सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
Page No : 71-77 | URL : https://kameng.in/single.php?megid=6&pid=41
हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार, आलोचक और विचारक थे। उनके निबंधों में भारतीय परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और अध्यात्म का गहरा विश्लेषण मिलता है। वे परंपरा को केवल रूढ़ियों का संग्रह नहीं, बल्कि सतत प्रवाह मानते हैं जो आधुनिकता के साथ तालमेल बिठाती है। उनके निबंध भारतीय जीवन-मूल्यों को स्थापित और पुनर्परिभाषित करते हैं, जहां प्रेम, करुणा, अहिंसा, सहिष्णुता और सत्य जैसे मूल्य प्रमुखता से उभरते हैं। द्विवेदी जी की लेखनी में भारतीय अध्यात्म की झलक मिलती है, जो भक्ति आंदोलन, वेदांत, बौद्ध और जैन परंपराओं से प्रभावित है। वे अध्यात्म को केवल धार्मिक संकल्पनाओं तक सीमित नहीं रखते, बल्कि इसे जीवन की गहरी अनुभूति और चेतना के विस्तार के रूप में देखते हैं। उनके चिंतन की व्यापकता और आधुनिक संदर्भों में उनकी प्रासंगिकता स्पष्ट होती है। अतः हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में भारतीय परंपरा, जीवन-मूल्यों और अध्यात्म के विभिन्न आयामों का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया है, जिससे उनके चिंतन की व्यापकता और आधुनिक संदर्भों में उनकी प्रासंगिकता स्पष्ट होती है।
संस्कृति, परंपरा, अध्यात्म, मूल्य, नैतिकता, देशप्रेम, प्रकृति
मुख्य बिंदु
शोध प्रपत्र का उद्देश्य : शोध प्रपत्र का उद्देश्य भारतीय परंपरा, मूल्य और अध्यात्म के ऊपर एक ऐसे व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से बात करनी है जो भारत को अच्छे से जानते थे, भारतीय साहित्य और खासकर हिंदी साहित्य को बखूबी जानते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी के लिखे निबंध हमें उन्हीं बातों से अवगत कराती है, जो हमें एक जिम्मेदार बने रहने की प्रेरणा देती है। सीधे तौर पर कहें तो द्विवेदी जी के निबंध भारतीय परंपरा, मूल्य, अध्यात्म, आदर्श, देश प्रेम आदि को पुनः स्थापित करता है।
शोध प्रपत्र की प्रविधि : चयनित निबंधों का विवेचनात्मक एवं विश्लेष्णात्मक अध्ययन।
शोध प्रपत्र की प्रासंगिकता : वर्तमान समय में विस्मृत होती जा रही भारतीय परंपरा और संस्कृति को पुनः स्थापित करना है। निबंधकार ने अपना पूरा समय भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए, लोगों को अपने साहित्य से जागरूक करते रहे हैं। यह शोध उनके चिंतन की गहराई को समझने में सहायक होगा। आज जहाँ समाज में पारंपरिक और आधुनिक विचारधाराओं के मध्य जो संघर्ष चल रहा है, उसे द्विवेदी जी के साहित्य से हमें गहराई से समझने में सहायता मिलेगी।
मूल आलेख
