सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 35-40 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=33
मैं शहर के प्रसिद्ध सीनियर कॉलेज में तकरीबन दस वर्ष से अध्यापन कार्य कर रहा था। वहां मेरा भविष्य अंधकारमय था,तब भी मैं छात्रों के जीवन में प्रकाश लाने का निरंतर प्रयास करता रहा। मेरा जीवन अंधकारमय इसलिए था कि मैं वहां सी.एच.बी. (संविदा प्राध्यापक) पद पर कार्यरत था। अगले वर्ष संविदा पद पर भी रहता हूं या नहीं,यह कहना भी मुश्किल था। ज़िंदगी में पर्मनंट सहायक प्राध्यापक बन पाऊंगा,ऐसा सपनों में भी नहीं लगता था। क्योंकि पर्मनंट सहायक प्राध्यापक बनने हेतु कम से कम अस्सी लाख रुपए देने पड़ते है। साथ ही राजनीतिक पहचान अलग से।
संविदा पद पर सहायक प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति होती है तो तकरीबन डेढ़ लाख रुपए मुश्किल से मिलते थे वर्ष के। काम वर्ष भर, पगार छह माह तक। पगार भी हर माह नहीं,दो-तीन माह के बाद मिलता था। उनमें से भी कुछ पैसें काटे जाते थे।कुछ बोल भी नहीं पाते। क्योंकि अगले वर्ष नहीं लिया तो,यह डर। सब पात्रता यानी एम.ए.,एम.फिल्, सेट,नेट, बी.एड्, पी-एच.डी आदि होने के बावजूद मैं बेरोज़गार ही था असल में। वेठबिगार लोग मुझसे अच्छे थे। वे शांति से नींद तो ले पाते थे; मेरे नसीब में वह भी नहीं था।
मां - बाप की बहुत अपेक्षा थी मुझसे। किंतु मैं अपेक्षा पूरी नहीं कर पा रहा था। उन्हें वर्तमान वास्तव भी नहीं बता सका। क्योंकि वह परेशान होंगे इस खातिर। एक दिन अचानक मित्र का फोन आया। वह बोलने लगा,"हैलो, संघर्ष,क्या चल रहा है आपका"
उधर से आवाज आई,"संघर्ष सर अध्ययन कर रहे है। मैं उनकी पत्नी बोल रही हूं। दो मिनट ठहरिए,उनके पास फोन देती हूं।"
- "जी,कोई बात नहीं।फोन शुरू ही रहने देता हूं।"
- "हैलो,बोलिए।आवाज़ पहचान की लग रही है, लेकिन नाम याद नहीं आ रहा। शमा करना मित्र,मैं इन दिनों बहुत कुछ भूल रहा हूं।"
- "बहुत दिनों के पश्चात फोन आता है तो ऐसा ही होता है मित्र।उत्तर प्रदेश से 'विजय' बोल रहा हूं।आपकी कहानी मासिक पत्रिका में पढ़कर फोन किया था आपसे।उसी दिन से मित्र बने थे हम।"
- "अच्छा,याद आया। कैसे हो आप? सब ठीक-ठाक है न।"
- "हां,अच्छा है।आप कैसे हैं?"
