सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 57-60 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=38
रावेंद्र अपनी मरहूम पत्नी की फोटो के सामने खड़ा आंसू बहा रहा था। यह काम तो अब रोज - रोज का था उसका! जीवन के कुछ पल बहुत नाजुक होते हैं। जो नासमझी में बिना सही उपयोग किए ही चले जाते हैं। रावेंद्र की पत्नी भारती भी एक कुशल गृहिणी थी। कई परंपराएं निभाती रही वह, मायके तरफ की भी, ससुराल तरफ की भी! उस समय के मुताबिक वह ठीक-ठाक पढ़ी लिखी थी। भारती मिडिल पास थी। घूंघट में रहना, सास - ससुर की सेवा करना; पति को खुश रखना भारती अपना कर्तव्य मानती थी।
भारती को ब्याह कर रावेंद्र अस्सी के दशक में लाया था। छुई-मुई सी भारती पति से भय खाती थी। वह बहुत संभलकर रहती थी, बोलती थी। सबकुछ रावेंद्र से या सास से पूछकर ही करती थी।
इधर रावेंद्र गांव में शहर से व्याहकर बढ़िया बहुरिया लाया था, यह गांव में चर्चा का विषय था। रावेंद्र भी भारती से डरता था। रावेंद्र के जब तक माता - पिता जीवित रहे थे, तब - तक रावेंद्र - भारती मर्यादित आचरण से एक दूसरे से मिलते रहे थे।
दो बच्चों के जन्म के बाद माता पिता ने रावेंद्र - भारती को उनके हाल पर छोड़ दिया था, आखिर एक दिन सबके माता- पिता जाते हैं सो रावेंद्र के माता-पिता, भारती के सास - ससुर भी इस दुनिया से रवाना हो गए थे। दोनों ने संतुलित जीवन जीते हुए एक दूसरे का साथ निभाते हुए बच्चों को पढ़ाने - लिखाने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखे थे।
दोनों एक-दूसरे से डरते थे, फिर भी एक दूसरे से दूर नहीं रहते थे। डरते हुए संकोच करते थे, एक दूसरे को, एक दूसरे की कमी नहीं कह पाते थे। जो भी अनाज खेतों में पैदा करते थे, उसका सदुपयोग करना कोई उन दोनों से सीखें! एक मिशाल थे गांव में शांत परिवार के रूप में!
भारती मन ही मन बहुत प्यार करती थी अपने पति रावेंद्र को! रावेंद्र भी भारती को बहुत प्यार करता था, कह नहीं पाता था। दोनों एक-दूसरे से संकोच करते हुए ही कोई बात कहा करते थे।
समय गतिमान है। जीवन को कब क्या हो जाए, कब गृहण लग जाए कोई नहीं जानता है। अचानक एक दिन रावेंद्र की तबियत बिगड़ी, पेट में दर्द उठा था। भारती के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी थी। बच्चे छोटे - छोटे, भादों की अंधेरी रात, काली घटा घेर लिया था; रह - रहकर बिजली की कड़क हृदय को दहला रही थी।
गांव में एक झोला छाप डॉक्टर रहता था। वही एक सहारा था। शहर जाने के लिए कोई साधन नहीं था। तब सड़क नहीं थी। गांव में किसी - किसी के पास साइकिल हुआ करती थी। बैलगाड़ी से कैसे जाया जा सकता था।
भारती रावेंद्र से डरती थी कि, यह जाने नहीं देंगे। एकांत में घर रावेंद्र ने बनाया था। रावेंद्र कभी भी आदेशात्मक शब्दों का इस्तेमाल भारती के लिए नहीं करता था।
भारती ने रावेंद्र से कहा, "मैं अभी आई!" तब फोन का अता-पता नहीं था।
भादों की आधी रात, काले बादल घिरे हुए, न जमीन नजर आ रही थी, न पगडंडी! एक अंदाजन पैर पड़ रहे थे, भारती के; फिर भी चाल में कमी नहीं आई थी। डर नहीं एक दृढ़ निश्चय था, पति के लिए डाक्टर को लाना है।
कभी - कभी बिजली की चमक के साथ बादलों की गरज दिल दहला देने वाली आवाज करते थे। फिर भी भारती को कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह उसी धुन में चली जा रही थी।
रीं रीं रीं झींगुरों की धुन, वातावरण को भयानक बना रहे थे। एक नाले को पार करके करीब आधा किलोमीटर गांव के बीचोंबीच डाक्टर झक्खड़ी का निवास, दवाखाना सबकुछ वहीं था। नाले में जुगुनू की चमक बड़ी डरावनी थी। कितना भी हिम्मत वाला होता अकेले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। धन्य है भारती जो चली जा रही थी अपने लक्ष्य की ओर!
