सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 61-69 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=39
“This little part of my life is called happiness.”
(“मेरे जीवन का यह छोटा सा हिस्सा ख़ुशी है”)[1]
अंग्रेजी भाषा की फिल्म दी परस्सुट ऑफ़ हिप्पीनेस (2006) (The Pursuit of Happiness, 2006) के आखिरी दृश्य में फिल्म के मुख्य किरदार क्रिस की डबडबाई आँखें हम दर्शकों से कुछ सेकंड्स के लिए रूबरू होती है. यह नौकरी मिलने की ख़ुशी नहीं है, बल्कि अपने ५ साल के बेटे को खाना और छत देने की ख़ुशी है. उसके बाद के दृश्य में किरदार क्रिस कहता है: “मेरे जीवन का यह छोटा सा हिस्सा ख़ुशी है”. क्रिस अपनी डबडबाई आँखों से ख़ुशी के पल को जीता है और उसी पल में भीड़ में चलता हुआ ख़ुद के लिए ताली भी बजाता है. चेहरे के हाव-भाव, डबडबाई आँखें और हाथों से ताली बजाना- ये सब उस पल में उसकी ख़ुशी के भाव को सिमेना के पर्दे पर बयां करती है. सिनेमा हॉल के अँधेरे में दर्शक, जो अपना अस्तित्व, रोजमर्रा की जद्दोजहद और अपनी दिनचर्या के उबाऊपन को सिनेमा हॉल के बाहर छोड़ आया है, क्रिस के साथ ख़ुशी के साकारात्मक भाव को महसूस करते हैं. कई क्रिस के साथ रोते भी हैं. डबडबाई आँखें या रोना सिर्फ दुःख के भाव को ही नहीं, बल्कि ख़ुशी के भाव को भी बयां करती है और इस दृश्य में क्रिस के भाव को उसके सन्दर्भ में समझने की जरुरत है.
भाव एवम् भाषा
मानव अपने ‘भाव’ शब्दों के माध्यम से, तो कभी हाव-भाव के द्वारा तो कभी चिन्हों के मार्फ़त तो कभी मौन रहकर बतलाता है. जब भी भाव को बतलाने, संप्रेषित करने, दिखलाने, कहने, डिस्प्ले करने, व्यक्त या जाहिर करने की बात आती है तो भाव शाब्दिक आयाम से परे जाता है और भाषा की नयी परिभाषा भी गढ़ देता है, जहाँ ‘अशाब्दिक’ और ‘सांकेतिक’ भी भाषा बन जाते हैं. ऊपर दिए गए पहले उदाहरण में क्रिस का पात्र शब्दों से ही नहीं, अपने शारीरिक हाव-भाव के माध्यम से ख़ुशी व्यक्त करता है. ऐसा इसलिए भी संभव है, क्यूंकि इसका माध्यम दृश्य-विधान है. इससे इतर साहित्य में सिर्फ शब्दों के माध्यम से ‘शाब्दिक’ और अशाब्दिक भावों को लिखा जाता है, चाहे वह विधा उपन्यास, नाटक, कविता, संस्मरण या आत्मकथा हो. साहित्य के दृष्टिकोण से भावों को देखें तो कई सवाल उठते हैं: क्या साहित्य में भावों को इंगित करने वाली शब्दावली के अलावा भी किसी और अन्य भाषाई माध्यम से भावों को लिखा जा सकता है? अगर हाँ, तो उसकी भाषा क्या होगी? उसके लिए कौन सी/कैसी साहित्यिक रणनीति अपनाई जाती है ? जैसा कि पहले के उदाहरण में ख़ुशी के भाव को दर्शाया गया है, तो सवाल उठता है कि क्या ख़ुशी के भाव को व्यक्त करने वाले इस दृश्य को सिर्फ शब्दों में लिखा जा सकता है ? अगर लिखा जा सकता है तो उसकी भाषा कैसी होगी ? शब्द कैसे होंगे ? इत्यादि.
