर्ग के समक्ष आता है।
संजीव संपूर्ण उपन्यास में आदि से लेकर अंत तक ये ढूंढने और दिखाने के प्रयास में लगे हुए हैं कि डाकू जैसी गंभीर समस्या के पीछे का कारण क्या है? और इसके निवारण के क्या उपाय हो सकते हैं? इसके साथ ही आदिवासी समाज में व्याप्त गरीबी, भूखमरी, अंधविश्वास, कुरीति आदि पर भी प्रकाश डाला गया है। दरअसल ये सारी समस्याएँ एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं। इसीलिए समाज की किसी एक समस्या को अचानक से खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए उचित योजना तथा सुनियोजित प्रयास की आवश्यकता होती है। साथ ही, इन समस्याओं को समाप्त करने के लिए मनुष्य को उन समस्याओं के साथ जुड़कर उन्हें समझना होगा, तभी वह उन समस्याओं का समाधान खोज कर पाएगा। आमतौर पर देखा जाए तो सभी आदिवासी समाजों में व्याप्त समस्याएँ लगभग एक जैसी ही हैं। बस कभी-कभी भौगोलिक स्थिति और आस-पास के सामाजिक परिवेश के कारण इनमें कुछ अंतर दिखाई पड़ता है। इसीलिए हर आदिवासी समुदाय में डाकू या माओवादी जैसी समस्याएँ देखने को नहीं मिलती। झारखंड के आदिवासियों के माओवादी विचारधारा की ओर आकर्षित होने और चंपारण के आदिवासियों के विद्रोही बनने के पीछे का कारण लगभग एक ही है। आदिवासी समाज हर तरफ से उत्पीड़न एवं त्रासदी से घिरा हुआ है, जिसके कारण वह तंग आकर मजबूरन शस्त्र उठा लेते हैं और विद्रोही बन जाते हैं।
चंपारण के आदिवासी समूह सामाजिक व्यवस्था के चलते विवश है। एक तरफ पुलिस और डाकू उन्हें शांति से जीने नहीं देते हैं, तो वही दूसरी तरफ समाज के सम्पन्न और तथाकथित उच्च वर्ग उनका शोषण करता है। इस पूरे उपन्यास में आदिवासी समुदाय को अत्यंत बेबस और असहाय दिखाया गया है। उनके पास दो ही विकल्प हैं, या तो वे पुलिस और डाकुओं के अत्याचारों को सहते हुए एक दिन मर जाएं या फिर परिस्थितियों के विरुद्ध विद्रोह का मार्ग अपनाएं। क्योंकि उन गरीब असहाय आदिवासियों के लिए देश का कानून तो है, किंतु यहाँ की व्यवस्था उसके किसी भी नियम का पालन नहीं करती है। यहाँ के सेठ, डाकू, पुलिस और मंत्री सबकी मिली भगत स्पष्ट रूप से झलकती है। हर कोई अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा रहता है, इस पूरी प्रक्रिया में आदिवासी समुदाय ही सबसे अधिक पीड़ित होता है। अपराध किसी का भी हो, परंतु दंड हमेशा इन्हीं निर्दोष और असहाय आदिवासियों को ही भुगतना पड़ता है। इस पूरे उपन्यास में आदिवासी लोगों की त्रासदी को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे आदिवासी के रूप में जन्म लेना ही पाप है।
आदिवासी लोगों को काम के बदले पगार भी नहीं मिलती, जिसके कारण उन लोगों को तो दो वक़्त की रोटी भी मयस्सर नहीं होती। लेकिन वहीं डाकुओं के लिए इस समुदाय के लोगों को भोजन तैयार करना पड़ता है| अगर किसी तरह पुलिस को यह बात पता चलती है तो इन आदिवासियों के ऊपर अत्याचार किया जाता है। अर्थात दोनों तरफ से गरीब आदिवासी ही फंस जाते हैं। आदिवासी इस कदर विवश है कि डाकूओं को अगर खाना न दिया तो डाकू मारते है और दिया तो पुलिस। अर्थात हर तरफ से उनके लिए मौत ही लिखी है। मजबूर आदिवासी करे तो क्या