परंपरा मानव द्वारा निर्मित होती है और मानव द्वारा ही खंडित होती है। समय के साथ–साथ आधुनिकता नए सिरे से पनपती है और परंपरा को चुनौती देती रहती है। परंतु क्या सभी परंपरा रूढ़िग्रस्त होती है? इस प्रश्न का उत्तर एक दृष्टिकोण से तो नहीं दिया जा सकता। कहना गलत नहीं होगा लेकिन भारतीय परंपराओं का संरक्षण ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे जन–मानस ही कर रहे हैं।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के माध्यम से भारत की भूमि को भारत के सभी कोनों से जोड़ा है। एक प्रतिष्ठित इतिहास लेखक के साथ-साथ उनकी ख्याति एक प्रतिष्ठित निबंधकार के रूप में भी है। द्विवेदी जी एक आलोचक और विचारक के रूप में भारतीय साहित्य में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। गौरतलब है कि आचार्य जी की रचनाओं में भारतीयता की समझ की अमिट छाप है। उनकी रचनाओं में भारतीय परंपरा, मूल्य और अध्यात्म का समावेश प्रलक्षित होता है। एक विचारक के रूप में अपने देश की सभ्यता एवं परंपराओं पर अपने विचार रखकर द्विवेदी जी ने पाठकों की भीतर अपने देश की संस्कृति के प्रति श्रद्धा भाव और प्रेम को जगाया है, और कोई इस बात की अहमियत को नाकार नहीं सकता। द्विवेदी जी के निबंध भारतीय विचारधारा और जीवनदृष्टि को समझने का एक सुलभ साधन है। आचार्य जी के निबंध परंपरा और आधुनिकता के सामंजस्य को भी जोड़े रखा है। द्विवेदी जी के निबंध भारतीय समाज और संस्कृति, परंपरा, मूल्य, अध्यात्म, आदर्श, नैतिकता आदि को समृद्ध करती है। उनकी लेखनी में अध्यात्म की जो समझ है वह विचारणीय है। भारत में अध्यात्म का महत्व कितना है, उसकी समझ द्विवेदी जी के निबंधों से हमें पता चलता है। अध्यात्म का सम्बद्ध अब सिर्फ संस्कृत भाषा से तो नहीं है, इसीलिए भाषा के स्तर पर बिना किसी छद्म पांडित्य के, सरल भाषा में अध्यात्म की विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा किया है। “विद्वान आलोचकों ने ‘व्यक्तित्वाभिव्यंजन’, ‘कल्पना-प्रवणता’,‘पांडित्य’, ‘फक्कड़पन’, ‘परम्परा-आधुनिकता संवाद’, ‘कोमलकांत पदावली’, ‘वैविध्यपूर्ण जीवन्त कथन शैली’ आदि ललित निबंध की जिन विशेषताओं को रेखांकित किया है, उनके स्रोत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध ही जान पड़ते हैं।”1
कवियों के बदलते स्वरूप के सन्दर्भ में द्विवेदी जी लिखते हैं कि “आज का कवि भी यह स्वीकार करने में संकोच करेगा कि वह धन के लिए यश के लिए व्यवहार सिखाने के लिए लिख रहा है और पाठक भी उससे इन बातों की आशा नहीं करता। छापे की मशीन ने इन विषयों के लिए अनेक अन्य शास्त्रों को सुलभ कर दिया है। इस मशीन ने जो पाठकों को भाभावेश पर से धकेल कर बुद्धिप्रवाह में फेंक दिया है, वह मामूली बात नहीं है।”2 कवि का कर्तव्य ही यही है कि वह मनोरंजन से अधिक समाज सुधार की प्रेरणा जनमानस तक पहुंचाए।
भारतीय समाज में अध्यात्म का उद्देश्य ही है ‘मैं कौन हूँ?’, ‘सत्य क्या है?’, ‘मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?’ आदि प्रश्नों के उत्तर की खोज करना। अध्यात्म हमें करुणा, प्रेम, सत्य और अहिंसा जैसे मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देता है। वहीं परंपरा हमें अपने समाज की विरासत को संरक्षित रखने और पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान, अनुभव और नैतिक मूल्यों को संचारित करते रहने की सीख देता है। सदाचारी और नैतिक कर्म से युक्त मानव बने रहना और सही गलत का भेद समझना यही तो मानव मूल्य है। भारतीय संस्कृति का आधार ही है, समाज में शांति, न्याय और सद्भाव बनाये रखना। चयनित निबंधों के माध्यम से हिंदी साहित्य में भारतीय परंपरा, मूल्य और अध्यात्म का प्रतिबिम्ब किस प्रकार प्रलक्षित होता है, उसका विश्लेषण करेंगे।
