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कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2

शोधालेख
विवेकी राय और महिम बोरा की कहानियों में चित्रित ग्राम्य जीवन का स्वरूप

Page No : 48-52 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=36


देबी देबांगना
शोधार्थी
मणिपुर विश्वविद्यालय, कांचिपुर इम्फाल-795003
शोध-सार

हिंदी साहित्य की विवेकी राय और असमिया साहित्य की महिम बोरा की कहानियों में गाँव और गाँव का जीवन केंद्र में है। भारत के दो अलग क्षेत्र से होने के बावजूद इन दोनों कहानीकारों की रचनाओं में चित्रित ग्रामीण जीवन में अद्भूद साम्य है। विवेकी राय की लगभग सभी कहानियाँ ग्राम्य जीवन पर केंद्रीत हैं जिनमें प्रमुख है- ‘गूँगा जहाज’, ‘भड़क-दो चित्र’, ‘पुराने गुलाब नये गावँ’, ‘नयी कोयल’, ‘एक दिन रेल हमारी’, ‘फिल्मी लड़का’, ‘बुढ़िया’,’मदारी’ और महिम बोरा ने भी अपनी कहानियाँ एटि पुवार जन्म’, ‘आबुर’, ‘एइ नदीर सोँते’, ‘हाड़माल’, ‘एखन नदीर मृत्यु’, ‘हरा-जिकार खेल’, ‘पँइताचोरा’ आदि में गाँव की सुंदर आभास चित्रित किया है। यह संयोग भी है दोनों कहानीकार समवयस्क है और उनकी कहानियों में भी बदलते गाँव का चित्रण मिलता है। इस शोधालेख में हम इन दोनों कहानीकारों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए इनकी विशेषताओं को समझने का प्रयास करेंगे।


बीज शब्द:

आधुनिकता, शहरीकरण, ग्राम्य जीवन, आर्थिक व्यवस्था, सभ्यता, संस्कृति, संवेदना


विषय- प्रवेश:

देश निर्माण की नींव ग्राम से ही होती है। किसी भी देश की सभ्यता, संस्कृति का परिचय गाँव से ही दिया जाता है। गाँव के बिना देश अधूरा एवं अकल्पनीय है। गाँव, भारतवर्ष की आत्मा है। वर्तमान समय में भी भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँव के निवासी है। भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था की नींव गाँव से ही है। यहाँ बसने वाले लोगों का जीवन सहज-सरल एवं सादगी से भरपूर है। सादगी से भरपूर यह गाँव के निवासी अपने आप को प्रकृति के अत्यंत करीब रखते हैं, तथा अपने जरूरतों के लिए प्रकृति के ऊपर निर्भर है। 



भारतीय ग्राम्य जीवन भारत की आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था का अधार है। ग्राम्य जीवन में प्रचलित लोगों की संस्कृति, परम्परा एवं इसकी विविधता से ही भारत समृद्ध बनता है। परम्परा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक चलती है। परम्परा एक गतिशील प्रक्रिया हैं। बदलते समय के साथ सादगी से परिपूर्ण ग्रामीण जीवन भी मनुष्य की स्वार्थवृत्ति के चलते प्रथम अवस्था में धीरे-धीरे और परवर्ती समय में तेज गति से परिवर्तित होने लगा। इन बदलते समय के साथ लोगों के बीच संवेदनाओं की कमी होने लगी। नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘कहानी: नयी कहानी’ में लिखा है “संवेदनाएँ किसी मूर्त मानव-व्यक्ति का आधार लेकर खड़ी होती हैं और एक निश्चित संदर्भ में पैदा होती है! यह संदर्भ चाहे सामाजिक हो, चाहे प्राकृतिक सामाजिक संघर्ष के सिलसिले में ही व्यक्ति की संवेदनाएँ छिटकती हैं। व्यक्ति के सामाजिक संघर्ष का रूप बदलता है, तो संवेदनाओं के ढाँचे में भी परिवर्तन आता है। नयी संवेदनाएँ व्यक्ति और उसके समाज के नवीन संघर्ष की सूचक होती है”[1]। संवेदनाएँ वास्तव में मानव मन के अनुभव और जीवन की पृष्ठभूमि पर आधारित होती हैं। इनका जन्म किसी न किसी ठोस संदर्भ में- जैसे सामाजिक या प्राकृतिक परिवेश में होता है। कहानी के कथानक में व्यक्त संवेदनाएँ उस व्यक्ति के सामाजिक संघर्षों से जुड़ी होती हैं। जैसे-जैसे समाज और उसमें रहने वाले व्यक्ति के संघर्ष का स्वरूप बदलता है, वैसे-वैसे उसकी संवेदनाएँ और उन्हें व्यक्त करने के तरीके भी बदल जाते हैं। संवेदनाएँ समाज और व्यक्ति के बदलते संघर्षों की देन हैं, और कहानी इन्हीं नए संघर्षों से जन्मी नई संवेदनाओं को व्यक्त करती है।