करे? केवल यही नहीं डाकुओं को ढूंढने के नाम पर भी इन आदिवासियों के साथ शारीरिक और मानसिक अत्याचार किया जाता है। साथ ही सम्पन्न वर्ग द्वारा किया गया शोषण है ही। आदिवासी महिलाएं इनलोगों के लिए केवल भोग का वस्तु हैं। आदिवासी स्त्रियों के इज्जत के साथ खिलवाड़ करना इनलगों के लिए बहुत ही साधारण सी बात है। इनके लिए कोई न्याय व्यवस्था भी नहीं है। जब फेंकन दुसाधो की पत्नी का बलात्कार सुन्नर पांडे के साले द्वारा किया गया तब बेचारा फेंकन न्याय के लिए दर-ब-दर भटकता रहा। पर उसे न्याय नहीं मिलता। पंचायत ने राय दिया कि पांडे जैसे उच्च जाति के लोग यह काम नहीं कर सकते। वह थाने गया वहाँ भी कुछ नहीं हुआ। विवश होकर जब वह डाकू परशुराम के पास पहुंचा वहाँ भी वह निराश ही हुआ। परशुराम उसे यह कहा कि “वह चमारों, दुसाधो, धोबियों, कुम्हारों, लोहारों, और नोनियाओं का केस नहीं लेता।”3 अर्थात जातिवाद के चलते इन आदिवासियों का कुछ भला नहीं हो सकता। इसीलिए कुमार जब काली को आत्मसमर्पण के लिए कहता है तब वह कहता है कि-“दूजे मुकदमे और सजा के बाद मेरी जाति नहीं बदल जाएगी, हालत नहीं बदल जाएंगे, मैं फिर उसी दलदल में सड़ूँगा।”4
कुमार ने डाकू समस्या के पीछे के कारण को साफ बताया है-“डाकू समस्या कोई ऊपर का आवरण नहीं है कि आप उसे खरोंचकर फेंक दे। इनकी जड़ों में भूमि सुधार का न होना, ढीला प्रशासन, पोलिटिकल सेल्टर,रोजगार की समस्या, धर्म, टिपिकल भौगलिक स्थिति वगैरह हैं- ये सभी इंटररिलेटेड हैं, सारा कुछ दुरस्त कर दीजिये, रोग खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा।”5 केवल थारू ही नहीं उस अंचल के बाकी आदिवासियों की भी हालत अच्छी नहीं हैं। खेती वह लोग करते है, पर जमीन इनकी अपनी नहीं। कठिन मेहनत के बाद भी दो वक़्त का खाना दूभर होता है। धाँगर अपना दर्द काली से बताता हुआ कहता है-“हमलोगन को अंग्रेज़ बहादुर ले आया था छोटा नागपूर से कभी- जंगल साफ करने के लिए। पहिले तो जंगल-ए-जंगल था न! ऊ जंगल काट-काट के हमरे बाप-दादा खेत बनाए और आज चल के देखो, हामरा पास एक धुर खेत नहीं।”6
नेताओं और पुलिसवालों का दोहरापन यहाँ साफ झलकता है। वह लोग एक तरफ तो डाकू व्यवस्था को खतम करने के लिए ‘ऑपरेशन ब्लैक पाइथन’ जैसी योजना बनाते है और दूसरी तरफ डाकुओं जैसा काम करके या फिर अपनी पदोन्नति या अन्य किसी दूसरे फायदे के लिए झूठा एनकांटर करके निर्दोष लोगों को मारते है। काली को नहीं पकड़ पाने के बाद उसके बड़े भाई बिसराम को पुलिस पकड़कर ले जाती है और उसके ऊपर तरह-तरह के अत्याचार करती है। इतने अमानवीय अत्याचार के बाद जब पुलिसवालों को लगता है कि अब वह जिंदा नहीं बचेगा तो बिसराम के ऊपर भागने की कोशिश करने का इल्जाम लगाकर पुलिस उसे मार देती है। ऐसे ही अनेक घटनाएँ उपन्यास में देखने को मिलती हैं। जो डाकू आत्मसमर्पण करता है उसका भी झूठा एनकाउंटर दिखाकर अपनी बहादुरी दिखाने में लग जाते हैं। पुलिस और प्रशासन वालों के लिए ये सब बातें बहुत ही साधारण है। ऐसे में कुमार जैसे पुलिस अफसर भी है, जो अपने आदर्श पर टिके रहने का भरपूर प्रयास करता है। परंतु उपरवालों के चलते वह हर वक़्त ठीक तरह से अपना काम नहीं कर पाता। एक वक्त ऐसा भी आता है जिसमें कुमार का भी नैतिक पतन होता है और वह लालची बन जाता है| लेकिन जल्दी ही अपनी संस्कारों के चलते वह उससे बाहर भी आ जाता है। मंत्री दुबे जी तो ऐसे है, ‘ऑपरेशन ब्लैक पाइथन’ के लिए वह प्रधानमंत्री से वाह-वाह लेने भी जाते है और डाकू के जरिए ही वह चुनाव जीतते है और उसके छत्र-छाया में ही डाकू पलते भी है।