आदमी की आहट पाकर उल्लू तरह - तरह की डरावनी आवाजें निकाल रहे थे। भारती को कोई फर्क नहीं पड़ता था। नीचे पैरों में सांप भी लिपट सकता था, भारती को अपने मर जाने का जरा सा भी डर नहीं था।
गांव में लोग चिमनी के अलावा कुछ नहीं जलाते थे, बड़े घरों में लालटेन जलती थी। भादों की आधी रात में पूरा गांव गहरी नींद में मस्त सोया हुआ था। गांव की खोर में बहुत ही गहरा, घना अंधेरा था; हाथ मारे नहीं सूझता था। कुत्तों का भी भय था, गनीमत थी कि, एक भी आवारा कुत्ता भारती को नहीं मिला था।
किसी तरह से टटोलते - टटोलते वह डाक्टर झक्खड़ी के घर के बाहर पहुंच गई थी। वह सोचने लगी थी कि, 'लानत है किसानों की जिंदगी को! एक टार्च तो दूर की बात है, लालटेन नहीं है कि, उसी के सहारे आ जाती। चिमनी लेकर आती तो तेज हवा चल रही थी वह बुझ जाती!'
हाथ से टटोलकर, डाक्टर झक्खड़ी के दरवाजे की कुंडी भारती की पकड़ में आ गई थी। भारती कुंडी लगातार खटखटाने लगी थी। आखिर डाक्टर की घरवाली को कुंडी की खटखटाहट सुनाई पड़ गई थी। वैसे सतर्कता में स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा सतर्क रहती हैं।
डाक्टराइन दरवाजे के पास आई, दरवाजा खोलने से पहले उसने पूछा, "कौन है?"
भारती ने कहा, "बहन मैं भारती हूं, नदी पार से आई हूं, डाक्टर साहब से काम है!"
भारती का ब्यौहार गांव में बहुत अच्छा था। एक बार डाक्टर को खटाई के लिए आम नहीं मिल पा रहे थे, डाक्टर को लड़की की शादी करनी थी। तब भारती ने अपने बगीचे से यह कहकर कि, 'जितने आम की जरूरत हो लेकर जाओ!'
भारती ने डाक्टर के लाख कहने पर भी एक पैसा नहीं लिया था। डाक्टराइन को आज भी याद है। भारती ने कहा था कि, "तुम्हारी बेटी है तो वह हमारी भी बेटी है हम पैसे नहीं लेंगे!"
डाक्टराइन, भारती को आदर के साथ अंदर लेकर गई थी। उसने डॉक्टर झक्खड़ी को जगाया। भारती ने कहा, "उनकी तबियत खराब है पेट फूल रहा है, दर्द भी है!"
डाक्टर झक्खड़ी दवा देना चाहा था, तब डाक्टराइन ने झपटकर कहा, "डरते हो, वह मेहरिया जाति होकर बिना टार्च, लालटेन के आ गई हैं, तुम टार्च लेकर जाओ, बल्कि रात में नहीं आना, वहीं सो जाना!"
डाक्टर झक्खड़ी झोला उठाया, टार्च लेकर भारती के साथ उसके घर की ओर चल पड़ा था। रास्ते में आगे - आगे अपर्णा सरपट में चल रही थी, पीछे - पीछे डाक्टर झक्खड़ी चल रहा था।
घर में आती डाक्टर के साथ भारती को देखकर रावेंद्र सबकुछ समझ गया था, वरना वह सोच रहा था कि, 'यह भारती चली कहां गई!'
रावेंद्र कुछ भी नहीं बोला। डाक्टर झक्खड़ी ने देखा - परखा, सल्फाडाइजीन की गोली खिला दिया था। थोड़ी देर में रावेंद्र को आराम हो गया था।
डाक्टर झक्खड़ी के सोने की व्यवस्था भारती ने रावेंद्र के पास ही कर दिया था। खुद भारती यह कहकर कि, "किसी चीज की जरूरत पड़े तो मुझे बुला लेना मैं आ जाऊंगी!"
सुबह डाक्टर झक्खड़ी अपने घर चला गया था। रावेंद्र - भारती पूर्व की तरह घर के संचालन में लग गए थे। समय दौड़ रहा था। रावेंद्र - भारती एक दूसरे के पूरक थे, कभी एक - दूसरे को परेशान नहीं करने का बीड़ा उठा रखा था।
ऐसा दाम्पत्य जो एक - दूसरे को बहुत प्यार करता हो, कुछ हक जताने की, हक जमाने की तनिक भी कोशिश नहीं करता हो ऐसे दंपति बहुत कम देखने को मिलते हैं; फिर दोनों के स्वभाव एक जैसे होते हों यह तो बहुत कम मिलते हैं। स्वभाव एक जैसे होते हैं, नरम, गरम का अंतर होता है।
सब दिन होय न एक समाना, सब नर होय न एक समाना! ऐसा कहा जाता है। जबकि, रावेंद्र, भारती एक समान, एक स्वभाव क्या प्रकृति की कहूं या उस अदृश्य शक्ति की रचना कहूं जिसे आज तक किसी ने देखा ही नहीं है; सिर्फ उसके लिए लड़ते हुए अनेक नामों से पुकारा करते हैं!