विवेकी राय हिंदी साहित्य के एवं महिम बोरा असमिया साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। दोनों प्रायः समकालीन थे जिसके चलते दोनों के साहित्यों की समयसीमा भी लगभग आस-पास थी। विवेकी राय और महिम बोरा भारतवर्ष के दो अलग क्षेत्र के थे परंतु दोनों की नींव गाँव से जुड़ी थी। एक तरफ विवेकी राय उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के निवासी थे एवं दूसरी तरफ महिम बोरा असम के नगाँव जिले छोटे से गावँ से थें। परंतु दोनों की कहानियाँ भारत के ग्रामीण कथानक पर आधारित है। दोनों कहानीकार का ग्रामीण जीवन से गहरा लगाव था, जिसके चलते उनकी कहानियों में ग्राम्य जीवन की मिट्टी की गंध पूर्ण रूप से थी। छोटे-बड़े दिन-प्रतिदिन घटने वाले साधारण सी घटनाओं को असाधाण रूप से दोनों साहित्यकारों ने अपनी कहानियों का कथानक बनाया। दोनों कहानीकार ने गाँव में अपना बचपन बिताने के कारण अपने साहित्य में भी प्रमुखता से इसका उल्लेख किया है।



विवेकी राय और महिम बोरा भारत के दो अलग क्षेत्रों के होने के बावजूद उनकी कहानियों में वर्णित भारतीय गाँवों की यथार्थ चित्रण में कभी ऐसा प्रतीत नहीं होता है। यह भारत के दो अलग क्षेत्र के नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष की हर एक गाँव की कहानी है। यह क्षेत्र विशेष न होकर भारतवर्ष से जुड़े कोटि-कोटि लोगों की कहानी है। दोनों साहित्यकार की रचनाएँ माध्यम है, जो समाज के सामने इन घटनाओं को उजागर करती है।



ग्रामीण जीवन में आने वाले तमाम परिवर्तन मनुष्य के स्वार्थवृत्ति के कारण है। समाज परिवर्तनशील है परंतु परम्पराओं का खंडन कर लोगों के बीच आने वाले तमाम परिवर्तन एवं रिश्तों में बदलाव कहीं न कहीं गाँव के सादगी को ग्रसित कर रही थी। लोगों के बीच रहने वाले संवेदनात्मक लगाव धीरे-धीरे बदलना शुरू हुआ। आधुनिकता एवं शहरीकरण ने साधारण गाँव के लोगों को धीरे-धीरे बदलना शुरू किया। यह बदलाव निरंतर वर्तमान समय तक चला आ रहा है। विवेकी राय ने लिखा है “बहुत कठिन है बदलते गाँवों की पकड़। पकड़ते-पकड़ते वह बदल जाता है”[2]। बनावटी बदलाव की पकड़ से धीरे-धीरे साधारण गाँव के लोग तमाम प्रयासों के बाद भी निकलने में असमर्थ हो रहे थे। सरल और साधारण सी गाँव में बाहरी चमक-धमक, कृत्रिमता और विकृतियाँ आने लगी। भारतीय समाज प्राथमिक रूप से ग्रामीण समाज ही था, परंतु बदलते समय के साथ साथ नगरीकरण बढ़ा। भारत के बहुसंख्यक लोग आज भी गाँव में रहते हैं। स्वतंत्रता के बाद लोगों के मन में धीरे धीरे नगरीकरण के प्रति जाने लगी। लोग परम्परा और प्रगति, अंधविश्वास और विज्ञान के बीच जुझने लगे। साधारण गाँव के लोगों के लिए यह सहज नहीं था कि अचानक से आने वाले इस परिवर्तन को किस प्रकार स्वीकार करे। शहरीकरण की हवाँ ने गावों को शहर के साथ यातायात, नौकरी के माध्यम से जोड़ा। लोग गाँव से रोजी-रोटी और नौकरी के लिए शहर के तरफ जाने लगे। यह वर्तमान समय में भी निरंतर चली आ रही है। गाँव के लोगों की जो सहज-सरल स्वभाव था वह धीरे-धीरे नष्ट हो गया था। स्वार्थ, अहं की भाव लोगों के मन में आने लगी। यह विकास की हवा साधारण गाँव के निवासियों के लिए आशीर्वाद और श्राप दोनों बनने लगा।