काली/कालिया से काली सरदार तक का सफर काली के लिए आसान नहीं था। पुलिस, डाकूओं के अत्याचार सहने और भूखे पेट रहने से उसे डाकू बनने का रास्ता आसान लगता है। उसके भैया और भाभी के ऊपर हो रहे अत्याचार को देखकर भी उसके मन में प्रतिशोध का अग्नि जल रही होती है| वह मजबूर था। पर इस पूरे दौर में वह मानसिक अंतर्द्वंद से गुजर रहा होता है। उसके द्वारा किया गया पहला अपहरण के बाद वह अपने साथी नरैना से कहता है-“ऐसा क्या हुआ, नरैना भैया। हमने लाख चाहा कि ऐसा न हो, जब-जब हम पर जुल्म हुआ, मन बेकाबू हुआ, हमने मन को जब्त ही किया- हे माता भवानी, हे देवता पित्तर, हे सोमेश्वर देब,हमको कु मारग से बचना बचाना लेकिन आखिरकार आज..। हमने नहीं चुनी थी यह ज़िंदगी। नहीं बने थे हम इन राहों के लिए। फिर भी देखो...कैसे धकेल दिए गए।”7 काली की इस सफर के जरिये उपन्यासकार डाकू व्यवस्था की सारी सच्चाई पाठकों के सामने लाकर रख दिया है। काली, नरैना जैसे लोग गरीबी से बचने और स्वाभिमान को बचाने के लिए डाकू बनने जैसे गलत रास्ते पर जाने के लिए मजबूर है।
बाहरी लोगों के अलावा अपने समाज में प्रचलित अंधविश्वासों के कारण भी थारू आदिवासी समुदाय कष्ट झेल रहे हैं। इसके अनेक उदाहरण उपन्यास में देखने को मिलते हैं । थारू समुदाय में यह प्रचलित हैकि वह लोग हिरण का मांस नहीं खा सकते और गाय का दूध नहीं पी सकते। जब बिसराम की छोटी बेटी माँ की अनुपस्थिति में भूख में बिलबिला रही थी तब उपायहीन होकर बिसराम उसको गाय की दूध पिला देता है। जिसके कारण उसे बाद में दंडित किया गया। ऐसे ही सांप डँसने पर वे लोग डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय ओझा के पास ले जाते है। जिसके कारण बचने की उम्मीद होने के बावजूद व्यक्ति मर जाता है। उपन्यास में केवल अनपढ़ आदिवासी समुदाय के अंधविश्वास को ही नहीं दिखाया गया है। कुमार, पांडेय जैसे पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वास के इस चंगुल से मुक्त नहीं हो पाते है। इसीलिए दो ऑपरेशन सफल नहीं होने पर कुमार, पांडेय की बातों पर आकर तांत्रिक के पास चला जाता है। इस उपन्यास में बालविवाह, गौना(दहेज) जैसे कु-प्रथा का भी जिक्र किया गया। जिसके कारण इन आदिवासियों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गौना नहीं दे पाने के कारण काली अपनी पत्नी को खो देता है। काली के लिए त्रासदी की बात यह है कि जब वह अपनी पत्नी से मिलता है तब वह किसी और की पत्नी बन चुकी थी। क्योंकि उसकी पत्नी को लड़की बेचनेवाले ने ले जाकर बेच दिया था। उस अंचल से लड़की या औरतों को ले जाकर नेपाल में बेचना एक आम बात है। जोगी(औरतों को बेचने वाला) कहता है-“अब सवाल रहा लड़कियों के मिलने का, तो राम जी की दया से उनकी पैदावार कुछ ज्यादा ही है और अपने यहाँ वह आफत ही समझी जाती हैं.......... दहेज की मार है.....अब रहे खरीददार, तो रंडुए, ऐयास, ठेकेदार, बनिए, यहाँ तक कि मास्टर और पुजारी तथा बाल ब्रह्मचारी भी-औरत किसे नहीं चाहिए?”8
