सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 53-57 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=37
लेखक का परिचयः लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ का जन्म सन् 1864 में असम के ऐतिहासिक जिला शिवसागर के एक प्रसिद्ध परिवार में हुआ था। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति रहे हैं। उन्होने एक साथ कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, जीवनी, निबंध आदि सभी विधाओं में अपनी कलम चलाई है। असमिया साहित्य तथा लोकसाहित्य के क्षेत्र में लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ का स्थान सर्वोपरि रहा है। असमिया साहित्य के स्वर्णयुग नाम से ख्यात जोनाकी युग में ‘जोनाकी पत्रिका’ के माध्यम से उनकी साहित्यिक प्रतिभा प्रकाश में आयी। बेजबरुआ के कहानियों में असमिया लोकजीवन की परम्परा प्रतिफलित होती है। लोककथाएँ प्रायः काल्पनिक होती है परंतु उसका सार समाज सापेक्ष होता है। बेजबरुआ की कहानियाँ इस मामले में अति निपुण है। कोई भी व्यक्ति लोक कथाओं के संबंध में उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ है- ‘बुढ़ी आईर साधु’, ‘कोका देउता आरु नाति लोरा’, ‘जुनुका’ आदि। प्रस्तुत कहानी उनकी लोक कहानियों का संग्रह ‘बुढ़ी आईर साधु’ में ‘सिलोनी जियेकर साधु’ शीर्षक से संकलित है। इस ग्रंथ मं कुल तीस कहानियाँ (लोक कथाएँ) संगृहित है। इस महान साहित्यकार की तुलना आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से होती है। जिन्होने असमिया साहित्य के आधुनिकीकरण में अपना अमुल्य योगदान दिया है। सन् 1938 में डिब्रुगड़ में इनका निधन हुआ।
अनुदित कहानीः
एक देश में एक कुम्हार रहता था। उसके पास बहुत धन- दौलत था। परन्तु उसका कोई पुत्र संतान नहीं था। उसकी पत्नी जब भी गर्भवती होती, हर बार वह एक कन्या संतान को ही जन्म देती थी। इस बात से कुम्हार हमेशा उदास रहा करता था। कुछ दिनों बाद जब कुम्हार की पत्नी फिरसे गर्भवती हुई, तो उसने अपनी पत्नी से कहा, "अगर इस बार भी तुमने कन्या संतान को जन्म दिया, तो मैं तुम्हे नागा बाजार में बेच दूँगा।" यह सुनकर पत्नी घबरा गई। उसकी प्रसव की समय पास आ रहा था, इसलिए कुम्हार की पत्नी अपने मायके चली गई। परन्तु दुर्भाग्यवश उसने इसबार भी एक कन्या संतान को ही जन्म दिया। वह भय से काँप उठी, क्योकि उसके पत् ने पहले ही उसे धमकि दे रखी थी। उसने बिना समय गवाये पति को पता चलने से पहले ही नवजात बच्ची को एक मिट्टी के बर्तन में रखकर, उसे पुराने कपड़ों से ढँक दिया उपर से और एक ढक्कन लगाकर बर्तन के साथ साथ अपनी छोटी सी बच्ची को नदी में प्रवाहित कर दिया। मिट्टी का बर्तन नदी में धीरे धीरे बहता हुआ चला गया। उसी समय एक धोबी नदी किनारे कपड़े धो रहा था। उस धोबी की नज़र उस नदी में तैरती हुई बर्तन पर पड़ी। उस बर्तन के अंदर क्या है यह