‘अशोक के फूल’ निबंध में मानवीय मूल्य की बात कही गई है। किस प्रकार समय के साथ-साथ मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं, इस निबंध में प्रलक्षित होता है। अशोक के फूल “भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार है।”3 तात्पर्य यह कि कालिदास ने संस्कृत के ग्रंथों में अशोक के फूल को शोभा और सौकुमार्य का भार बनाया। अशोक का फूल प्रेम, सौंदर्य और आनंद का प्रतीक था। सिर्फ एक पुष्प ना होकर भारतीय परंपरा, वह भी प्राचीन काल से जुड़ा हुआ था। अशोक का फूल भारतीय संवेदना और सांस्कृतिक का प्रतीक है। परंतु विदेशी आक्रांताओं के आने से अशोक के फूल की तरह ही भारतीय मूल्य और सांस्कृतिक मूल्य में परिवर्तन आने लगा। अशोक के फूल का प्रवेश और निर्गम नाटकीय व्यापार स्वतः नहीं हुई। बल्कि एक प्रतीकात्मक और नाटकीय ढंग से हुआ। जिस प्रकार बुद्ध और विक्रमादित्य को याद किया जाता है, उसी प्रकार अशोक के फूल को याद किया जाता है। “अशोक किसी कुशल अभिनेता के समान झम से रंगमंच पर आता है और दर्शकों को अभिभूत करके खप–से निकल जाता है। ऐसा क्यों?”4 ऐसा इसलिए कि समय के साथ कितना ही प्रिय वस्तु क्यों ना हो, सभ्य परंपरा हो, सुसंस्कृति हो, नैतिक मूल्य हो वह बदल जाता है। उसकी जगह कोई और संस्कृति या सभ्यता अपना स्थान ले लेती है। “ईसवी सन के आरंभ के आसपास अशोक का शानदार पुष्प भारतीय धर्म, साहित्य और शल्प में अद्भुत महिमा के साथ आया था।”5 आज की स्थिति ऐसी है कि अशोक के फूल को भुला दिया गया है, क्योंकि यह समाज भुलक्कड़ है। और भुलक्कड़पन के अखाड़े में भारतीय मूल्यों को धीरे-धीरे भुला दिया जा रहा है। किसी भी मूल्य को मनुष्य की प्रवृति ही नष्ट करती है। परंतु कहीं–न–कहीं वह मूल्य रहता ही है, भले ही वह मनुष्यों में विद्यमान न रहे।
‘शिरीष के फूल’ शिरीष का पेड़ बड़े और छायादार होते हैं। शिरीष के फूल, आंधी–तूफान, गर्मी–बरसात सभी मौसम में डंटकर पेड़ पर टिका रहता है। निबंधकार यह संकेत करते हैं कि आज के समय में लोग क्षण भर में बिखर जाते हैं। वह अद्भुत अवधूत शिरीष के फूल जैसा कोमल और कठोर जैसे गुण कहां विलुप्त होते जा रहे हैं? “शिरीष जेठ के जलती धूप में भी नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था। कम फूल इस प्रकार की गर्मी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं।”6 “कर्णिकार और आरग्यवध (अमलतास) पंद्रह–बीस दिन के लिए फूलता है, वसंत ऋतु के पलाश की भांति।”7 शिरीष का फूल वायुमंडल से अपना रस खींचता है। शिरीष के पेड़ की डाल अपेक्षा से तनिक ज्यादा कमजोर होती है, परंतु उसमें झूला लगाकर महिलाएं झूला झूल सकती हैं। यानी शिरीष के पेड़ में वह ताकत है कि वह कमजोर होकर भी छांव दे सकता है, उसमें झूला झूला जा सकता है। इसमें वही भारतीय मूल्य की बातें कही गई कि, कमजोर होकर भी व्यक्ति अपनी पूरी निष्ठा से किसी दूसरे का भार सह सकता है। उसे सुख और आनंद प्रदान कर सकता है। “जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भांति जीवन की अज्ञेयता का मंत्रप्रचार करता रहता है।”8 परंतु शिरीष के फूल यह प्रेरणा देता है कि अपनी पूरी लगन से अपनी जगह पर अद्भुत अवधूत की तरह डंटे रहना चाहिए, जबतक टूट कर बिखर ना जाओ। जिस प्रकार नये फल–फूल निकल आने पर भी शिरीष का फूल अपनी जगह पर डंटा रहता है। और मनुष्य को भी दुख हो या सुख हो उससे विचलित नहीं होना चाहिए। हार तो बिल्कुल भी नहीं मानना चाहिए।