वह अद्भुत, अदृश्य शक्ति को ईश्वर, खुदा, गाड, वाहेगुरु, जिनेंद्र आदि आदि नामों से पुकारा करते हैं। अपने कर्मों का ध्यान नहीं करते हैं, करते हैं तो उसे दोष देते हैं कि, उसने यह कर दिया है।
उस ऊपर वाले को निर्दयी भी कहते हैं क्योंकि, अच्छे कर्म करने वालों को तकलीफ ज्यादा होते देखने में आया है। रावेंद्र - भारती अपनी दुनिया में मस्त, अभाव में भी अच्छा महसूस कर रहे थे। क्योंकि जोड़ी सलामत होने से एक दूसरे के पूरक थे वो!
ऐसा दाम्पत्य जीवन जिनका भय में छिपा रहा प्रेम! एक दूसरे को प्यार करते थे फिर भी मुंह से कभी इजहार नहीं करते थे। एक दूसरे से भय करते थे कि, कोई गलती नहीं हो जिससे डांट खानी पड़े!
गलती तो इंसान ही करते हैं। गलती रावेंद्र से हो जाती थी, भारती ने जाना, जानकर भी रावेंद्र को कुछ भी नहीं कहा यह भारती का प्यार था जो उस गलती को भारती डरते - डरते सुधारने में लग जाती थी; सुधार भी दिया करती थी।
गलती भारती भी करती थी। रावेंद्र उसे डरते - डरते सुधारने में मदद करता था, कुछ कहता नहीं था। शायद इसी को दिली प्रेम कहते हैं।
उनकी ख़ुशी में जाने किसकी नजर लग गई; भारती अचानक एक दिन बीमार पड़ गई थी। रावेंद्र जिला अस्पतालों से लेकर पी जी आई, एम्स आदि अस्पतालों में ले जा - जाकर भारती को भर्ती कराता रहा। दवा के साथ दुआ, पंडितों से जाप, पूजा करवाने में, खुदा के दरगाहों में हाजिरी लगाता रहा; उसे कोई सहाय नहीं हुआ।
आज भारती ने कहा, "रावेंद्र तुम मुझे प्यार करते हो यह तो समझती थी, इतना प्रेम करते हो नहीं जानती थी। मैं तो बहुत भय करती रही कि मुझसे कोई गलती नहीं हो जाए जिससे तुम्हारे दिल को ठेस पहुंचे! तुम मेरी गलतियों को भी प्यार किया करते थे; यह तो मैं अब जान सकी हूं!"
रावेंद्र के आंसू बहने लगे थे। रावेंद्र भरे हुए गले से कहा, "भारती, मैं भी भय करता था। गलतियों से बहुत घबरा जाता था कि, तुम नाराज हो जाओगी। तुम जानकर भी मेरी गलतियों को छुपा लिया करती थी, गलतियों को सुधार लिया करती थी, मुझे कुछ भी नहीं कहती थी शायद इसी को कहते हैं प्रेम, प्यार! मेरा तुम्हारा भय में छिपा रहा प्रेम जो सबसे अच्छा अपने-आप में अद्वितीय है!"
भारती कहती थी, "रावेंद्र भगवान समय से पहले मुझे तुमसे अलग कर रहा है, तुम्हें तकलीफ होगी यह जानकर, इसीलिए दिल रोता है, बहुत दुखी हो जाती हूं! जब इस सुख की कल्पना करती हूं कि, तुम्हारी बाहों में मेरा दम छूटेगा तो मन प्रफुल्लित हो जाता है। मेरी सभी सांसों के साथी तुम होगे यह अनुभूति मुझे सुख देती है, तुम्हारा सानिध्य मेरी पीड़ा कम कर देता है!"
रावेंद्र भारती के बहते हुए आंसुओं को ऐसे पोंछता है कि, उसके लगे नहीं। दोनों के भय में इतना प्रगाढ़ प्रेम छुपा था जिसे लिख पाना किसी के लिए संभव नहीं है। मन के सभी कोनों में वह एक दूसरे के साथ रहते थे। एक दूसरे को नहीं देखा तो, बेचैनी बढ़ जाती थी, यही तो प्रेम था जिसे अब जानकारी में लाया गया था।
भारती एकटक देखती रावेंद्र की गोद में बैठी उसकी मजबूत बाहों में सुरक्षित रावेंद्र से कुछ कहना चाहती थी। भारती कह नहीं पाई सिर्फ रावेंद्र के मुख को देखती रही थी; देखते - देखते उसके प्राण पखेरू उड़ गए थे। रावेंद्र भी नहीं जान पाया था कि, मेरी भारती कब इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
आज उसकी फोटो से बातें करते हुए आंसुओं में भीगता रावेंद्र धुलकर पवित्र हो गया है; ऐसा महसूस कर रहा है। सारी उम्र भय में छिपा रहा प्रेम, अब आंसुओं के रूप में भादों मास की झड़ी की तरह नदी बनकर बह रहे थे। इसी बहाव में एक दिन रावेंद्र भी बह जाएगा, यह निश्चित है।
यही जिंदगी है जो रावेंद्र की जिंदगी की तरह एक दिन अकेले बह जाएगी। भारती के विछोह में चीत्कार उठी है रावेंद्र की आत्मा; जो आंसू बनकर पिघल - पिघलकर बह जाएगी बर्फ की तरह विछोह की गर्मी पाकर!
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