- "मैं भी अच्छा हूं। वहीं सी.एच.बी.सहायक प्राध्यापक पद पर कार्यरत हूं। अब वहां काम करने की मानसिकता नहीं है। क्योंकि परिवार की, मां - बाप की जिम्मेदारी मुझ पर है। मैं बढ़ा बेटा हूं घर का। दूसरा कोई काम करने का सोच रहा हूं।"
- "फोन इसलिए किया था कि आपको कुछ जानकरी देनी थी।"
- "हां,बताईए।"
- "जवाहर नवोदय विद्यालय समिति में संविदा पर पी.जी.टी.पद हेतु विज्ञापन आया है। समझ लीजिए,इसमें साक्षात्कार के माध्यम से आपका चयन होता है तो आपकी दस माह हेतु नियुक्ति होगी। हर माह पैंतीस हजार सात सौ पचास रूपए मिलेंगे। रहने हेतु मुफ्त में कॉटर मिलेगा।साथ ही आपके खाने की व्यवस्था स्कूल के तरफ़ से। हर माह पगार भी मिलेगा।इसपर विचार कीजिए।"
- " मैंने सुना है कि तत्कालीन समय पर्मनंट अध्यापक आने के पश्चात संविदा पद पर कार्यरत अध्यापक को घर भेजते है। साथ ही परिवार लेकर नहीं आने देते। मैं परिवार छोड़कर नहीं रह सकता। उनके साथ रहना चाहता हूं, हर परिस्थिति में।"
- "हां,आपने सही सुना है। लेकिन कभी कभार पर्मनंट अध्यापक बीच में आते हैं। साथ ही ज़्यादातर प्रधानाचार्य परिवार के साथ रहने की अनुमति नहीं देते। किंतु विनंती करने के पश्चात परिवार के कुछ सदस्यों को साथ रखने की अनुमति मिलती है।"
- " मैं फार्म भर देता हूं। देखा जाएगा आगे क्या होता है। जानकारी देने हेतु शुक्रिया मित्र।"
फार्म भर दिया। साक्षात्कार के दृष्टि से अध्ययन करने लगा। दूसरे अध्यापक से साक्षात्कार के संदर्भ में जानकारी लेता रहा। आखिरकार साक्षात्कार की तिथि वेबसाईट पर आ गई। मार्च में साक्षात्कार संपन्न हुआ। साक्षात्कार अच्छा रहा। सिर्फ़ इंतजार था मेरिट लिस्ट का। दिन बीतते गए। आख़िरकार एक दिन पांच बजे फोन आया। मुझे नया नंबर दिखाई दिया। मैंने जल्द से फोन उठाया। मैंने धीरे आवाज़ में कहा,"हैलो,कौन ? कहां से बोल रहे हैं आप ?"
- "पंकज त्रिपाठी।जवाहर नवोदय विद्यालय समिति से बोल रहा हूं।आपका पी.जी.टी.हिंदी संविदा पद पर दस माह हेतु चयन हुआ है। आपको दूसरे राज्य में जाना पड़ेगा। आप समिति में काम करना चाहते हैं तो जल्द से बताईए। नहीं तो मैं दूसरे व्यक्ति को सुअवसर देता हूं।"
- "आदरणीय,समिति में काम करने हेतु मैं तैयार हूं। कब जॉइन करना है ?"
- "आपको ई-मेल पर विस्तार से जानकारी दी जाएगी। अब मैं फोन रखता हूं। मुझे और भी लोगों को फोन लगाना है।"
मैं खुश था। थोड़ा दुःखी भी। किंतु मैंने यह बात किसी को नहीं बताई। मन में अनेक विचार आ रहे थे,क्या करें,कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने करीबी मित्र की राय ली। वे कहने लगे कि तुझे अवश्य जाना चाहिए। लेकिन मेरा मन राज्य के बाहर जाने हेतु तैयार नहीं था;क्योंकि मां -बाप की जिम्मेदारी मुझपर थी। किंतु माता -पिता ने जाने हेतु मुझे मजबूर किया। आख़िरकार मुझे जाना ही पढ़ा।
1 जुलाई,2025 को जवाहर नवोदय विद्यालय में ज्वाइनिंग करनी थी। मैं दो दिन पहले से ही घर से निकल पढ़ा। इतवार के दिन दोपहर में जवाहर नवोदय विद्यालय में पहुंचा। प्रधानाचार्य से मिला। उनसे चर्चा की। वे तुरंत बहुत गुस्सा हुए। मुझपर चिल्लाकर कहने लगे कि तुम परिवार साथ लेकर क्यों आए? ऑर्डर पढ़ी नहीं,आपने। उसमें साफ़ लिखा होता है कि संकाय अध्यापक परिवार लेकर नहीं आ सकता। वास्तव में ऐसा कुछ भी लिखा नहीं था। रहना है तो अकेले रहिए, नहीं तो... बाहर बैठो, निकलो जल्दी।