जर्मन भाषा विज्ञान और साहित्य से विश्लेशक रुऊडीगर श्नैल (Rüdiger Schnell) अपनी किताब Haben Gefühle eine Geschichte? Aporien einer History of Emotions (2015) में साहित्य और भाव के बाबत साहित्यिक रणनीति की बात करते हैं और दो मौलिक सवाल करते हैं: क्या एवं कैसे; यानि कि टेक्स्ट अथवा व्याखान में भाव पर क्या बात हुई है और कैसे बात हुई है ? ‘क्या’ वाला सवाल टेक्स्ट के अंतर्वस्तु और विषय को खंगालता है और ‘कैसे’ वाला सवाल साहित्यिक रणनीति को ‘डीकंस्ट्रक्ट’ करता है. टेक्स्ट में लिखे/वर्णित/संप्रेषित किये गए भाव को लेखिका – टेक्स्ट – पाठक और सन्दर्भ के चतुष्कोण से ‘डीकंस्ट्रक्ट’ किया जा सकता है. इस लेख में टेक्स्ट और सन्दर्भ के माध्यम से भाव को ‘डीकंस्ट्रक्ट’ करने की कोशिश की गयी है. भाव को ‘सामाजिक भाव’ (social emotion) एवं ‘अंतर्वैक्तिक भाव’ (inter-personal emotion) की श्रेणी में रख कर इस लेख में ‘नफरत’ जैसे नकारात्मक भाव को केंद्र में रखकर, विभिन्न सन्दर्भों में इसकी विवेचना की गयी है। भाषा के द्वारा संप्रेषित भाव के आयामों पर साहित्य के दो उदाहरण लेकर इस लेख में चर्चा की गयी है। पहला उदाहरण ऑड्रे लोर्ड (1934-1992)के लेख ‘Eye to Eye: Black Women, Hatred, and Anger’ (1984) से लिया गया है और दूसरा उदाहरण प्रिमो लेवी (1919-1987) के संस्मरण Se questo è un uomo, 1947 (If This is a man) से लिय गया है। दो अलग काल और संदर्भ में लिखे गए दोनों साहित्य को एक करता है: नफ़रत का ‘भाव’। एक तरफ़ नस्लिए भेदभाव (racial discrimination) और दूसरी तरफ़ यहूदियों के प्रति भेदभाव (antisemitism).
इस लेख के पहले भाग में नफरत की परिभाषाओं और इसके बहुआयाम को थ्योरी/सिद्धान्त के माध्यम से समझने की कोशिश की गई है और दुसरे भाग में साहित्य से दो उदाहरणों के माध्यम से व्याख्या की गई है।
‘नफरत’ की सेधांतिक परिभाषा: सामाजिक एवं अंतर्वैक्तिक भाव
‘भाव’, जिसके लिए अंग्रेजी में ‘Emotion’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, कई प्रकार के होते हैं. तीसरी शताब्दी (A.D) में मूलतः संस्कृत में लिखे नाट्यशास्त्र के छठे भाग ‘रसाध्याय’ में भावों की चर्चा की गयी है. यहाँ वर्णित आठ स्थायी भावों (रति, हास्य, शोक, क्रोध, भय, उत्साह, विस्मय और जुगुप्सा) में जुगुप्सा भी एक महत्वपूर्ण भाव है. हिंदी में जुगुप्सा के समानार्थी है: घृणा, नफरत, निंदा, बुराई इत्यादि. हिंदी भाषा में जुगुप्सा अथवा घृणा और नफरत के मायने समान हैं.[2] अंग्रेजी में ‘घृणा’ के लिए ‘Disgust’ और ‘नफरत’ के लिए ‘Hate’, दो अलग अलग शब्दों का इस्तेमाल किया गया है और ‘Disgust’ और ‘Hate’ को दो अलग भावों के तौर पर परिभाषित करने की और समझने की कोशिश भी की गयी है. जर्मन भाषा में भी ‘Disgust’ के लिए ‘Ekel’ और ‘Hate’ के लिए ‘Hass/Haß’ शब्दों का प्रयोग होता है. जर्मन भाषा में भी इन दोनों भावों को एकदम दो अलग भावों के तौर पर देखा गया है. भावों की जटिलता इसी में है कि कई मौकों पर एक साथ कई भावों का मिश्रण होता है, तो कई सन्दर्भों में एक केंद्रीय भाव के साथ दुसरे भाव हाशिये पर होते हैं. रॉबर्ट ग्राफिक लिखते हैं कि एरिस्टोटल की प्रशिद्ध रचना Ēthika Nikomacheia (The Nicomachean Ethics) में ग्यारह प्रकार के भावों की, जिसे एरिस्टोटल “पाथे” (“pathe”) लिखते हैं, की चर्चा की गयी है: “[...] emotions (pathe): appetite (epithumia), anger (orge), fear(phobos), confidence(thrasos), envy(phthonos), joy(chara), love(philia), hate(misos), yearning(pothos) desire to emulate(zelos) and pity(eleos).”[3] . अंग्रेजी का शब्द ‘Hate’ या ग्रीक भाषा का शब्द ‘misos’ या हिंदी भाषा के शब्द जुगुप्सा, घृणा या नफरत, अथवा जर्मन भाषा के शब्द Ekel और ‘Hass/Haß’ एक ऐसे भाव की तरफ इशारा करते हैं, जो इन सभी भाषाओँ में एक नकारात्मक भाव माना गया है, और जिसकी सांस्कृतिक, सामाजिक और एतिहासिक समझ एक दुसरे से भिन्न और अलग है. काल, सन्दर्भ, संस्कृति और समाज की विभिन्नताओं और जटिलताओं में ही भावों को परिभाषित किया जा सकता है और इसे समझा जा सकता है.