देखने के लिए धोबी तैरकर बर्तन के पास गया और ढक्कन खोल कर देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने देखा कि नदी में तैरती बर्तन में किसीने एक नवजात बच्ची को मरने के लिए छोड़ दिया है। धोबी ने अपने मन में ही निश्चय किया कि वह उस बच्ची को गोद लेगा। उसने ढक्कन हटाया, बर्तन को पकड़ा और धीरे- धीरे पार की ओर तैरने लगा। जब वह पार की ओर आ रहा था, तभी अचानक एक चील आकर बर्तन से बच्ची को पकड़ लिया और उड़ गई। एक ऊँचे पेड़ पर चील ने अपना घोंसला बनाया हुआ था। उसने बच्ची को वहीं रखा। उस नन्ही सी बच्ची को देखकर चील का मन स्नेह से भर गया। इसलिए उसने बच्ची को पालने का निश्चय कर लिया।
रोज़ाना चील को जो भी अच्छा खाना मिलता, वह उस पर झपट पड़ती और लड़की को खिलाने के लिए ले आती। इस तरह चील धीरे- धीरे उस बच्ची को बड़ी करती गई। अगर चील को कहीं धूप में सुखाया हुआ कोई बढ़िया कपड़ा दिखाई देता, तो वह उसे अपने चोंच से उठाकर ले आती है और बेटी को पहनने के लिए देती है। एक दिन, एक राजकुमारी नदी में नहाने के लिए आयी और नदी में उतरने से पहले अपनी गहने नदी के किनारे उतार कर गयी। आसमान पर उड़ते हुए चील ने उसे देखा और तुरंत उन गहनों पर झपट्टा मारा और उन्हें अपनी बेटी के लिए ले आई। इस तरह वह अपनी बेटी के इस्तेमाल के लिए कंघी, शीशा और तरह- तरह के सौंदर्य प्रसाधन लेकर आने लगी। धीरे- धीरे वह बच्ची पेड़ की डाल पर ही बड़ी होती गई और वह सुंदरता में मानो परी जैसी लगने लगी है। एक दिन चील ने उससे कहा, "मेरी प्यारी बेटी, अब तुम बड़ी हो गई हो। मैं रोज़ तुम्हें अकेला छोड़कर बहुत दूरी तक निकल जाती हूँ। इसलिए मुझे तुम्हारी सुरक्षा की बहुत चिंता होती रहती है। आज से, जब भी तुम्हें डर लगे या मेरी ज़रूरत हो, तुम मुझे इस तरह से बुलाना, मैं तुरंत तुम्हारे सामने आकर हाज़िर हो जाऊँगी-
पत्ते हवा में हिलते हैं,
चील माँ मेरे पास आती है।
एक दोपहर, चील की बेटी पेड़ की एक शाखा पर बैठकर अपने बालों में कंघी कर रही थी। लगभग उसी समय, एक व्यापारी उस रास्ते से गुजर रहा था, वह धूप में थका हुआ महसूस कर रहा था और आराम करने के लिए पेड़ के नीचे बैठ गया। उस जगह पर कोई आदमी नहीं था। कहीं से एक बाल उड़कर उसकी गोद में आ गिरा। वह उसे देखकर हैरान हुआ और उस बाल को उठा लिया। बाल काफी लंबा था, उसने इसे मापकर देखा तो बाल की लंबाई सात फुट थी। व्यापारी ने चारों ओर देखा और सोचा कि यह बाल कहाँ से आ सकती है। उसी समय, उसने पेड़ की ओर देखा। वहा उसने एक सुंदर लड़की को पेड़ की एक शाखाओं पर बैठकर अपने बालों में कंघी करते देखा। व्यापारी आश्चर्यचकित हुआ और उसने पूछा, "तुम कौन हो? कोई देवता या एक इंसान? या एक परी? या कोई राक्षसी, मुझे अपने बारे में बताओ? तुम इतनी दोपहर में पेड़ की डाली पर क्यों बैठी हो?" इससे पहले, लड़की ने कभी किसी इंसान को नहीं देखा था। इस प्रकार, भयभीत लड़की यह तय नहीं कर सकी कि जवाब में क्या कहे और उसने घबराकर अपनी माँ को पुकारा।