हम सब बाहर बैठ गए। दिन के पांच बज चुके थे तब भी ऑफिस से कोई बुलावा नहीं आया। सभी भूखे थे। मेरी बेटी बहुत रो रही थी। शायद उसे बहुत भूख लगी थी। साथ में तो कुछ भी नहीं था। पत्नी परेशान दिख रही थी। क्या किया जाए ? कुछ समझ नहीं आ रहा था। ऑर्डर में परिवार साथ लेकर नहीं आना है ऐसा उल्लेख होता तो मैं यहां कभी नहीं आता। मैं परिवार छोड़कर नहीं रह सकता।अनेक विचार मुझे परेशान कर रहे थे। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था। मेरे कारणवश परिवार परेशान था। बहुत सा समय बितने के पश्चात चपरासी ने आवाज दी। मैं जल्द से उनके पास गया। तुरंत चपरासी ने कहा कि आपको कॉटर (घर) देने हेतु कहा हैं। सामान लेकर चलिए। सामान देखकर उसने ही कहा कि मेरी स्कूटी लीजिए।उतने में प्रधानाचार्य कॅबिन से बाहर आते हुए दिखाई दिए,मैंने नम्रता से कहा कि शुक्रिया आदरणीय। वे कुछ भी न बोलते हुए आगे बढ़ गए।
देखते-देखते तीन महा बीत गए। अब वहां मेरा मन लग चूका था। कक्षा में बहुत से बच्चें रहते थे। पढ़ाने में मज़ा आ रहा था।आनंद मिल रहा था। वहां अलग-अलग राज्यों से आए हुए अध्यापक थे। बहुत से अध्यापक से पहचान हुई थी। कुछ करीबी मित्र बने।करीबी मित्र में गणित के अध्यापक राज की और मेरी बहुत बनती थी। विचार मिलते थे। निरंतर हम वर्तमान शिक्षा नीति पर चर्चा करते थे। वे मुझे बढ़े भाई की तरह निरंतर मार्गदर्शन करते थे।
दीपावली की छुट्टियां नजदीक आई थी। यानी दो दिनों में लग गई। किंतु पी.जी.टी. अध्यापक अवधारण अवधि में बोर्ड कक्षा को पढ़ाने हेतु पंद्रह दिन रूके थे। एक दिन अचानक प्रधानाचार्य ने राज को कॅबिन में बुलाया। और कहने लगे कि गणित के पर्मनंट अध्यापक का प्रमोशन हुआ है, वे आ रहे है कल। तुम्हे कल ही जवाहर नवोदय विद्यालय छोड़ना होगा। रूक मत,किसी भी हालत में कल। हां,कहकर राज बाहर आया। स्टाप रूम में आकर शांत बैठ गया। चेहरे पर उदासी थी। मैंने तुरंत राज से पूछा," क्या हुआ ? सब ठीक है न।"
- " कुछ नहीं। हां,सब ठीक है संघर्ष भाई। ज़िंदगी में कुछ उतार -चढ़ाव आते ही है।खैर,तू हमरी दोस्ती तो नहीं भूलेंगा ना कभी।"
-"मैं खुद को भूल सकता हूं, तुझे कभी नहीं। किंतु आज तू ऐसी बातें क्यों कर रहा है ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। कोई परेशानी है तो मुझे बता न।भलेही हमरा रिश्ता ख़ून का नहीं, लेकिन खून के रिश्ते से ज़्यादा मायने रखता है हमरा रिश्ता। मैंने भाई माना है तुझे।"
-"कल मुझे किसी भी हालत में जवाहर नवोदय विद्यालय छोड़ना पड़ेगा।"
-"क्यों? क्या हुआ। "
-"पर्मनंट अध्यापक कल आ रहे है स्कूल में।"
-"किंतु तेरी नियुक्ति तो दस माह के लिए हुई थी न।"
-"बीच में कोई पर्मनंट अध्यापक आता है तो वहीं हमारा कार्यकाल समाप्त होता है, ऐसा प्रधानाचार्य कह रहे थे।"
-"यह तो सरासर गलत है।ऐसा बर्ताव तो वेठबिगार के साथ भी नहीं होता है। जो तेरे साथ हो रहा है। शैक्षिक वर्ष के बीच में तुझे कहां काम मिलेगा?"