किसी भी भाव की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती. एक भाव के लिए विभिन्न भाषाओँ में भिन्न शब्द हो सकते हैं और कई सन्दर्भों में एक भाव दुसरे कई भावों के साथ अस्तित्व में आते हैं. कई विषयों के लेंस से भाव को देखा जा सकता है. ऐसी ही एक कोशिश यहाँ भी की गयी है, ‘नफरत’ के भाव को समझने के लिए. इस लेख में ‘नफरत’ शब्द का चयन किया गया है और यह चयन इसलिए भी क्यूंकि समकालीन सन्दर्भ में अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘Hate’ के लिए हिंदी में ‘नफरत’ शब्द का इस्तेमाल प्रचलन में है. टिफ़नी वाट स्मिथ एरिस्टोटल द्वारा व्याखा किये गए ग्रीक भाषा के शब्द ‘misos’ अथवा ‘नफरत’ को समझते हुए लिखती हैं कि एरिस्टोटल के अनुसार “‘नफरत’ एक अमूर्त भाव है और यह भाव हमेशा किसी समूह या समुदाय के खिलाफ महसूस किया जाने वाला भाव है. हो सकता है कि ‘नफरत’ किसी व्यक्ति विशेष के लिए हो, लेकिन ‘नफरत’ इसलिए है क्यूंकि वो व्यक्ति विशेष किसी समुदाय का हिस्सा है. एरिस्टोटल के अनुसार ‘नफरत’ एक ‘लाइलाज’ बीमारी की तरह है जिसका एकमात्र मकसद है: ‘विनाश’. जब हम किसी से नफरत करते हैं तो ऐसा नहीं है कि हम उससे लड़ना चाहते हैं, बल्कि हम ये चाहते हैं कि उस इंसान का अस्तित्व ही मिट जाए.”[4] एरिस्टोटल ‘नफरत’ को नैतिकता से भी जोड़ कर देखते हैं: ‘नफरत’ उनके लिए महसूस किया जाता है जिन्होंने किसी प्रकार के अन्याय को अंजाम दिया हो. एरिस्टोटल की इस व्याखा में ‘नफरत’ महसूस करना एक पीड़ादायक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इस भाव के माध्यम से न्याय की तरफ खड़े होना है. इस प्रकार ‘नफरत’ का भाव हमारे अंदर एक सकारात्मक भाव को जगाता है, जिसे नैतिक श्रेष्ठता कहते हैं.[5]
सारा अहमद (The Cultural Politics of Emotions, 2004) ‘नफरत’ के सन्दर्भ में लिखती है कि “यह हमेशा किसी चीज या किसी इंसान के विरुद्ध महसूस होता है और दृश्य-घटना-विज्ञानं (Phenomenology) के दृष्टिकोण से यह जान-बूझ कर पुरे विवेक से किसी इंसान के विरुद्ध महसूस होता है”.[6] बैर्द और रोसेनबाउम (1992) लिखते हैं कि “seething with passion against another human being“[7] ‘नफरत’ है. ‘नफरत’ का सब्जेक्ट अपने लिए एक ऑब्जेक्ट की तलाश में रहता है और उसका ऑब्जेक्ट या तो ‘काल्पनिक’ (imagined) या कोई ‘दूसरा’ (other) हो सकता है. इस ‘काल्पनिक’ और ‘दुसरे’ को नफरत का ऑब्जेक्ट बनाने के लिए पूर्वाग्रह और अवधारणायें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. डेविड होल्ब्रूक अपनी किताब The Masks of Hate. The Problems of False Solutions in the Culture of an Aquisitive Society (1972) में लिखते हैं कि ‘नफरत’ की स्थिति में सब्जेक्ट को ऑब्जेक्ट के साथ एक विध्वंशकारी रिश्ते की कामना होती है और इस प्रकार सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट के साथ जुड़ता है और यह जुड़ाव ‘नफरत’ का जुड़ाव होता है.[8] इन सभी व्याख्यायों में ‘नफरत’ सामाजिक एवं अंतर्वैक्तिक भाव है जो हमें मूलतः चेक भाषा में लिखी गयी मिलन कुंदेरा की किताब “The Joke” (1967) के एक छोटे से भाग में भी देखने को मिलता है. इस उपन्यास में लुडविक जान नाम का पात्र मिलिट्री बैरक की निगरानी में प्राग शहर के एक खदान में काम करता है. एक सुबह वह देखता है कि उसका साथ काम करने वाला अलेक्सेज को साथ के और लोग उसकी घोर निद्रा से उसे उठाने का प्रयास करते हैं. इस कोशिश में मिलिट्री के सिपाही भी शामिल हैं. वही सिपाही, जिससे वहां काम कर रहे कामगारों को हमेशा कोफ़्त होती है. कमजोर और थके शरीर वाले अलेक्सेज को लेकर सिपाहियों में एक तरह की नफरत है और उनकी इस नफरत में साथ काम करने वाले और भी कामगार शामिल हो जाते हैं. अलेक्सेज को नींद से उठाने के लिए बैरक का कमांडर पानी का ड्रम ले आता है. सब लोग अपने इस कृत्य को ‘Joke’ यानि उपहास समझते हैं, जबकि लुडविक इसे ‘नफरत’ लिखता है: “मुझे इस बात से गुस्सा आ रहा था कि अलेक्सेज के लिए साझा नफरत ने अचानक से उस सब के बीच की सारी उंच-नीच को एक कर दिया [...] और सबने कमांडर की क्रूरता पर एकजुटता महसूस किया.”[9] ‘नफरत’ कामगारों और उनकी पहरेदारी करने वाले सिपाहियों के बीच का अंतर मिटा देता है और इस पल में साझा ‘नफरत’ मिलिट्री कमांडर, सिपाही और साथी कामगार के बीच एकजुटता पैदा करता है. इस एकजुटता के केंद्र में है ‘नफ़रत’ और “क्रूरता”. अलेक्सेज उनकी ‘नफरत’ का साझा ऑब्जेक्ट है. ‘नफरत’ जैसे नकारात्मक भाव यहाँ सामाजिक एवं अंतर्वैक्तिक हैं, क्यूंकि यह किसी दुसरे के लिए महसूस किया जाता है. इस भाव के केंद्र में हिंसा और क्रूरता है, इसलिए यह नकारात्मक है, और चूँकि यह हिंसा किसी दुसरे के लिए महसूस किया गया है इसलिए अंतर्वैक्तिक है.
