सहकर्मी समीक्षा जर्नल
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ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 42-47 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=35
महाभारत के प्रमुख पात्रों में गांधारी एक सशक्त स्त्री चरित्र के रूप में अभिव्यक्त हुई हैं। अपनी व्यवहार में नैतिकता और सदाचार गुण के लिए वे शत्रुदल में भी निज माता सदृश सम्माननीय थीं। हिंदी साहित्य के महान रचनाकार डॉ. धर्मवीर भारती अपनी कालजयी रचना ‘अंधा युग’ में महाभारत के 18वें दिन से लेकर प्रभास तीर्थ में प्रभु की मृत्यु तक की घटनाओं का वर्णन गीतिनाट्य के रूप में प्रस्तुत किए हैं। ‘अंधा युग’, महाभारत के कथानक से इसलिए भिन्न माना जा सकता है कि ‘अंधा युग’ के कथानक में मूलतः युद्ध के उपरांत व्यवस्थित समाज में आए अव्यवस्थाओं तथा विघटित मानवीय मूल्यों का परिवर्धन किया गया है। प्रस्तुत प्रपत्र में स्त्री विमर्श के दृष्टि से ‘अंधा युग’ की गांधारी तथा युद्ध के कारण गांधारी के परिवर्तित विचारधाराओं पर सम्यक् विवेचन किया जाएगा साथ ही गांधारी से आज की नारियों को क्या शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए इस पर भी चर्चा की जाएगी।
गांधारी, अंधा युग, महाभारत, युद्ध, त्रासदी, विभीषिका, कर्त्तव्यबोध, विचारधारा, विघटित मूल्यबोध, स्त्री विमर्श आदि।
युद्ध की परिकल्पना-
पृथ्वी पर मानव जाति के बसने एवं सभ्यता के विकास के साथ ही युद्ध किसी न किसी रूप में मनुष्य के ईर्द-गिर्द सर्वदा विद्यमान रहा है । भारतीय समाज में रामायण, महाभारत तथा विभिन्न राजाओं के बीच घटित युद्धों की कथा विगत कई वर्षों से प्रचलित है। भिन्न पक्षों के भिन्न मतों तथा विचारधारा के टकराव से उत्पन्न संघर्षों को हम युद्ध की परिभाषा के रूप में देख सकते हैं । यह कहना अत्युक्ति न होगी कि व्यक्ति अपने अंतर्मन में भी तरह-तरह के विचारों से युद्ध करता है । जब युद्ध शारीरिक तथा बल प्रयोग करके घटित होता है, तब वह अधिक भयावहता एवं अधिक अनर्थ पैदा करता है। परंतु दुःख के साथ यह स्वीकार करना पड़ रहा की युद्ध की यह स्थिति आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है । इसका सद्यतम दृष्टांत हम नित्य समाचार पत्रों में पढ़ते हैं ।
एक सच्चा साहित्यकार अपने समाज में व्याप्त मिथ कथा-प्रसंगों को ध्यान में रख कर साहित्य रचता है। इस संदर्भ में अतीत की घटनाओं को केंद्र में रखकर वर्तमान समय की त्रासदियों की तरफ इंगित करना साहित्यकार के रचनात्मक प्रखरता को दर्शाता है । द्वितीय विश्वयुद्ध के अमानवीय आचरण से उत्पन्न क्रूर परिस्थितियां अत्यंत हृदय विदारक घटना थी। तुच्छ स्वार्थ की पूर्ति के लिए निरीह जन साधारण को क्षति पहुंचना यह दर्शाता है की उन्नति की चोटी पर पहुंचकर भी मनुष्य कितना बर्बर और आदिम है। ऐसे वातावरण में सृजनधर्मी साहित्यकार डॉ. भारती समाज में युगों से प्रचलित नृशंसता की नई परतें खोलने में सक्षम हुए हैं । रामजी तिवारी लिखते हैं “भारती जी इस मूल्य संकट का समाधान किसी प्रतिक्रिया से निर्मित एकांगी दृष्टि में न खोजकर, अतीत और वर्तमान के स्वस्थ संश्लेषण में खोजते हैं। विगत और आगत के स्वस्थ समन्वय में ही वे भावी जीवन के प्रत्यकारी संकेतों का अनुसंधान करते हैं । इसी संतुलित दृष्टि की प्रेरणा से भारती जी आस्थाशील व्यक्तित्व की खोज करते हैं और मानव- भविष्य के प्रति स्वयं आस्थावान होते हैं” ।[1]