‘कुटज’ कुटज का परिचय संस्कृत साहित्य में बड़ी सहजता और आत्मीयता से ली गई है। परंतु कवियों द्वारा तिरस्कृत है। कुटज का स्वभाव ही है विपरीत परिस्थितियों में भी डंट कर खड़े रहना। कुटज के स्वभाव को आचार्य जी ने मानवीय मूल्य के तहत मनुष्य को “गाढ़े का साथी”9 होना कहा है। यानी एक ऐसा मित्र होना, जो सिर्फ सुख में हीं नहीं संघर्ष और दुख में भी साथ निभाए। जिस प्रकार कुटज प्रतिकूल वातावरण में भी फलते-फूलते रहता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य को चाहिए कि वह कुटज की भांति अपने व्यक्तित्व को ना छोड़े। प्रतिकूल परिस्थिति में अपने स्वभाव को कुस्वाभव में ना बदले। जिस प्रकार रहीम ने किया–
“वे रहीम अब बिरछ कंहें, जिनकर छांह गंभीर;
बागन बिच–बिच देखियत, सेंहुड़ कुटज करीर।”10
हालांकि रहीम स्वभाव के ऐसे नहीं थे, पर कुछ ऐसी परिस्थिति आन पड़ी होगी। जिसके कारण उन्होंने कुटज को एक चपत लगा दी। आगे निबंधकार लिखते हैं कि “सुख पहुंचाने का अभिमान यदि गलत है, तो दुख पहुंचाने का अभिमान तो नितरां गलत है।”11 इस जगत में सब कुछ स्वार्थ ही है। प्रेम, परोपकार सब मतलब की चीजें हैं। अध्यात्म इन्हीं चीजों से हमें परे ले जाता है, और यह बात लगभग पूरब–पश्चिम के आध्यात्मिक चिंतकों ने भी माना है। निबंधकार के आनंद की प्राप्ति के संबंध में बताया है कि “अपने में सब और सबमें आप–इस प्रकार की एक समष्टि–बुद्धि जब तक नहीं आती तब तक पूर्ण सुख का आनंद भी नहीं मिलता।”12 कुटज की भांति हीं मनुष्य को जीना आना चाहिए। निस्वार्थ के साथ। किसी की चापलूसी कर अपनी वासना की पूर्ति करने से बचना चाहिए। यही अध्यात्म है। मत मानो हार। प्रिय–अप्रिया के भेद किए बिना निरंतर आगे बढ़ते चलो। कुटज होना यानी वैरागी होना है।
‘आत्मदान का संदेशवाहक : वसंत’ वसंत ऋतु उत्सव का महीना होता है। “सरस्वती पूजा यानी वसंत पंचमी, होली, मदनदेव की पूजा, कामदेवायन–यात्रा, आम्रतरु और माधविलता के विवाह, अभ्यूष–खादनिका (भुने हुऐ कच्चे गेहूं की पिकनिक), नवाम्र खादनिका, आदि के रूप में समूचा वसंतकाल नाच–गान और काव्यालाप से मुखर हो उठता था।”13 वसंत सिर्फ एक ऋतु ही नहीं बल्कि एक मनोभाव भी है। भारतीय परंपरा में इस ऋतु का अपना एक वैशिष्ट्य स्थान है। वसंत दुख से सुख की ओर इंगित करने वाला ऋतु है। जिस प्रकार पतझड़ के बाद वसंत ऋतु का आना आनंद और उल्लास की रीत है ठीक उसी प्रकार वसंत मनुष्य के अंदर दुख के बाद सुख की परंपरा को प्रदर्शित करता है। जीवन की सार्थकता आत्मज्ञान में ही है। यानी जीवन अपने से कहीं अधिक दूसरों के लिए समर्पित होना चाहिए। और ऋतुराज वसंत यही सीख हमें देने आता है।