आगे इस लेख में एरिस्टोटल, अहमद, रोसेनबाउम और होल्ब्रूक की ‘नफरत’ की व्याख्याओं को दो उदाहरणों ऑड्रे लोर्ड की आत्मकथा के एक छोटे से अंश और प्रिमो लेवी के संस्मरण के एक अंश के माध्यम से समझने की कोशिश की गयी है।
“उसकी आँखें. फुले हुए नथुने. नफरत”: ऑड्रे लोर्ड
जानी मानी लेखिका, ब्लैक फेमिनिस्ट और सिविल राईट एक्टिविस्ट ऑड्रे लोर्ड (1934-1992) नस्लीय भेदभाव के सन्दर्भ में अपनी आपबीती बयां करते हुए लिखती है: “मुझे नफरत के बारे में बात करना पसंद नहीं है. मृत्यु की आकांक्षा सा भारी तिरस्कार और नफरत को याद करना मुझे पसंद नहीं, जो मैंने जबसे देखना सीखा, तब से स्वेत लोगों की आँखों में देखा.”[10] बचपन का एक किस्सा बयां करती हैं, जहाँ उन्होंने एक श्वेत महिला की आँखों में अपने लिए सिर्फ इसलिए ‘नफरत’ देखा क्यूंकि ऑड्रे की चमड़ी का रंग काला था. साहित्यिक रणनीति के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह लोर्ड की आपबीती है और इस आपबीती की कथावाचक लोर्ड खुद हैं. इस विधा में लिखे गए अनुभव लेखक के खुद के अनुभव होते हैं. लोर्ड अपनी आपबीती यूँ लिखती हैं:
“हार्लेम जाने वाली एक सबवे ट्रेन. मैंने अपनी माँ की बांह को कसकर पकड़ रखा था, उसके दोनों हाथ क्रिसमस की खरीददारी के थैले से भरे हुए थे. [...] मेरी एक तरफ एक आदमी अखबार पढ़ रहा था. दूसरी तरफ फर वाली टोपी पहने मुझे घूरती एक औरत. घूरते वक़्त उसका मुंह ऐंठता है और फिर उसकी नज़र नीचे की तरफ गिरती है, मेरी नज़रों को साथ में लेते हुए. चमड़े का दस्ताना पहना उसका हाथ उस लाइन पर से कुछ खींचता है, जिस लाइन पर मेरा नीले रंग का स्नोपेंट (ठण्ड के मौसम में पहना जाने वाला पेंट) और उसका चमकदार फर वाला कोट एक दुसरे से मिलते हैं. वह झटके से कोट को अपने और करीब खींचती है. मैं देखती हूँ. मुझे कोई ऐसी डरावनी चीज उसके और मेरे बीच के सीट पर नहीं दिखती है, जो उसे दिख रही है- संभवतः एक तिलचिट्टा. लेकिन उसने मुझतक अपना हॉरर पहुंचा दिया था. जिस तरीके से वह देख रही थी, कुछ जरुर ही बहुत बुरा होगा. इसलिए मैंने भी अपना स्नोसूट उस चीज से दूर अपने और करीब खिंच लिया. जब मैं उपर देखती हूँ तो वह महिला अब भी मुझे घूर रही है, उसके नथुने और बड़ी आँखें. और अचानक से मैंने महसूस किया कि हमारी सीट के बीच में कुछ भी नहीं रेंग रहा है, यह मैं हूँ, जिससे वह नहीं चाहती कि उसका कोट स्पर्श हो. जैसे ही वह झटके लेते हुए उठती है और ट्रेन की तेज़ रफ़्तार में एक पट्टी को पकड़ती है, उसका फर मेरे चेहरे को छूता हुआ निकलता है. जिस बच्चे का जन्म और पालन यहीं न्यूयॉर्क शहर में हुआ, यानि मैं अपनी माँ के बैठने के लिए जगह बनाने के लिए तेज़ी से खिसकती हूं. एक भी शब्द नहीं बोला गया. मुझे अपनी माँ को कुछ भी कहने में डर लग रहा है कि पता नहीं मैंने क्या कर दिया है. मैं गुप्त रूप से अपनी स्नोपेंट की साइड को देखती हूँ. क्या उसपर कुछ लगा हुआ है ? यहाँ जो भी हो रहा है मुझे समझ में नहीं आ रहा, लेकिन इसे मैं कभी भूल नहीं पाऊँगी. उसकी आँखें. फुले हुए नथुने. नफरत.”[11]