हमारे वैदिक समाज में स्त्रियों को पुरुषों की भांति शिक्षा का अधिकार प्राप्त था किन्तु धीरे-धीरे इस परंपरा का क्षरण होता गया और स्त्रियाँ शिक्षा के साथ-साथ समाज के सभी अग्रणी अधिकारों से वंचित होती गईं । रेखा कस्तवार के अनुसार “ई.पू. 200 के बाद स्त्री के उपनयन संस्कार बन्द हो जाने के कारण स्त्री की शिक्षा को धक्का लगा। अशिक्षित, अनुभवशून्य, डरी, छोटी उम्र की स्त्री के लिए पति उसका दिशा-निर्देशक बन गया, फिर देवता भी। जीवन पातिव्रत्य और पतिसेवा तक सीमित हो गया। विवाह के बाद भविष्य बदलने की कोई सम्भावना नहीं बची”।[2] बुद्धिजीवी तथा समाज के जागरूक व्यक्ति इस बात को अस्वीकार नहीं करेंगे की नारी सदियों से शोषिता थीं । पतिता होने के बावजूद कीचड़ में कमल खिलने के भांति वो हर परिस्थिति से जूझने तथा निबटने की क्षमता रखती थी। ऐसे में वह युद्धों में भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से भाग अवश्य लेती थी। युद्ध के कारण जो कुछ भी हो किन्तु नारी अपनी भूमिका सदैव भली-भांति निभाती हुई आई है ।
रामायण युगीन नारियों को अगर हम रामायण महाकाव्य के आधार पर चर्चा करे तो वे अत्यंत सुशील, पति के प्रति समर्पित, भक्ति-प्रेम की प्रतिमूर्ति के रूप में दर्शायी गई है। माता सीता एवं रावण की पत्नी मंदोदरी, कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा, उर्मिला आदि सभी अतुलनीय दृष्टांत हैं। इन सभी के गुणों की उपस्थिति के बावजूद रावण जैसे पुरुष सुंदरता को सर्वोपरि मानता है एवं वह स्वयं सर्वगुणसंपन्न होने के बावजूद अपनी कामना पूर्ति के लिए माता सीता का अपहरण करता है। इसके उपरांत युद्ध की घोषणा होती है। महाभारत काल में विभिन्न नारी पात्रों में प्रमुख पात्र पांडवों की पत्नी द्रौपदी रहीं। भले ही महाभारत के महायुद्ध होने के पीछे कई कारण रहा हो परंतु अपने भ्रातृ-वधू का चीर हरण तथा अपमान करके कौरवों ने युद्ध को आमंत्रित किया। द्रौपदी के अलावा अन्य मुख्य नारी पात्र में पांडवों की माता कुंती एवं कौरवों की माता गांधारी रहीं। माता गांधारी शत्रु पक्षों की माता होने की बावजूद अपने सत्यनिष्ठता, निरपेक्षता तथा साहसिकता के चलते पांडवों में पूजनीय थीं।
रेखा कस्तवार के अनुसार “मध्यकाल में यद्यपि स्त्रियों के शासनतन्त्र में भाग लेने के उदाहरण मिलते हैं। रजिया सुल्तान इस दिशा में महत्त्वपूर्ण नाम है। गौंडवाना की पारानी दुर्गावती, अहमद नगर की चाँद बीबी, अकबर की धाय माहमऊनगा, नूरजहाँ, महाराष्ट्र की ताराबाई इस काल के लीक से हटकर चलनेवाले व्यक्तित्व हैं जिन्होंने प्रशासन के क्षेत्र में अपने होने को प्रमाणित किया”।[3] आधुनिक काल के युद्ध में नारी गुप्तचर तथा विदूषिका आदि के रूप में भी सहायता की है । पर नारी का स्वभाव सर्वदा क्षमाशील व उदार रहा है ।