जैसे ही उसने आवाज़ लगाई, चील कहीं से उड़कर तुरंत उसकी बेटी के सामने आ गई। उसने अपनी बेटी से पूछा कि उसने क्यों बुलाया , तो बेटी ने उस आदमी की ओर इशारा किया। चील ने उस नौजवान और सुंदर व्यापारी को देखकर सोचा कि अगर वह अच्छा आदमी निकला, तो वह अपनी बेटी का विवाह उससे करा देगी। ऐसा सोचकर चील नीचे आई और व्यापारी को अपनी बेटी के बारे में सब कुछ विस्तार से बताने लगी। व्यापारी ने चील से कहा, "मेरे पास बहुत धन है। मैं एक धनी व्यक्ति हूँ। परन्तु मेरी पहले से ही सात पत्नियाँ हैं। अगर तुम बिना किसी द्वेष के अपनी पुत्री का विवाह मुझसे कर दोगे, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे सुखी और संतुष्ट रखूँगा। मैं उस पर कभी दुःख नहीं आने दूँगा।" व्यापारी की बातें सुनकर, उसने उसके प्रस्ताव पर सहमत होने से पहले कई बार सोचा। उसने अपनी पुत्री को बहुत समझाया और उसे नीचे लाकर व्यापारी को सौंप दिया। चील रो पड़ी और उससे विनती करने लगी कि वह लड़की को किसी भी प्रकार का कोई दुःख न दे। उसने अपनी पुत्री से भी कहा, "प्रिये, जब भी तुम्हें मेरी आवश्यकता हो, मुझे उसी प्रकार बुलाना जैसा मैंने तुम्हें सिखाया है, मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगी।"
इस प्रकार, व्यापारी चील की बेटी को अपने घर ले आया और उसे प्यार और देखभाल से रखने लगा। लेकिन उसकी सुंदरता देखकर, बाकी पत्नियों ने सोचा कि इतनी सुंदर पत्नी पाकर व्यापारी उनसे ऊब जाएगा। ऐसा सोचकर, वे सातों चील की बेटी से ईर्ष्या करने लगीं और उसे कष्ट देने लगीं।
एक दिन सातों पत्नियाँ इकट्ठा हुईं और चील की बेटी से बोलीं, "क्या तुम खुद को कोई सुंदर परी समझती हो? क्या हम घर का सारा काम करेंगे और तुम्हारे लिए खाना बनायेंगे है ताकि तुम बैठकर खा सको? जाओ, आज तुम खाना बनाओ।" उसने अपनी ज़िंदगी में कभी खाना बनाया ही नहीं। इसलिए वह चावल नहीं बना पा रही थी। कोई और उपाय न मिलने के कारण, वह रोती हुई घर के पिछे केले के बाग में चली गई। वहाँ बैठकर उसने अपनी माँ को पुकारने लगी ,
"हवा में केले के पत्ते नाचते हैं,
चील माँ मेरे सामने प्रकट होती हैं।"
जैसे ही उसने ऐसे पुकारा, चील उसके सामने आ गई। चीलने अपनी बेटी से पूछा, "क्या हुआ? तुमने मुझे क्यों बुलाया?" बेटी ने उत्तर दिया, "माँ, मेरे पति की दूसरी पत्नियों ने मुझे चावल बनाने के लिए कहा है। मुझे खाना बनाना नहीं आता। अगर मैं खाना नहीं बनाऊँगी, तो वे मेरे पति के सामने मेरे बारे में बात करेंगी और मुझे नहीं पता कि वे मुझे और क्या करने के लिए कहेंगी।" अपनी बेटी की बातें सुनकर, माँ ने कहा, "बेटी, किसी भी बात से डरो मत। मेरी बात सुनो, मैं तुम्हें चावल बनाने का तरीका बताती हूँ। एक मिट्टी का खाना पकाने वाला बर्तन लो और उसमें पानी भरो। इसमें चावल