सहकर्मी समीक्षा जर्नल
Peer reviewed Journal
ISSN : 3048-9040 (Online)
साहित्यिक पत्रिका
Literary Journal
कामेंग अर्धवार्षिक ई-पत्रिका/सहकर्मी समीक्षा जर्नल/ अक्टूबर, 2025 - अप्रेल, 2026/खण्ड-1/अंक-2
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सिर्फ दुःख ही मधुमक्खी के
छत्ते में छिपा नहीं होता है
वहां सुख भी कुंडली मारे रहता है
जो गाहे– बगाहे आकर
डंक मार जाता है
और
मारे सुख के हम बौराए फिरते हैं
दर्द होने का भी अपना सुख होता है
दर्द भी सुख देता है
मां के नाल से जब दाई अलग करती है
शिशु को
दर्द में भी वह सुख और कहां
लेकिन कुछ दर्द माएं पीढ़ियों से
ढोती हुई
आती हैं
और जाने अंजाने सौंप देती हैं
अपनी अगली पीढ़ी को
यह दुःख
ज्यादा स्थाई होता है
आता है तो जाने का नाम ही नहीं लेता
कभी – कभी तो पीढ़ियां गुजर जाती है
एक – सा ही दुःख हर बार रहता है
किवाड़ में लगे घुन की तरह
धीरे – धीरे खोखला करता जाता है
ऊपर से ढांचा दिखता है लेकिन
अंदर से खोखला , भुरभुरा
स्त्रियां जीती हैं दुखों के उस पहाड़ तले
जो पीढ़ियों से उन्हें मिली हैं
उनके लिए कोई सुरंग ऐसा नहीं
जिसके दूसरे छोर पर उजाला हो !
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ISSN : 3048-9040 (Online)
Dr Bandana Bharati
Assistant Professor ( Sr. Scale)
Department of Hindi
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Volume 1 | Issue 1 | Edition 1 | Peer reviewed Journal | July-December, 2024 | kameng.in
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