भारती के 'अंधा युग' में युद्ध की विवेचना-
वैश्विक परिदृश्य में युद्ध एवं उसकी भयावहता से कोई अंजान नहीं हैं। युद्ध एवं कलह सदियों से चलता आया है जो आज भी पृथ्वी के सभी समाज में उपस्थित हैं। एक भिज्ञ साहित्यकार अपने युग के प्रासंगिकता को ध्यान में रखकर ही साहित्य रचता है। ऐसे ही एक महान साहित्यकार डॉ. धर्मवीर भारती हैं। वे अपने युग के स्थिति के अनुसार कालजयी गीतिनाट्य ‘अंधा युग’ की रचना की जो 70 साल बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक है। वस्तुतः यह गीतिनाट्य 1954ई. में प्रकाशित हुआ था एवं इसमें महाभारत के भीषण महायुद्ध के 18वां दिन से ‘प्रभु की मृत्यु’ तक की गाथा है। प्रस्तुत गीतिनाट्य में पात्रों को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया गया है। नाटक में भगवान श्रीकृष्ण के पात्र के माध्यम से समाज में न्यूनतम रूप में उपस्थित नैतिक मूल्यबोधों को दर्शाया गया है। ‘अंधा युग’ शीर्षक से यह आशय है कि हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ अधर्म, अशांति, और असत्य आदि चारों तरफ विराजमान है। एक पक्ष हिंसक होने से दूसरे पक्ष भी उतना ही हिंसात्मक प्रतिक्रिया प्रदान करता है। प्रस्तुत गीतिनाट्य के पहले अंक कौरव नगरी में लेखक सामान्य कौरव नगरी के प्रहरी द्वारा कहते हैं कि-
टुकड़े-टुकुड़े हो बिखर चुकी मर्यादा
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है
पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा
यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है
यह अजब युद्ध है
नहीं किसी की भी जय दोनों पक्षों को खोना ही खोना है[4]
अर्थात एक पक्ष जितना भी मर्यादा और सत्य पथ का अनुसरण करें परंतु युद्ध के समय सभी पक्ष हिंसक एवं आत्मनियत्रंण खो बैठते है। फलस्वरूप अपनी हानि के साथ ही आम जनता को भी इस बर्बरता के ज्वाला में झोंक दिया जाता है। पांडव निष्ठावान होकर भी अपने भाई-बंधु एवं प्रिय परिजनों को युद्ध में खो बैठते हैं। युद्ध कभी भी किसी समाज के लिए हितकर नहीं रहा है। युद्ध के भयंकर परिणामों को ध्यान में रखकर ही महात्मा गांधी ने समग्र भारतवासियों को अहिंसा का मार्ग अपनाने के लिए जोर दिया था। युद्ध के उपरांत कोई भी स्थिति पहले जैसी नहीं रहती और पहले जैसा बनाने के लिए और भी श्रम, समय की खपत हो जाती है फिर भी पहले जैसी स्थिति नहीं बन पाती है। हाल ही में घटित इस्राइल-ईरान एवं रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन के प्रमुख शहर में मृत्यु का तांडव नृत्य युद्ध की भयावहता को दर्शाता है। इसके बाद इन देशों के मध्य शांतिपूर्ण रहन सहन में उत्पन्न खाईं को भरने में शायद शताब्दियां खप जाए। इस संदर्भ में नाटककार लिखते हैं-
मेहनत हमारी निरर्थक थी
आस्था का,
साहस का,
श्रम का,
अस्तित्व का हमारे कुछ अर्थ नहीं था।[5]