का दाना डालो। एक और खाना पकाने वाले बर्तन में पानी भरो और उसमें किसी भी सब्जी का को काटकर उसके टुकड़े डालें। फिर खाना पकाने वाले बर्तनों के नीचे जलाऊ लकड़ी रख दो और रसोई से बाहर आकर बैठ जाओं। थोड़ी देर बाद तुम्हें बर्तनों में चावल और कढ़ी सब्जी का अक्षय भंडार दिखाई देगी। अपनी बेटी को यह सलाह देकर चील उड़ गई। बेटी ने बिल्कुल वैसा ही किया जैसा उसकी माँ ने उसे सिखाया। भोजन के समय, बाकी सभी पत्नियों ने अपनी- अपनी थालियों के नीचे गड्ढा खोद लिया। जैसे ही चील की बेटी उनकी थालियों में चावल परोसती, वे उसे गड्ढे में फेंक देती और फिरसे माँगने लगती। इस तरह, चील की बेटी दूसरी पत्नियों को बार बार परोसती जाती और वे हर बार भोजन नष्ट कर फिर माँगती। अंत में दूसरी पत्नियाँ हार कर शर्म से वहाँ से उठकर चली गयी, चील की बेटी का बनाया हुआ खाना खतम ही नहीं हुआ।
एक दिन चील की बेटी को व्यापारी की दूसरी पत्नियों ने गौशाला साफ़ करने को कहा। वह गौशाला में गई और पहले की तरह अपनी माँ को पुकारने लगी। जैसे ही उसने माँ को तरह पुकारा, चील उसके सामने आ गई। जब उसने उसे पुकारने का कारण पूछा, तो बेटी ने कहा, "माँ, मेरे पति की दूसरी पत्नियाँ मुझे गौशाला साफ करने के लिए कह रही है। मुझे गौशाला साफ करना नहीं आता, आपको यही पूछने के लिए बुलाया है कि इसे कैसे साफ किया जाए।" माँ ने कहा, "बस एक बार झाड़ू को गौशाला के एक तरफ से दूसरी तरफ घुमा दो। तब जगह साफ हो जायेगी।" यह कहकर, उसकी माँ उड़ गई, बेटी ने वैसा ही किया जैसे माँ ने उसे सिखाया। और गौशाला साफ- सफाई से पहले से भी ज्यादा चमक उठी। चील की बेटी का ऐसा अच्छा काम देखकर, व्यापारी और भी अधिक उससे प्यार करने लगा।
जैसे ही बोहाग बिहू (असम में मनाया जाने वाला वसंत उत्सव और नए साल का दिन चैत और वैसाख के संक्रांति में मनाया जाता है) करीब आया, व्यापारी ने अपनी आठों पत्नियों को कपास देकर कहा, "तुम सभी मेरे लिए इस नए साल में पहनने के लिए कपड़े और गमछा बुन कर लाओं। और मैं देखूंगा कि कौन सबसे अच्छा बुनता है। सातों पत्नियों में से प्रत्येक ने कपास को कताई के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। लेकिन चील की बेटी उदास बैठी रही क्योंकि वह कताई और बुनाई के बारे में कुछ नहीं जानती थी। अन्य पत्नियों ने सोचा कि चील की बेटी मुश्किल में है। वह कुछ नहीं जानती। वह अपने पति के लिए कपड़े कैसे बुन सकती है? चील की बेटी पिछवाड़े में गई और पहले की तरह अपनी माँ को रोते हुए पुकारा। इस पर चील अपनी बेटी के सामने प्रकट हुई और उससे पूछा, -क्या बात है? जब बेटी ने कपड़े बुनने की बात बताई तो चील ने उससे कहा, "अच्छा मेरी प्यारी, चिंता मत करो। तुम अपने पति को कपड़े दे सकोगी। चारों बाँसों में एक- एक रुई की डिब्बी रख दो- कपड़े अपने आप बन जायेंगे, तुम बिहू के दिन अपने पति को ये बाँस सौंप देना। यह कहकर चील