भाषाई स्तर पर भाव की ही शब्दावली से ‘Hate’ यानी ‘नफरत’ शब्द का चयन करते हुए लोर्ड यहाँ “उसकी आँखें” और “फुले हुए नथुने” शब्दों का भी प्रयोग करती है. यहाँ ‘नफरत’ शारीरिक हाव-भाव के द्वारा संप्रेषित होता है. इस अशब्दिक सम्प्रेषण में ‘नफरत’ शारीरिक हाव-भाव में लक्षित होते हैं और शरीर के अंग ही शब्द बन जाते हैं. इस विशेष सन्दर्भ में ‘नफरत’ उस महिला की आँखें और फुले हुए नथुने है. ‘नफरत’ जुबान से शब्द बन कर नहीं निकलते हैं, जैसा कि लोर्ड खुद लिखती हैं: “एक भी शब्द नहीं बोला गया”. आगे लोर्ड लिखती हैं “पता नहीं मैंने क्या कर दिया है”. यहाँ लोर्ड को शारीरिक हाव-भाव में परिलक्षित ‘नफरत’ के द्वारा उनके अपने अस्तित्व का अपराधबोध कराया जाता है. ‘नफरत’ उनको ये महसूस कराता है कि उनसे ही कोई गलती हुई है. ‘नफरत’ के ऑब्जेक्ट का अपराधबोध ही ‘नफरत’ की सबसे बड़ी ताकत है. उस श्वेत महिला की ‘नफरत’ एक व्यक्ति लोर्ड के लिए नहीं है, बल्कि उस समुदाय और समूह के लिए है जिससे वह श्वेत महिला लोर्ड को उनकी चमड़ी के रंग से जोड़कर देखती है. इस प्रकार उन महिला के अंदर का नस्लीय भेदभाव यूँ ही राह चलते शहर के किसी ट्रेन में अपने लिए एक अबोध बच्ची में ‘नफरत’ का एक ऑब्जेक्ट ढूढ़ लेता है. उस महिला की ‘नफरत’ के केंद्र में ‘पीपल ऑफ़ कलर’ (‘People of Color’) के विरुद्ध पूर्वाग्रह और अवधारणायें हैं. इस ‘नफरत’ का असर ट्रौमा के रूप में लोर्ड के बालमन पर होता है और वह इसी की तरफ इशारा करते हुए लिखती हैं: “इसे मैं कभी भूल नहीं पाऊँगी”. ‘नफरत’ में लिपटे इस नस्लीय भेदभाव के केंद्र में होता है, ‘नफरत’ के ऑब्जेक्ट को तुच्छ, महत्वहीन, असहाय और अपराधी महसूस कराना. लोर्ड की आत्मकथा के इसी अंश की व्याखा करते हुए सारा अहमद लिखती हैं कि अपने से इतर किसी दुसरे नस्ल के लिए ‘नफरत’ करना एक प्रक्रिया है, जिसके तहत उस नस्ल के लिए नापसंदगी और उसके अवांछित होने की शुरुवात होती है.[12] ट्रेन में बैठी श्वेत महिला उस बच्ची लोर्ड से उस पल में एक नकारात्मक रिश्ता कायम करती है, जो उसके ‘नफरत’ के ऑब्जेक्ट के शारीरिक और सामाजिक बहिष्कार करने की प्रक्रिया पर आधारित है. लोर्ड की आपबीती के उपरांकित अंश में ‘नफरत’ की नज़र की भी बात की गयी है: “[...] फर वाली टोपी पहने मुझे घूरती एक औरत”. यहाँ “घूरना” क्रिया का इतना गहरा असर होता है कि लोर्ड अपनी नज़र खुद पर डालती है: “मैं देखती हूँ. मुझे कोई ऐसी डरावनी चीज उसके और मेरे बीच के सीट पर नहीं दिखती है, जो उसे दिख रही है [...]”. यहाँ लोर्ड का शरीर उसके खुद के ‘गेज़’ (Gaze) का ऑब्जेक्ट बन जाता है. इस प्रकार जिस शरीर को ‘नफरत’ की नज़र से देखा गया है, वह शरीर दो लोगों की ‘गेज़’ का ऑब्जेक्ट बन जाता है. आगे लोर्ड “हॉरर” शब्द का इस्तेमाल करती है, यानि ‘नफरत’ की नज़र डरावनी है उनके लिए. ऐसे अनुभव से एक ‘डरे हुए सब्जेक्ट’ का जन्म होता है.