गीति-नाट्य में सत्य को नीचा दिखाकर एवं सत्ता को सर्वोपरि मानने वाले व्यक्तियों की मनोदशाओं का उल्लेख किया गया है। ऐसे एक पात्र धृतराष्ट्र हैं जो अपनी कुंठित एवं शंकित वासना पूर्ति के लिए राजा हो कर भी समग्र राज्य को युद्ध को संकटग्रस्त अवस्था में डाल दिए थे। धृतराष्ट्र कहते हैं
“आज मुझे भान हुआ।
मेरी वैयक्तिक सीमाओं के बाहर भी
सत्य हुआ करता है”
“मेरे वैयक्तिक अनुमानित सीमित जग को
लहरों की विषय-जिह्ववाओं से निगलता हुआ
मेरे अन्तर्मन में पैठ गया
सब कुछ बह गया
मेरे अपने वैयक्तिक मूल्य
मेरी निश्चिन्त किन्तु ज्ञानहीन आस्थाएँ”।[5]
अंधा युग में युद्ध के बाद की गांधारी-
गांधार देश की राजकन्या गांधारी का हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र के साथ विवाह हुआ था जो जन्मांध थे । अपने भाग्य को अपनाते हुए वे आजीवन पतिव्रता और उनकी अनुगामी रहीं। साथ ही पति के भांति दृष्टिहीन संवेदनाओं को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने के लिए अपने आँखों में सदैव के लिए पट्टी बांधी। परंतु आमतौर पर उनके चरित्र के अवधारणाओं की उपेक्षा की गई है । त्याग- बलिदान के प्रतिमूर्ति के अलावा उनके नारी सशक्तिकरण के पक्ष को अपेक्षाकृत अल्प आंका गया है । वे आदर्श पत्नी, नीतिज्ञ, ज्ञानी होने के साथ-साथ युद्धनीति तथा राजनीति कला में भी कुशल थीं । कौरवों एवं पांडवों के मतभेद में वे सर्वदा सत्य तथा धर्म का साथ दिया । महाभारत के महायुद्ध में भी वो अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन के प्रताड़नाओं एवं महत्वाकांक्षाओं के विरुद्ध रहीं परंतु वे युद्ध के चरम परिणति को ठुकरा न सकीं ।
मनुष्य अपने गुण-अवगुण के कारण बाकी प्रजातियों से अलग है। समाज में व्याप्त सामाजिक सरंचनाओं में मनुष्य का बंधा रहना कोई विशिष्ठ बात नहीं है । परंतु कुछ व्यक्ति इन सभी बंधनों से ऊपर उठ कर हमेशा यथार्थ तथा सत्य का मार्ग ही चुनते हैं । ऐसी नारी में गांधारी का नाम सबसे पहले आता है। परंतु ‘अंधा युग’ में गांधारी का चरित्र चित्रण बाकी ग्रंथों से भिन्न है। सभी ग्रंथों में उनको केवल साध्वी, त्याग तथा बलिदान की देवी के स्वरूप में ही दर्शाया गया है । परंतु इस कृति में युद्ध के बाद उत्पन्न त्रासदी के कारण बदलते हुए एक नारी स्वभाव अथवा एक नारी के मन में उत्पन्न पीड़ा को दर्शाया गया है ।
युद्ध की परिणति गांधारी को कटु एवं भगवान कृष्ण के प्रति अविश्वास दृष्टि को जन्म देती है। जो गांधारी भगवान की सर्वदा उपासना करती आ रही थीं, युद्ध के उपरांत उनके अस्तित्व के प्रति अनास्था प्रकट करती हैं । जो अपने पुत्र को धर्म के मार्ग पर चलने को कहती हैं, अंत में वही दोनों पक्ष में धर्म होने का खंडन करती हैं तथा उन्हें वंचक कहने से भी कतराती नहीं हैं । वो कहती हैं-
“मैंने कहा था दुर्योधन से
धर्म जिधर होगा ओ मूर्ख !
उधर जय होगी ! धर्म किसी ओर नहीं था। लेकिन !
सब ही थे अन्धी प्रवृत्तियों से परिचालित
जिसको तुम कहते हो प्रभु
उसने जब चाहा मर्यादा को अपने ही हित में बदल लिया।
वंचक है”।[6]
“किन्तु वीर है
उसने वह किया है
जो मेरे सौ पुत्र नहीं कर पाये
द्रोण नहीं कर पाये !