इस उपन्यास में धर्म के नाम पर हो रहे विडम्बना को भी दिखाया गया है। डाकू से लेकर सेठ-मंत्री तक सभी लोग धर्म के नाम पर सारे गलत काम कर रहे हैं। बाकी समस्या के साथ-साथ धार्मिक पाखंडों ने आदिवासियों की ज़िंदगी को और पीछे धकेल दिया है। धर्म का प्रयोग यहाँ गलत तरीके से हुआ है। उनलोगों के मन में यह भावना बैठ गयी है कि चाहे जितना भी गलत काम क्यों न करे, उसके बाद पुजा-पाठ, हवन करने पर सब पाप धूल जाता है। इसी मानसिकता के बारे में मुरली पांडे, कुमार को कहता है-“सर, लूट, हत्या और बलात्कार के दागों से जब चुनर मैली हो जाए तो धर्म की लांड्री में भेज दो। सब मैल धुल जाएगा, जिसे शिवजी उठाकर पी जाएंगे। इसके बाद फिर पाप करने की सहूलियत- जितना चाहो करो।’’9 ऐसी मानसिकता के वजह से ही उस समाज में अपराध बढ़ता है|
कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से यह एक सफल उपन्यास है। इस उपन्यास में उपन्यासकार संजीव ने पात्रों के अनुसार भाषा का प्रयोग किया है। अर्थात् गाँववालों के लिए भोजपुरी मिश्रित देशज हिंदी और पुलिस या सरकारी अफसरों के लिए शुद्ध हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया है। जिसके चलते उपन्यास और अधिक वास्तविक बन गया है। वैसे तो पुलिस और डाकू दोनों ही परस्पर विरोधी है। परंतु इस उपन्यास में दिखाया गया है कि दोनों के कार्यों में अधिक अंतर नहीं है। आदिवासियों के ऊपर शारीरिक-मानसिक अत्याचार से लेकर फिरौती-वसूली तक दोनों पक्ष लगभग एक जैसे काम कर रहे है। इसके लिए ही शायद रूपक के तौर पर पुलिस और डाकू के लिए उपन्यासकार ने एक जैसी खाकी वर्दी की बात कही है। आदिवासी समस्या के साथ-साथ यह उपन्यास हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर भी व्यंग करता है। उपन्यास के आरंभ से ही यह बात पता चलती है कि राजनीतिक क्षेत्रों में डाकुओं का परोक्ष रूप से योगदान है। उस इलाके के चुनाव जीतने के लिए डाकुओं का सहारा लेना अनिवार्य है। अपने मुनाफे के लिए डाकू राजनीतिक क्षेत्र में हस्तक्षेप करते है। लेकिन अंत तक आते-आते उस इलाके का सबसे बड़ा डाकू परशुराम चुनाव लड़ता है और वह जीत भी जाता है। यहाँ विडम्बना यह है कि जिसने खुद अनगिनत अपराध किए हैं वही अब मंत्री बनकर उस इलाके की रक्षा करेगा। अर्थात हमारी राजनीति इतनी कमजोर हो चुकी है कि कोई भी अनपढ़, गवार या फिर अपराधी इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है। इस उपन्यास में एक प्रसंग आता है जिसमें यह दिखाया जाता है कि ‘शोले’ फिल्म देखने के बाद डाकू किस तरह से गाँव के औरतों को उसके सामने नाचने के लिए विवश करते है| पूरे उपन्यास में उपन्यासकार ने आदिवासी समस्या को बारीकी से दिखाने के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र की असलियत, प्रचार और मनोरंजन माध्यमों का साधारण जनता के ऊपर प्रभाव जैसे संवेदनशील विषयों के ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।