हाल ही में अमेरिका में जॉर्ज फ्लायड की हत्या के विरोध में लोग सड़कों पर उतर पड़े थे[13]. फ्लायड की हत्या के केंद्र में नस्लवाद है. यहाँ एक समुदाय और नस्ल के खिलाफ अवधारणायें है जो ‘नफरत’ को जन्म देती है. नौ मिनट तक फ्लायड की गर्दन पर घुटने टिकाना और उसे मार डालना ही ‘नफरत’ है. जिसे बैर्द और रोसेनबाउम (1992) “seething with passion against another human being“ लिखते है, वही उस पुलिस वाले का नौ मिनट के दौरान भाव है, जब उसके घुटने फ्लायड की गर्दन पर थे. 1980 के दशक में अमेरिका के पत्रकार इसी सन्दर्भ में ‘हेट क्राइम’ (“Hate-Crime”) शब्द की संकल्पना करते हैं, ताकि इस प्रकार के नस्लीय भेदभाव के शिकार हुए हाशिये के लोगों के हक में बात की जा सके[14]. 1990 के दशक में पश्चिमी यूरोप में ‘हेट क्राइम’ के मुख्य कारणों में दुसरे देशों या प्रदेशों से आये लोगों के खिलाफ असहिष्णुता और अवधारणायें थे. एशियाई, अफ़्रीकी मूल के और पूर्वी यूरोप से आये प्रवासी कामगारों के घरों को जलाने और मारने के कई मामले हैं.[15] ‘हेट क्राइम’ की संकल्पना ने एरिस्टोटल की ‘नफरत’ की व्याख्या को एकदम उलट कर दिया है. एरिस्टोटल के अनुसार ‘नफरत’ उनके लिए महसूस किया जाता है जिन्होंने किसी प्रकार के अन्याय को अंजाम दिया हो, लेकिन ‘हेट क्राइम’ में नफरत करने वाला नैतिक पतन की तरफ खड़ा होता है. न्याय प्रणाली के सामने हमेशा यह सवाल खड़ा होता है कि क्या किसी ‘भाव’ को दण्डित किया जा सकता है ? न्यायिक प्रणाली, मनोविज्ञान और दर्शन के त्रिकोण से ‘नफरत’ जैसे भाव को समझने की जरुरत है.[16] दिनचर्या की ‘नफरत’, जो यहाँ लोर्ड की लेखनी में है, को कानून में दर्ज ‘हेट क्राइम’ से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए.
“उसने अपनी नज़र उठाई और मेरी तरफ देखा.”: “पानवित्ज़-ब्लिक” और प्रिमो लेवी
दूसरा उदहारण प्रिमो लेवी (1919-1987) के संस्मरण Se questo è un uomo, 1947 (If This is a man) से लिया गया. एक लेखक और “होलोकॉस्ट” के उत्तरजीवी प्रिमो लेवी इस संस्मरण में पोलैंड के नाज़ी कांसेंट्रेशन कैंप (Concentration Camp) जिसे ‘आउसवित्स कांसेंट्रेशन कैंप’ (‘Ausschwitz Concentration Camp’) के नाम से भी जाना जाता है, में बिताए यातना के विषय में लिखते है. इसी संस्मरण में लेवी में एक नाज़ी डॉक्टर के साथ हुए अपने मुठभेड़ के बारे में विस्तार से लिखते हैं, जिसे कैंप में डॉक्टर पानवित्ज़ के नाम से जाना जाता था. लेवी लिखते हैं:
“पानवित्ज़ लम्बा, पतला और ‘ब्लॉन्ड’ (blond[17]) है. उसके पास आँखें, बाल और नाक है, जो हर जर्मन को होना चाहिए. और वह भयानक तरह से एक बड़े से मेज़ के पीछे लगी कुर्सी पर आसीन है. मैं, कैदी नंबर 174517 उसके काम करने के कमरे में खड़ा हूँ, जो कमरा एक सच मुच का ऑफिस है; चमकता, साफ़ और करीने से सजा हुआ. मुझे महसूस होता है कि मैं कुछ छु दूंगा, तो उसपर एक गन्दा दाग लग जायेगा. जब उसने लिखना बंद कर दिया उसने अपनी नज़रें उठाई और मुझे देखा. मुझे उससे फिर से मिलने की इच्छा है, किसी बदले की भावना से नहीं, बल्कि मानव की रूह के प्रति अपनी व्यक्तिगत उत्सुकता के चलते. क्यूंकि दो मानवों के बीच ऐसी नज़र का कभी आदान प्रदान नहीं हो सकता है. और अगर मुझे पता होता कि उस नज़र की प्रकृति को कैसे पूरी तरह बताया जा सकता है, जो अक्वेरियम के पारदर्शी शीशे से दो अलग अलग दुनिया में रहने वाले दो जीवों के बीच आदान प्रदान की गयी नज़र है, तो मैं उसके माध्यम से ‘ड्रीटे राइख’ (‘Third Reich’) के पागलपन को भी बता पाता”[18].