-" जाने दो मित्र। कोई दूसरा रास्ता ढूंढ लूंगा मैं।जल्दी चल,मुझे यश बेटे का दाखिला निकालना पड़ेगा स्कूल से। "
राज ने शाम तक सब काम पूरा किया। कॉटर (घर) के तरफ देर से निकला। जवाहर नवोदय विद्यालय के गेट में प्रवेश करते ही उसके तरफ़ दसवीं, बारहवीं के छात्र आने लगे। शायद उन्हें सब पता चला था। छात्रों के ऑंखों में पानी आ रहा था। वे सब कहने लगे कि सर आप हमें छोड़कर मत जाइए। हमें आपकी जरूरत हैं। राज सिर्फ़ देख रहा था,कुछ बोल नहीं पाया। अंततः इतना ही कहा कि बच्चों अच्छी पढ़ाई करो,मां -बाप का सपना पूरा करो, जीवन में सफल बनो। खुद का ख्याल रखना। अलविदा बच्चों।
राज धीरे-धीरे रास्ते से चल रहा था। अंतर जल्द से खत्म नहीं हो रहा था। उसे बीते हुए दिन याद आ रहे थे। मन में चिंता भी सता रही थी कि पत्नी को कैसे समझाऊं। मन ही मन अनेक चिंता सता रही थी। इतने में घर कब आया,पता भी नहीं चला। राज ने बेल बजाई। कुछ देर बाद दरवाजा खुला। पत्नी ने चिंता भरे स्वर में कहा,"आपको आज बहुत देर हुई। मुझे फोन भी नहीं किया। क्या हुआ ? चेहरा पड़ा क्यों है ?
-"आज कुछ काम था, इसलिए देर हुई। व्यस्तता के वजह से फोन नहीं कर पाया। कुछ नहीं हुआ,काम के वजह से चेहरे पर उदासी आई है।"
-"मैं आपको अच्छी तरह समझती हूं। आपको दुःख छूपाने नहीं आता है। कुछ तो हुआ है। सच- सच बताओं क्या हुआ ?"
-"कल हमें गांव के तरफ़ निकलना होगा। मेरी जगह पर्मनंट अध्यापक आया है। मां -पिताजी, को इसके संदर्भ में कुछ मत बताना । मुझे दीपावली का खुशी का माहौल खराब नहीं करना है। मैं दुःख सह लूंगा। मैं घर पर बैठकर नहीं रहूंगा। कुछ न कुछ काम जरूर करूंगा। बहुत से इंग्लिश स्कूल में पहचान पत्र दूंगा।मुझे खुद पर विश्वास है,काम मिल जाएगा। तू टेंशन मत ले, मैं हूं न। मुझे सिर्फ़ तेरी साथ चाहिएं।"
-"आप मेरे साथ है न, मुझे कोई टेंशन नही। मैं मरते दम तक साथ निभाऊंगी आपकी। मुझे आप पर पूरा विश्वास है कि आप हार नहीं मानेंगे। कुछ न कुछ राआप टेंशन मत लो, मैं भी जॉब करूंगी। सिर्फ़ आप उदास मत रहिए। ज़िंदगी भर हंसते हुए देखना चाहती हूं मैं तुम्हे।"
राज और उसके पत्नी ने रात का खाना खाया। दोनों ने एक दूसरे को मानसिक सहारा दिया। रात के बारह बजे पत्नी सो गई। राज चिंता में मग्न रहा। रात भर सो नहीं पाया।
सुबह हुई। सब जल्दी उठें। घर जाने की तैयारी करने लगे। जल्द से तैयारी की।जाने का समय भी जल्द हुआ। दोनों घर सामान लेकर बाहर आए। उतने में राज ने दुःख भरे स्वर में कहा,"संघर्ष,भाभी हम निकलते है। खुद का और बेटी का ख्याल रखना। हमारे गांव के तरफ़ जरूर आना। हम आपकी राह देखते रहेंगे।"
- "हां,अवश्य आएंगे संघर्ष भाई। आगे कुछ भी बोला नहीं जा रहा था। सिर्फ़ इतना कह पाया कि खुद का ख्याल रखना।"
मेरी बेटी यश को जाते हुए देखकर बहुत रो रही थी। उन्हें जाने मत दो।रोको। जोर-जोर से चिल्लाकर कह रही थी। यश के ऑंखों में भी पानी था। वह भी रो रहा था। उसे समझाते हुए,खुद रोते हुए पति-पत्नी आगे बढ़ रहे थे।
राज अंधेरे में जाकर एक जगह शांत बैठ गया। मन में अनेक विचार आ रहे थे। कुछ भी काम करने का मन नहीं था। उतने में पत्नी ने आवाज दी, "संघर्ष,स्कूल का समय हुआ है। क्या कर रहे हो ?"