विवेकी राय ने अपनी कहानी ‘गूँगा जहाज’, ‘भड़क-दो चित्र’, ‘पुराने गुलाब नये गावँ’, ‘नयी कोयल’, ‘एक दिन रेल हमारी’, ‘फिल्मी लड़का’, ‘बुढ़िया’ आदि कहानियों में गाँव के बदलते स्वरूप दो स्पष्ट रूप से दिखाया है। इसी प्रकार महिम बोरा ने अपनी कहानियाँ ‘एटि पुवार जन्म’, ‘आबुर’, ‘एइ नदीर सोँते’, ‘हाड़माल’, ‘एखन नदीर मृत्यु’, ‘हरा-जिकार खेल’, ‘पँइताचोरा’ आदि कहानियों में ग्रामीण समाज के बदलते स्वरूप को दिखाया है। भारत के गाँवों में बसने वाले लोग साधारण मानसिकता के होते हैं, उनके मन में कोई भी कृत्रिमता की झलक देखने को नही मिलती परंतु बदलते समय के साथ साथ वे अपने आप को भी बदलने लगे। विज्ञान के आगमन से वे परम्पराओं को कहीं धीरे-धीरे भूलने लगे थे। गाँव के लोगों में किसी भी नए  सामान के लिए हमेशा कौतूहल का भाव रहता है। गाँव में आने वाले नये चीजों के लिए वे हमेशा आश्चर्य से देखते हैं। ‘भड़क: दो चित्र’ कहानी में एक साइकिल के आगमन से लोगों के मन में बड़ने वाले उत्सुकता और कौतूहल को दिखाया गया है। शहरों के लिए साधारण सी लगने वाली साइकिल जब पहली बार गाँव में आया तब लोगों के मन में होने वाले कौतूहल और सब लोगों के द्वारा देखने वाले सरलता को विवेकी राय ने अपनी कहानी में प्रस्तुत किया है। “कुछ ऐसे गाँव हैं, जहाँ अगर कोई आदमी पाजामा अथवा सूट पहनकर जाये तो वहाँ के कुत्ते भौंकने लगेंगे। उन्होंने ऐसा पहनावा देखा ही नहीं कभी। इसी प्रकार उस दिन जाना कि ऐसे भी छोटे-छोटे गाँव है, जहाँ साइकिल चली गयी तो न केवल उस गाँव के लड़के ताली बजाते और शोर करते देखने के लिए दौड़, आपितु वहाँ के बकरे-बकरियाँ भी तड़ातड़ पतली रस्सियों को तोड़कर भाग चली”।[3] गाँव के लोगों के लिए पजामा अथवा सूट पहनकर किसी व्यक्ति का आना अत्यंत बड़ी और आश्चर्य की बात होती है। जब गाँव में साइकिल आई तब छोटे बच्चे से लेकर बड़े तक भौचक्के हो गए तथा साइकिल के पीछे-पीछे बच्चे ताली बजाकर दौरने लगें। बच्चे और बड़ों के साथ-साथ गाँव के बकरी कुत्ते भी उनके पीछे-पीछे भागने लगे। शहर के लिए साधारण सी लगने वाली यह बात गाँव के लोगों के लिए आश्चर्य और कौतूहल की विषय बन जाती है। पहली बार किसी नये सामान की आने की खुशी और कौतूहल की वर्णन महिम बोरा ने अपनी कहानी “हाड़माल” में दिखाया है। “शुन ताहानिर कथा। तहँत तेतिया सँचते नाइ। एइखन गाँवत मोर तेतिया नतुन चाइकेल। सेइबार मरापाटर दाम पाइ नतुन चाइकेल किनि लौछिलोँ”।[4] अर्थात कहानी का नायक टंकेश्वर सोचता है वह अपनी साइकिल की कहानी अपने पोते-पोतियों को भी कहेगा, जब वह उस समय पहली बार अपनी साइकिल बजार से खरीदकर गाँव में लाया था तब पूरे गाँव में बस उसी के पास एक नई साइकिल थी। उस समय जूट की खेती अच्छे दाम में बिक्री हुई थी और उसी के पैसे से ये साइकिल मैंने शहर से खरीदा था। एक साधारण- सी लगने वाली साइकिल भी गाँव के लोगों के लिए बहुत ज्यादा गौरव और महत्वपूर्ण विषय बन जाती है। परिवर्तित गावों में साइकिल की आगमन भी बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण विषय बन जाती है।