प्रिमो लेवी यहाँ डॉक्टर पानवित्ज़ के शारीरिक गठन, हाव-भाव को विस्तार से लिखते हैं और इस प्रक्रिया में पानवित्ज़ का वैयक्तिककरण होता है. लेकिन दुसरे ही वाक्य में लेवी अपने लिए “कैदी न. 174517” लिखते हैं, जो इस बात की तरफ इशारा करता है कि किस तरह नाज़ी कांसेंट्रेशन कैंप में लेवी जैसे नागरिकों को नंबर देकर उनसे उनके नागरिक अधिकारों के साथ साथ वैयक्तिक अधिकार भी छीन लिए जाते थे. लिखने की इस साहित्यिक रणनीति के द्वारा पानवित्ज़ और लेवी के बीच के पॉवर डायनामिक्स का भी पता चलता है; कौन यहाँ उत्पीडित और कौन उत्पीड़न करने वाला है. लेवी खुद को और पानवित्ज़ को एक दुसरे से परस्पर तुलना करते हुए लिखते हैं, कि कैसे पानवित्ज़ का साफ़-सुथरा ऑफिस उन्हें अपने मैले होने का एहसास दिलाता है. पानवित्ज़ के सामने खड़े लेवी को उस नज़र में उत्सुकता होती है जिस नज़र से पानवित्ज़ उन्हें अगले पल में देखता है. प्रिमो लेवी द्वारा व्याखा किये गए डॉक्टर पानवित्ज़ के इस नज़र अथवा नज़रिए को “पानवित्ज़-ब्लिक” (“Pannwitz-Blick”) कहा गया. जर्मन भाषा के शब्द ‘Blick’ का अर्थ होता है ‘नज़रिया. टिल बास्टियन इस नज़रिए यानि “पानवित्ज़-ब्लिक” की व्याखा करते हुए लिखते है: “एक ऐसी नज़र, जो किसी मानव को कचड़े में बदलने की ताक़त रखता है.”[19] “पानवित्ज़-ब्लिक” नफरत के ऑब्जेक्ट के मनोविज्ञान पर चोट करता है और उसके अपने बारे में सकारात्मक अवधारणा को नकारात्मक अवधारणा में बदल देता है. प्रताड़ना के इस क्षण में ऑब्जेक्ट खुद को असहाय महसूस करता है. “पानवित्ज़-ब्लिक” उसे नीचा दिखाता है, उसके आत्म-सम्मान को छिन्न-भिन्न करता है और अंततः ऑब्जेक्ट के आत्मबल को पूरी तरह निरस्त कर देता है. यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक-युद्ध है जो नफरत के ऑब्जेक्ट से जीने और होने का हक और मनोबल छीनने का दुस्साहस रखता है. लेवी भावों की शब्दावली से चुनकर शब्द नहीं लाते हैं यहाँ, जैसा कि कुंदेरा की “The Joke” से लिए उदाहरण में “hatred” शब्द लिया गया है, और लोर्ड की आपबीती के उपरांकित अंश में भी भावों की शब्दावली से ‘नफरत’ शब्द का चयन किया गया है. पानवित्ज़ एक व्यक्ति का उपनाम है और इस बिशेष सन्दर्भ में ‘नफरत’ को नए शब्द के जरिये लेवी ने लिखा है. यहाँ “पानवित्ज़-ब्लिक” अथवा पानवित्ज़ का नज़रिया ही ‘नफरत‘ है और यह नजरिया एक विशिष्ठ परिस्थिति, काल और सन्दर्भ में यहुदिओं के खिलाफ़ ‘नफरत’ को बयां करता है. नाजियों द्वारा मानवता के विरुद्ध किये गए अपराध को समझने के लिए “पानवित्ज़-ब्लिक” को समझने होगा, जिसमें किसी दुसरे मानव के लिए अथाह नफरत है. यह नफरत एक व्यक्ति प्रिमो लेवी के लिए नहीं है, बल्कि एक समुदाय के लिए है, जो भी उस समुदाय से वास्ता रखता है उसके लिए है.