- "मुझे नहीं जाना है आज स्कूल में। मैंने व्हाट्सएप पर संदेश प्रेषित किया है कि मेरी तबीयत खराब है।"
- "जी। नाष्टा क्या बनाऊं आपके लिए ?"
- "अभी कुछ मत बना। तू ही इधर आ।"
- "मैं समझ सकती हूं आपका दुःख।खैर, इन विचारों से बाहर निकल जाइए आप।"
- "एक बात कहूं।"
- "हां,कहो।"
- "राज के साथ जो हुआ वह अपने साथ हुआ तो। मुझे डर लग रहा है।"
- "डरना नहीं,लढ़ना है।आपका नाम ही संघर्ष है। आपको व्यवस्था से संघर्ष करना है।"
- "कब बदलेगी यह व्यवस्था ? मैं थक गया हूं संघर्ष करते-करते। पात्रता होने के पश्चात भी बेरोज़गार बनकर घूमना पढ़ रहा है। वर्तमान संविदा अध्यापक की अवस्था देखकर ओर बुरा लगता है। उस समस्या की वेदना मैं सह रहा हूं।"
- " परिवर्तन होगा,धीरज रखिए।"
-" कब? कितनी पीढ़ी बर्बाद हुई ?ओर कितनी होगी ? किंतु मैं हार नहीं मानूंगा। लढ़ता रहूंगा भ्रष्ट व्यवस्था से।"
- "अब मैं नाष्टा बनाती हूं।आप फ्रेश हो जाइए।"
- "आपने विचार से मुझे फ्रेश किया है। अब पानी से फ्रेश होने की आवश्यकता नहीं है शरीर को। जल्द लाव नाष्टा।"
संघर्ष और पत्नी ने नाष्टा किया। ओर दोनों में बहुत सकारात्मक बातें हुई। दिन जल्द बीतते गए। देखते-देखते अवधारण अवधि का समय खत्म हुआ। दीपावली हेतु घर जाने का दिन तय हुआ। घर जाने हेतु दोनों तैयारी में लग गए। आखिकार दोनों तीन दिन के पश्चात खुद के घर पहुंच गए।
संघर्ष का घर में कहीं मन नहीं लग रहा था। वह राज के सदमे से बाहर नहीं निकल पा रहा था। उसके बारे में ही सोच रहा था। उसे प्रशासन व्यवस्था पर गुस्सा आ रहा था। वह मन ही मन व्यवस्था से प्रश्न पूछ रहा था कि अध्यापक का प्रमोशन शैक्षिक वर्ष के शुरुआती दौर में क्यों नहीं होता ? वे शैक्षिक वर्ष के बीच में ही घर के नज़दीक का जवाहर नवदय विद्यालय क्यों चुनते है ? पर्मनंट अध्यापक संविदा अध्यापक के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं दिखाते? संविदा अध्यापक के भावना से क्यों खेलते है? वे समाधानी क्यों नहीं है? ऐसे अनेक प्रश्न पूछना चाहता है।
संघर्ष गांव के रास्ते से अकेला निकल पढ़ा।नई ऊर्जा के साथ। अब भ्रष्ट व्यवस्था में परिवर्तन होने तक न रूकने संकल्प किया था खुद से। परिवर्तन ही उसका मकसद था।वह संघर्षमय रास्ते से निरंतर चलता ही रहा...
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