  विवेकी राय की अन्य एक कहानी है ‘पुराने गुलाब नये गाँव’ इस कहानी में बढ़ती हुई आबादी के कारण गाँव भी विस्तारित होती जा रही है। जहाँ भी खाली जगह मिले वही लोग बसने लगे है। जिसके कारण पुराने गाँव का स्वरूप बदलता जा रहा है। नदी के किनारे में बढ़ती बस्ती के कारण लोगों को तमाम असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। “पीपल कट गया तो काफी जगह निकल आयी। दूखी के लड़कों ने मिट्टी भरकर सारी खुली जमीन छेंक ली। बाबू सहाब भी नहीं बोले कि उनकी परजा बढ़ रही है”।[5] जगह की अभाव से लोगों की खेलने कूदने के लिए मैदान भी कम होता गया है। “गाँव रबर की तरह बढ़ता जाये। छोटी जातियाँ एक से इक्कीस होती जावें। फैमिली-प्लानिंग यहाँ तक आते-आते थक जाये”।[6] गाँव की  बढ़ते आबादी के साथ आज लोग भी विरक्त हो चुके हैं। नदी का तट भी बढ़ती आबादी से नहीं बच पाया है। स्वतंत्रता के बाद प्रगति की जो लहर गावों में आई उससे प्रकृति का भी भारी मात्रा में नुकासान हुआ। महिम बोरा ने अपनी कहानी ‘एखन नदीर मृत्यु’ में दिखाया है। कैसे बदलते समय के साथ-साथ प्रगति के आगमन से नदियों में पूल बंधना भी आरम्भ हुआ। शहरों से गाँवों में यातायात के लिए सड़क आई और साथ ही कलंग नदी में पूल बांधने का काम शुरू हुआ। कहानी के पात्र धनेश्वर कहता है “एनेखन स्वाधीन देश ह’ल ऐ- जीया कलंगखन मारि पेलाले। एइ कलंगपारर माछुवौ राइजखनको ये मारि पेलाले एइ चकु थका धेंदेलाहँते देखा नाइ नेकि?”[7] अर्थात देश की स्वतंत्रता के बाद जो प्रगति की लहर गाँव में आई उसमें जीवित नदी में भी पुल बनाकर मार डालने की कोशिश की जा रही है। आँखे होने के बाद भी लोगों को दिखाई नहीं दे रहा है कि इस पुल से गाँव के लोगों को और मछुआरों के जीवन में कितनी परेशानियाँ आयेगी। उनकी आय का स्त्रोत ही बंद हो जाएगा।