ऑड्रे लौर्ड की आत्मकथा में वर्णित वह श्वेत महिला, लेवी के संस्मरण से पानवित्ज़: इन दोनों में एक समानता है कि ये अपने अपने काल, सन्दर्भ और परिस्थितियों में किसी न किसी समुदाय से ‘नफरत’ करते हैं। इन दोनों चरित्रों में एक और समानता है: अपनी नफ़रत को लेकर कोई ‘पछतावा’ का नहीं होना. ‘पाश्चाताप’ एक भाव है, जिसमे लोगों के मनोविज्ञान को सकारात्मक दिशा में बदल देने की ताकत होती है. खैर ‘नफरत’ को मिटाने के लिए नफरत करने वालों के अंदर के ‘पाश्चाताप’ का इंतज़ार करना एक उचित उपाय कभी नहीं हो सकता है. प्रिमो लेवी इसके खिलाफ कलम थाम लेते हैं तो और्दे लौर्ड अपनी लेखनी और एक्टिविज्म से ब्लैक मूवमेंट जैसे प्रगतिशील खेमे का प्रतिनिधित्व करती हैं.
कवि अवतार सिंह पाश दुनिया को इसी ‘नफरत’ के खिलाफ खड़े होने की मुहीम के बाबत लिखते हैं: “सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है, जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है.” हमारे सामने विकल्प हमेशा खुले हुए हैं: “पानवित्ज़-ब्लिक” वाली ‘नफरत की नज़र’ से दुनिया को देखें या ‘मुहब्बत वाली नज़र’ से.
नोट: हालाँकि इस लेख के केंद्र में ‘नफरत’ का भाव है, लेकिन लेख के शुरुवात और अंत में ‘नफरत’ को जानबूझ कर नहीं रखा गया है. बल्कि सकारात्मक भाव ‘ख़ुशी’ से आगाज़ हुआ है और ‘मुहब्बत’ से कारवां गंतव्य तक पहुंचा है.
References:
Books:
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Online Sources:
[1] मूल अंग्रेजी से हिंदी में मेरा अनुवाद. 2006 The Pursuit of Happiness, Director: Gabriele Muccino.
[3] Robert Grafik: ‘World Literature and Comparative Poetics: Cultural Equality, Relativism, or Incommensurability?’, in: World Literature Studies (2013): 64-76. Here page no. 73.
[4] जर्मन से हिंदी में मेरा अनुवाद. Tiffany Watt Smith: Das Buch der Gefühle, trans. from English by Birgit Brandau, München: dtv 2015. Page no. 148.
[6] Sara Ahmed: The cultural politics of Emotion, Edinburgh: Edinburgh University Press 2004. Page no. 49.
[7] R. M Baird and S.E. Rosenbaum,: ‘Introduction’, in: R.M. Baird and S.E. Rosenbaum (eds.): Bigotry, Prejudice and Hatred: Definitions, Causes and Solutions. Buffalo, New York. Prometheus Books, 1992. Page no. 9.
[8] See, D. Holbrook: The masks of Hate. The Problem of False Solutions in the Culture of an Acquisitive Society. Oxford. Pergamon Press, 1972. Page no. 36.
[9] अंग्रेजी से हिंदी में मेरा अनुवाद. Milan Kundera: The Joke. English Translation. USA. Harper Collins: 1992. Page no. 113.
[10] मूल अंग्रेजी से हिंदी में मेरा अनुवाद. Audre Lorde: ‘Eye to Eye: Black Women, Hatred, and Anger’. In: Lodre, Audre: Sister Outside. Essays and Speeches. Random House. New York: 1984. P. 157.
[12] See, Sara Ahmed: The cultural politics of Emotion, Edinburgh: Edinburgh University Press 2004. Page nos. 54-56
[14] See, Tiffany Watt Smith: Das Buch der Gefühle, trans. from English by Birgit Brandau, München: dtv 2015. Page no. 147.
[15] जैसे कि ‘Rostock Lichtenhagen Riots’ (1992). इस घटना के विषय में यहाँ पढ़ा जा सकता है: https://www.dw.com/en/25-years-after-rostock-lichtenhagen-dont-dwell-on-the-pastlearn-from-it/a-40155429 https://www.dw.com/en/rostock-riots-revealed-the-dark-side-of-humanity/a-18673369 (10/05/2025)
[16] इसकी चर्चा नेसबाउम विस्तार से अपनी इस किताब में करती हैं: Martha C. Nussbaum: Hiding from Humanity. Disgust, Shame and the Law, Princeton, New Jersey: Princeton University Press 2004.
[17] नाज़ी तानाशाही के वक़्त अंग्रेजी और जर्मन भाषा के विशेषण “blond” का सन जैसे पीले बालों और गोरे रंग के लिए इस्तेमाल होता था और “blond” शब्द के द्वारा नस्लीय श्रेष्टता जताया जाता था.
[18] जर्मन भाषा से हिंदी में मेरा अनुवाद. Primo Levi: Ist das ein Mensch? Erinnerungen an Auschwitz [1947]. Translated from Italian into German by Heinz Riedt, Frankfurt/M: Fischer 1979. Page no. 110.
[19] Till Bastian: „Die Politik der Beschämung“, in: Pontzen, Alexandra und Heinz- Peter Preusser (Hrsg.): Schuld und Scham. Heidelberg. Universitätsverlag, 2008. Page no. 207.
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