उड़ गई। बेटी ने वही किया जो उसकी माँ ने सलाह दी थी। व्यापारी की अन्य पत्नियाँ अपने काम पर लग गईं। चील की बेटियों द्वारा कपास को अलग रखा हुआ देखकर, वे मन ही मन खुश हुईं और सोचने लगीं, "इस बार हमारी सौतन फंस गई है। अगर चील की बेटी कपड़े बुनने में असमर्थ रही, तो व्यापारी उसे माफ नहीं करेगा।" नए साल की मौके पर, सातों पत्नियों ने अपने- अपने बुने हुए कपड़े अपने पति को पहनाए। लेकिन चील की बेटी ने अपने पति को सिर्फ़ बाँस की चार नलियाँ ही दीं। यह देखकर व्यापारी की बाकी पत्नियाँ ज़ोर ज़ोर से हँस पड़ी। व्यापारी ने चील की बेटी से गुस्से से पूछा, "ये तुम मुझे क्या दे रही हो? कपड़े कहाँ हैं?" उसने कहा, "ज़रा इन बांस की नलियाँ खोलकर तो देखो।" जब व्यापारी ने नलियाँ खोलीं, तो उनमें से सुंदर- सुंदर कपड़े निकलकर आये। और वे इतने अच्छे थे कि दूसरी पत्नियों के कपड़े उनकी तुलना में चिथड़े जैसे लग रहे थे। इसलिए व्यापारी ने दूसरे कपड़ों को फाड़कर फेंक दिया और चील की बेटी के दिए कपड़े पहन लिए। धीरे- धीरे व्यापारी की दूसरी पत्नियों को पता चल गया कि चील उसे कठिन परिस्थितियों से उबरने का उपाय बताने आती है, जिससे वह हर काम बखुबी कर लेती हैं। यह जानकर उन्होंने चील को मारने की योजना बनाई। उनमें से एक यह सुनने के लिए बैठी थी कि चील की बेटी अपनी माँ को कैसे पुकारती है और अंततः यह जान ही गई। एक दिन, वह गौशाला में गई और चील की बेटी की तरह पुकारने लगी। उस पर, चील आई और उसके सामने प्रकट हुई। उस क्षण, उसने झाड़ू से चील पर जोर से प्रहार किया और उसे मार डाला। उसने उसे गाय के गोबर के नीचे दबा दिया। चील की बेटी को इस बात की जरा सी भी भनक नहीं लगी। इसके बाद, चील की बेटी ने कई बार अपनी माँ को पुकारा, लेकिन, वह कहाँ से आती? तब चील की बेटी समझ गई कि व्यापारी की अन्य पत्नियों ने षड्यंत्र करके उसकी माँ को मार डाला है। यह जानने के बाद बेटी बहुत रोई।
कुछ दिनों बाद, व्यापारी व्यापार के लिए जाने को तैयार हुआ। जाते समय उसने अपनी सातों पत्नियों को चेतावनी दी कि वे चील की बेटी के पास न आएँ और उसकी अच्छे से ध्यान रखें।
एक दिन उनके गाँव पर एक दूसरे व्यापारी कंघी, आईना, सिंदूर, सुगंधित तेल और सौंदर्य प्रसाधन की विभिन्न वस्तुएँ लेकर आया था, उसने अपने नाव को व्यापारी के घाट पर ही बाँध दिया। व्यापारी की अन्य पत्नियों ने उस व्यापारी के हाथों चील की बेटी को बेचने की योजना बनाई। व्यापारी के पत्नियों ने उस नए व्यापारी से सामान ले लिया और कहा कि बदले में वे उसे एक सुंदर लड़की देंगे। उन्होंने लड़की की सुंदरता और गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह उनकी बात मान गया। दूसरी पत्नियों ने चील की बेटी से कहा, "हमारे घाट पर एक व्यापारी नाव बाँध रहा है, जिसके नाव भर सामान है। चलो, उससे कुछ सामान खरीद लेते हैं।" चील की बेटी बोली, "बहनों, मुझे कुछ नहीं चाहिए। तुम सब जाओ, मैं यहीं रहूँगी। मेरे पति ने मुझे कहीं न जाने को कहा है।" जब वे उसे बार- बार अपने साथ चलने के लिए कहते रहे, तो वह हिचकिचाते हुए अंततः मान ही गई। सामान देखने के बहाने व्यापारी ने उसे नाव में बिठा लिया। व्यापारी और पत्नियों द्वारा बनाई गई योजना के अनुसार, उसने अचानक नाव खोल दी और चील की बेटी को अपने साथ ले गया।