निष्कर्ष:
वस्तुतः यह उपन्यास आदिवासी जीवन-संघर्ष का एक सशक्त और जीवंत दस्तावेज बनकर पाठकों के समक्ष उपस्थित होता है, जिसमें आदिवासी समाज की पीड़ा, संघर्ष, शोषण, विस्थापन, अस्मिता-संकट तथा जीवन-यथार्थ का अत्यंत मार्मिक और संवेदनात्मक चित्रण किया गया है। उपन्यास केवल आदिवासी जीवन की बाह्य परिस्थितियों का वर्णन नहीं करता, बल्कि उनके अंतर्मन में व्याप्त वेदना, असुरक्षा, उपेक्षा और अस्तित्व-संघर्ष की गहरी प्रतिध्वनि को भी अभिव्यक्त करता है। इसमें स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि किस प्रकार तथाकथित मुख्यधारा का समाज, पूँजीवादी शक्तियाँ, प्रशासनिक तंत्र तथा सत्ता-व्यवस्था आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक पहचान पर निरंतर अतिक्रमण करते रहे हैं। परिणामस्वरूप आदिवासी समुदाय अपने ही परिवेश में हाशिये पर धकेल दिया गया है। उपन्यास में आदिवासी जीवन की त्रासदी केवल आर्थिक अभाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संकटों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास की मूलभूत सुविधाओं से वंचित आदिवासी समाज अपने अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्षरत दिखाई देता है। उनकी जीवन-शैली, परंपराएँ, लोक-संस्कृति और प्रकृति के साथ उनका आत्मीय संबंध आधुनिक विकासवाद और उपभोक्तावादी मानसिकता के कारण संकटग्रस्त हो गया है। उपन्याकार ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ यह दिखाने का प्रयास किया है कि आदिवासी समाज को अक्सर हिंसा, विद्रोह और पिछड़ेपन की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि वे शोषण, अन्याय और उपेक्षा के विरुद्ध अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इस संदर्भ में उपन्यास यह महत्वपूर्ण संदेश देता है कि आदिवासियों की समस्याओं का समाधान दमन, हिंसा या प्रशासनिक कठोरता के माध्यम से संभव नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उनके जीवन-संदर्भों, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मूल्यों और ऐतिहासिक परिस्थितियों को गहराई से समझा जाए। उनके प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भूमि-अधिकार तथा सामाजिक न्याय के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएँ। साथ ही उनकी संस्कृति, भाषा और परंपराओं का सम्मान करते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा में उनकी अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए सम्मिलित किया जाना चाहिए। अतः कहा जा सकता है कि यह उपन्यास केवल आदिवासी जीवन का साहित्यिक चित्रण भर नहीं है, बल्कि भारतीय समाज और सत्ता-व्यवस्था के समक्ष एक गंभीर प्रश्न भी उपस्थित करता है। यह पाठकों को आदिवासी समाज की वास्तविक समस्याओं से परिचित कराते हुए उनके प्रति सहानुभूति, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा देता है। इसी कारण यह कृति आदिवासी विमर्श के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक रचना के रूप में स्थापित होती है।
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