गाँव के बदलते स्वरूप में पुराने गाँव टूटकर खत्म हो चुके हैं। लोगों के चिंतन में भी एक भारी बदलाव आया। लोगों के बीच का प्यार, आंतरिकता, परस्पर लोगों के बीच की मित्रता धीरे-धीरे खत्म हो चुकी थी। लोग अपने स्वार्थ के आगे कुछ नहीं सोचते थे। नयी पीढ़ी में त्याग की भावना, कर्तव्य परायण की भावना खत्म हो चुकी थी। उच्छृंखलता के कारण नयी पीढ़ी अनुशासनहीन हो चुकी थी। विवेकी राय की कहानी ‘फिल्मी लड़का’ का मुख्य पात्र अपने शिक्षा को पूरा न करके फिल्म की दुनिया में ही डूबे रहता हैं। ‘बुढ़िया’ कहानी में टूटते पारिवारिक सम्बंधों को दिखाया गया है। आधुनिकता की हवा से गाँव के लोगों के जीवन में आने वाली कड़ुवाहट को दिखाया गया है। इसी प्रकार महिम बोरा ने भी अपनी कहानियों में बदलते रिश्तों को दिखाया है। ‘आबुर’ कहानी में फिल्मों में दिखाये गये नग्न अभिनेत्रियों को देखकर आने वाली पीढ़ियों के मन में होने वाले दायित्वहीनता, दूसरों के ऊपर निर्भर होने वाले व्यक्तित्व को दिखाया है। परम्परागत समाज की पहले जैसी आंतरिकता और प्यार के अभाव को महिम बोरा ने अपने कहानियों के माध्यम से दिखाया है।



निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि आधुनिकता के दौर में गाँव के लोगों की जीवनशैली में जो परिवर्तन आया वह कहीं न कहीं शहरीकरण का प्रभाव है। परिवर्तन की हवा से गाँव में आने वाले बदलाव को विवेकी राय और महिम बोरा ने अपनी कहानियों के माध्यम से उजागर किया है। स्वतंत्रता के बाद गाँव के जीवन में और लोगों में आने वाली तमाम परिवर्तन को दोनों कहानीकारों ने अपनी कहानियों के माध्यम से दिखाया। मशीनीकरण और आविष्कारों से लोगों का जीवन सुगम बना परंतु इसके साथ साथ तमाम परेशानियों का भी सामना लोगों को करना पड़ा। दोनों लेखकों ने अपनी कहानियों के माध्यम से परिवर्तन की हवा के कारण होने वाली समस्याओं पर भी अपनी चिंता प्रकट की है। विवेकी राय और महिम बोरा ने ग्रामीण जीवन में आने वाले बदलाव को स्वागत तो किया परंतु साथ ही साथ आने वाली विकृतियों की समालोचना को भी अपनी कहानियों के माध्यम से उजागर किया।



संदर्भ:







[1] नामवर सिंह, कहानी : नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन,इलाहावाद, संस्करण- 2023 ई. , पृ.सं. ‌- 47,





[2] विवेकी राय, आम रास्ता नहीं है, प्रभात प्रकाशन,नई दिल्ली, संस्करण- 1988 ई. पृ.सं.-99,  





[3] पृ.सं.- 332,





[4] सं.हिरेन गोहाँइ,  गल्प समग्र:  महिम बोरा, बनलता प्रकाशन, गुवाहाटी, संस्करण-2012 ई., पृ.सं.-121





[5] विवेकी राय, सामलगमला, विश्वविद्यालय प्रकाशन,वाराणासी, संस्करण- 2011 ई.  पृ.सं.-383





[6] वहीं, पृ.सं.- 383





[7] सं.हिरेन गोहाँइ,  गल्प समग्र:  महिम बोरा, बनलता प्रकाशन, गुवाहाटी, संस्करण-2012 ई.,



 पृ.सं.-173,




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DEBI DEBANGANA

Research Scholar

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Manipur University, Canchipur, Manipur

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Kameng E-Patrika. Vol. 1, no. 2, Oct. 2025–Apr. 2026, ISSN 3048-9040 (Online). Peer-Reviewed Journal.
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Volume 1 | Issue 2 | Edition 1 | Peer reviewed Journal | October, 2025- April, 2026 | kameng.in

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