भीष्म नहीं कर पाये”! [7]
पुत्र शोक से जर्जरित होते हुए भी अंत तक विजय की आशा नहीं छोड़ती । युद्ध से पहले वे अपने पुत्र को धर्म और विजय का अन्तःसंबद्ध समझाने की कोशिश की थीं पर युद्ध के 18 वे दिन तक आते-आते दोनों पक्ष से धर्म और सत्य का विपक्ष में होना देख कर वो अपने मत में परिवर्तन करती हैं।
“मेरी यह आशा
यदि अन्धी है तो हो
पर जीतेगा दुर्योधन जीतेगा”।
युद्ध के आखिरी पड़ाव में दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापति बनाता है जो पांडवों के पाँच पुत्रों को मरने बाद दुर्योधन से मिलने आता है उसी समय दुर्योधन की मृत्यु होती है। गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन की मृत्यु से मर्माहत होकर वे अश्वत्थामा को भविष्य में सुरक्षित रखने के लिए उसके तन को व्रज बना देना चाहती हैं ।
संजय, मेरी पट्टी उतार दो
देखूँगी मैं अश्वत्थामा को
वज्र बना दूँगी उसके तन को[8]
प्रतिहिंसावश गांधारी उचित-अनुचित का अंतर न समझ कर श्रीकृष्ण को श्राप देती हैं। जब श्रीकृष्ण श्राप स्वीकार करते हैं, तब उनको प्रभु को दिए श्राप के लिए अपराध का बोध होता है और अगाध ममत्व फिर से बोल उठती हैं।
“रोई नहीं मैं अपने
सौ पुत्रों के लिए
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है।
कर देते शाप यह मेरा तुम अस्वीकार
तो क्या मुझे दुःख होता ?
मैं थी निराश, मैं कटु थी,
पुत्रहीना थी ।[9]
यहाँ लेखक की ओजपूर्ण अभिव्यक्ति को भी दे सकते हैं कि जहां एक माता प्रभु को पुत्र समान असीम प्रेम किया वहीं अपने पुत्र के तथाकथित अपराध एवं विसंगपूर्ण कार्यों से मर्माहत हो कर उनको श्राप देने से भी पीछे नहीं हटती हैं ।
निष्कर्ष-
मानव सभ्यता जब आधुनिक युग में प्रवेश किया तो उद्योग तथा आधुनिकीकरण के माध्यम से उन्नति के चरम शिखर पर पहुंचा गया। बीसवीं शताब्दी ने उज्जल भविष्य के साथ ही विकास की नई संभावनाओं को भी उजागर किया। यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी की मानव प्रायः सभी भौतिक संसाधनों से अपनी आवश्यकतापूर्ति के लिए पूर्ण रूप से सक्षम है। परंतु हमारे भीतर उपस्थित आसुरिक तत्व का वर्चस्व हमको उन्नति के बजाय नीचे गिराने में प्रमुख भूमिका निभाता है। वर्तमान समय में घटित युद्ध यह दर्शाता है की हम अभी भी आदिम काल के अनुरूप दुर्गति के दहलीज पर खड़े हैं। युद्ध में हारने के पश्चात भी मनुष्य प्रतिहिंसा के भावना में प्रज्ज्वलित रहता है और हर संभव अमानवीय कार्य करने का प्रयास करता है। मनुष्य जब तक मनुष्यता को को छोड़ भौतिक संसाधनों के आधार पर स्वयं एवं समाज का गठन करता रहेगा युद्ध की गुंजाइश बरकरार रहेगी । विश्व को युद्ध से रहित करने के लिए मानवीयता को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है भौतिक संसाधनों की नहीं। प्रस्तुत प्रपत्र में एक बात यह ध्यानाकर्षित करती है कि नारी अपने ममता में अपने बच्चे के प्रति अपना सर कर्तव्य निभाती है पर समय आने पर उनके कुकर्मों को उनसे परिचित करवाती है तथा उनको दंड भी देती है । गांधारी जैसी तेजस्वी महिला अपने व चनों तथा कर्म में सत्य मार्ग को हि अपनाया है जिसके चलते वो अपनी बातों को बेवाक हो कर बड़ों तथा सत्ता धारिओं के सामने रखती थीं । परंतु दुख की बात यह की उनकी सलाह को कोई कर्णपात नहीं किया । अंत में इतना साहस रखती थीं की प्रभु परात्पर को भी श्राप दि थीं । आज के नरिओं को उनके चरित्र से साहसिकता, ओजपूर्णता आदि गुणों की शिक्षा ग्रहण करने की आशा की जाती है ।
संदर्भ सूची-
सहायक ग्रंथ-
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SASWATI KHUNTIA
Research Scholar
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Mahatma Gandhi Antarrashtriy Hindi VIswavidyalay
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Volume 1 | Issue 2 | Edition 1 | Peer reviewed Journal | October, 2025- April, 2026 | kameng.in
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