व्यापारी उसे अपने घर ले गया। वहाँ उसने उसे सूखी मछलियों का रखवाला बना दिया। चील की बेटी धूप में सूखी मछलियों की रखवाली करते हुए रो रो कर विलाप करने लगी-
कुम्हार की पत्नी ने मुझे नदी में बहा दिया।
चील माँ ने मुझे पानी से उठा लिया,
व्यापारियों के राजकुमार ने मुझसे विवाह किया।
उसकी सात पत्नियों ने मुझे एक मछली वाले को बेच दिया।
और उसने मुझे सूखी मछलियों का रखवाला बना दिया।
उसका व्यापारी पति उसी रास्ते से नाव से घर की ओर जा रहा था। दूर से रोने की आवाज सुनकर उसने नाव वहीं रोक दी और चील की बेटी के पास गया। उसने उसके रोने का कारण पूछा तो उसने विस्तार से सब कुछ बता दिया। फिर उसने उसे नाव पर बिठाया, नहलाया, नए कपड़े पहनाए और अपने साथ ले आया। व्यापारी ने चील की बेटी को एक लकड़ी के संदूक में छिपा दिया और उसमें सांस लेने के लिए एक छेद कर दिया। घर पहुँचकर उसने अपने अन्य सामान के साथ संदूक को भी अपने कमरे में रख दिया। जब उसने सातों पत्नियों को देखा तो उनसे पूछा, "मैं आप सभी को देख रहा हूँ, लेकिन चील की बेटी मुझे क्यों नहीं दिख रही है?" उन सभी पत्नियों ने उत्तर दिया, "वह अपनी माँ की घर गयी है, गए हुए कई दिन हो गए हैं, लेकिन वह अभी तक वापस नहीं आई है।" यह सुनकर व्यापारी बोला, "मुझे लगता है कि तुम सबने उसके साथ कुछ किया है। तुमलोग सच बोल रहे हो या झूठ यह जानने के लिए मैं तुमलोगो का परीक्षा लूँगा।" ऐसा कहकर, उसने एक गड्ढा खोदा उसमें पत्ती रहित कांटेदार शाखाएँ लगाईं। उसके बाद, उसने गड्ढे के एक छोर से दूसरे छोर तक एक ताज़ा तुरई बाँधी। फिर उसने अपनी पत्नियों से कहा, "जो लोग इस धागे को रेंग कर पार कर लेंगे, उन्हें निर्दोष माना जाएगा। एक- एक करके छह पत्नियाँ गड्ढे में गिर गईं और मर गईं और जब वे इसे पार कर रही थीं तो धागा टूट गया। लेकिन सातवीं सहेली नहीं गिरी। वह सात बार धागे के पार गई लेकिन धागा बरकरार रहा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह चील की बेटी को व्यापारी को बेचने के बारे में कुछ नहीं जानती थी। जब अन्य पत्नियाँ ऐसा कर रही थीं, वह खाना पकाने में व्यस्त थी।
व्यापारी ने उन छह पत्नियों को उसी गड्ढे में दफना दिया और चील की बेटी को संदूक से बाहर निकाल लिया। अंततः, वह चील की बेटी और अपनी शेष सातवीं पत्नी के साथ सुख- शांति से रहने लगा।
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Monmi Borthakur
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