‘मेरी जन्मभूमि’ निबंध में निबंधकार ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा है कि “इतिहास का साहित्य कुछ बड़े-बड़े व्यक्तियों के उद्भव और विलय के लेखे–जोखे का नाम नहीं है। वह जीवन—मनुष्य के धारावाहिक जीवन—के सारभूत रस का प्रभाव है।”14 यानी जब भी गांव की परंपराओं की बात कही जाएगी उसमें जो मुख्य होकर भी साहित्यकारों और इतिहासकारों द्वारा गौण मान लिए गए हैं उनकी विशेषता फिर भी कम नहीं होगी। वहां की भूमि उनके बलिदान, शौर्य और कर्तव्यों को कभी नहीं भूल पायेगा बशर्ते उस पद्धति का प्रयोग पीढ़ी दर पीढ़ी हम करते रहें।
‘भारत में द्यूतक्रीड़ा’ “पाणिनि के समय पांच पासों का खेल था जिन्हें कृत, त्रेता, द्वापर, कलि और अक्षराज कहा गया है।”15 ऐसी मान्यता है की दिवाली के दिन जुआ खेलना चाहिए, इसमें कोई पाप नहीं है। परंतु एक धार्मिक पर्व को जुए से जोड़ना, वास्तव में ऐसा कभी था? यह सिर्फ स्वार्थी जनों की देन है। धर्म का काम तो रक्षा करना है, और कानून तो इसे निषिद्ध करार दे दिया। परंतु सरकार इसे खुलेआम प्रोत्साहित करती है। क्योंकि इससे उन्हें भी लाभ होता है। महाभारत काल में हुई द्यूतक्रीड़ा किसी से नहीं छुपी है। घर–बार, धन–दौलत सब दांव पर लगा देते हैं। यहां तक की एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को भी दांव पर लगा देता है। इसमें मानव मूल्य क्षीण हो रहा है। निबंधकार जुए की मानसिकता के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि “इतना जानता हूं कि उसने सूक्ष्म रूप धारण किया है और पूरे जन–जीवन पर छा गयी है। आधुनिक जीवन ही जुआ बन गया है। आप चाहें या न चाहें, जुए के चक्कर में आ ही जाएंगे।”16
‘नाखून क्यों बढ़ते हैं?’ इस निबंध में द्विवेदी जी लिखते हैं कि “नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उसे अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना उसे स्व–निर्धारित, आत्म–बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थ की ओर ले जाती है।”17 भारतीय चित्त जो आज भी ‘अनधीनता’ के रूप में न सोचकर ‘स्वाधीनता’ के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। स्वाधीनता, स्वतंत्रता, स्वराज में ‘स्वा’ ही है। “हमारी परंपरा महिमामयी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार उज्जवल है।”18 लेकिन हम ज्यादातर इसके विपरीत ही सोचते हैं। नाखून का बढ़ना यानी मनुष्य में पशुता बढ़ना जिस प्रकार नाखून की भांति देश हथियार बढ़ा रहा है, उसे समय रहते काटना ही होगा वरना प्रेम, त्याग, निस्वार्थ सेवा, परोपकार आदि सब धीरे-धीरे विलुप्त होते जाएंगे। और जब भी कोई इन सब चीजों की बातें करेगा उसका अंजाम बुरा ही होगा।
‘व्योमकेश शास्त्री उर्फ हजारी प्रसाद द्विवेदी’ इस निबंध में द्विवेदी जी के साथ घटी एक घटना का उल्लेख है जिसमें वह पंचांग संबंधित बातों को एक भरी सभा में जाकर खाने से कतरा रहे थे। उन्हें लगा कि यह उनके एक गुरु पंडित रामयत्न ओझाजी उन्हें डांट देंगे परंतु हुआ इसके विपरीत ही। उनके गुरु ने पत्र लिखकर कहा (जब द्विवेदी जी वहां नहीं गए) “तू इंदौर क्यों नहीं गया? मैं तो उसे दिन अपनी विद्या सफल मानता जिस दिन तुझे निर्णायक की गद्दी पर बैठा देखता।”19 मानवीय मूल्य और अध्यात्म कहता है सामने अपना कोई भी क्यों न हो अगर बात सत्य है और उसे रखना एक जिम्मेदारी बन जाती है तो, डरना नहीं चाहिए, किसी से भी। चाहे स्वयं के गुरु ही विपक्ष में क्यों न हों। महाभारत का युद्ध इसका एक उदाहरण है।
‘परंपरा और आधुनिकता’ इस निबंध में द्विवेदी जी परंपरा और आधुनिकता के बीच हो रहे संघर्ष को सूक्ष्म दृष्टि से समझाते हुए बताते हैं कि “परंपरा का शब्दार्थ है, एक का दूसरे को, दूसरे का तीसरे को दिया जाने वाला काम। वह अतीत का समानार्थक नहीं है। ‘परंपरा’, जीवंत प्रक्रिया है जो अपने परिवेश के संग्रह–त्याग की आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर क्रियाशील रहती है।”20 हमें अपने परंपराओं से हू–ब–हू चीजें प्राप्त नहीं होती। वस्तुतः उसमें भी बदलाव होता है, तब वह हमें प्राप्त होता है। काट–छांट और जोड़कर परंपरा अतीत से मिलती है। यह एक प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रक्रिया है।
वास्तव में समाज यह बोलकर द्वंद्व पैदा किया जाता है कि परंपरा और आधुनिकता एक दूसरे के विरोधी हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि ये दोनों आपस के विरोधी नहीं बल्कि आपस के पूरक हैं। परंपराओं की राह पर चलकर ही आधुनिक हुआ जा सकेगा। और जो आज आधुनिक है, कल परंपरा बन जाएगी।
निष्कर्ष
भारतीय संस्कृति, परंपरा, अध्यात्म, सादगी, सत्य, ईमानदारी, कर्म आदि पर द्विवेदी जी अपने निबंधों के माध्यम से बल देते आए हैं। ये निबंध आधुनिक मोहपाश में खोती पहचान को पुनः स्थापित करने का आधार बन सकते हैं। वर्तमान युग डिजिटल क्रांति का युग है। दिन-प्रतिदिन नए-नए अविष्कार और खोज मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहा है। आज जब डिजिटल उपभोक्तावाद और जलवायु संकट हमें आत्म-विस्मृति की ओर धकेल रहे हैं, उनके विचार विश्लेषणात्मक लेंस से प्रसांगिक हो उठते हैं- सादगी स्थायी जीवन शैली या सतत जीवन का मूल है, जबकि अध्यात्म माइंडफुलनेस और मानसिक स्वास्थ्य का वैज्ञानिक समर्थन। भौतिक विरोधी अतिवाद से हटकर एक संतुलन बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, जहाँ आधुनिक जीवन शैली हो। समाज परिवर्तनशील रहा है, इसीलिए जरूरी यह भी है कि रूढ़ हो चुकी बातों और कार्यों को पीछे छोड़ देना ही प्रगतिशील मनुष्य होना है।
सन्दर्भ सूची
सहायक ग्रंथ सूची
कामेंग ई-पत्रिका
www.kameng.in
ISSN : 3048-9040 (Online)
ATISH KUMAR VISHWAKARMA
RESEARCH SCHOLAR
HINDI
SREE SANKARACHARYA UNIVERSITY OF SANSKRIT, KALADY, KERALA, INDIA
atishkv28@gmail.com
Volume 1 | Issue 2 | Edition 1 | Peer reviewed Journal | October, 2025- April, 2026 | kameng.in
शोधालेख
Copyright (c) 2025 कामेंगई-पत्रिका
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-Share Alike 4.0 International License.
Editorial Office
Kameng E-Journal
Napam, Tezpur(Sonitpur)-784028 , Assam
www.kameng.in
kameng.ejournal@gmail.com
डॉ. अंजु लता
कामेंग प्रकाशन समूह
Kameng.ejournal@gmail.com
Mobile : 8876083066
नपाम,तेजपुर,शोणितपुर,असम,-784028
Dr ANJU LATA
Kameng prakaashan Samuh
Kameng.ejournal@gmail.com
Mobile : 8876083066
Napam, Tezpur,Sonitpur, Assam-784028
8876083066/8135073278